श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय ३०३
इच्छा की जाती है। लेकिन साधु को कोई वस्तु प्राप्त न हो सके यह सम्भव ही नहीं है। वह प्राप्त होने की
स्थिति में ही आनन्दपूर्वक आत्मानंद में सुखी रहता है। सूर्य जब जुगनूँ से मिलने जाता है तो वह जुगनू को देख
नहीं सकता और जुगनू भी सूर्य से भेंट नहीं कर पाता उसी प्रकार साधुओं की भी दुर्लभता से भेंट नहीं हो पाती।
इस प्रकार दोनों ओर से देखने पर उसकी विषयवासना पूरी तरह नष्ट हो जाती है। साधु की यही निरिच्छता
उसका आठवाँ गुण है। सावधानी से मन पर नियंत्रण करने से वही नियंत्रण बाह्य इन्द्रियों में अपने आप हो जाता
है। जिस प्रकार बेटी को सिखलाते समय बहू थर-थर काँपने लगती है, मुख्य सेनापति हाथ में आते ही बाकी
सेना बिना युद्ध किये ही पराजित हो जाती है या वृक्ष की जड़ काटने से टहनियाँ अपने आप मर जाती है उसी
प्रकार जो मनोवृत्ति का नियमन है वही बाह्येन्द्रियों का नियमन होता है। ऐसी स्थिति में जो कर्म होता है वह
निःसन्देह निष्काम होता है। जब मन आत्मस्वरूप में लग जाता है और बाह्येन्द्रिय मेरी भक्ति में लीन हो जाते हैं
उस समय जो भी कर्म होते हैं वे सब ब्रह्मस्वरूप होते हैं। अथवा बाह्येन्द्रियों का संयमन करने से मनोमय कर्म में
भी परब्रह्म प्रकट होता है। बाह्येन्द्रियों का यह नियमन आत्मा में रमण करने वाले पुरुष ही जानते हैं। इस प्रकार
बाह्येन्द्रियों का नियमन करने का गुण यही साधु की निग्रहशक्ति है। यही वास्तव में नववाँ गुण है। अब दसवाँ
गुण सुनिये। आकाश सभी को आवृत्त करता है लेकिन वह किसी को कठोर नहीं मालूम होता। उसी प्रकार साधु
भी सर्वांग से सभी को मृदु लगता है। जिस प्रकार धुनी हुई रुई के गोले से किसी का सिर नहीं फूटता उसी
प्रकार साधु का अंतःकरण सभी को अत्यन्त कोमल लगता है। जरा देखो, जिस प्रकार गंगा का जल गाय और
बाघ दोनों को समान रूप से शान्त करता है, उसी प्रकार साधु भी सबके प्रति मृदु और मधुर रहता है। इसी को
साधु की अत्यन्त मृदुलता कहा गया है, इसे ध्यान में रखो। यह दसवें गुण की योग्यता है। अब ग्यारहवाँ लक्षण
सुनो। साधु को जो पवित्रता प्राप्त होती है वह वास्तव में भगवद्भजन के कारण ही। व्रत, तप, ज्ञान, तीर्थ आदि
को जो पवित्रता प्राप्त हुई है वह उन्हें साधुओं से प्राप्त हुई है। परस्त्री और पराया धन इन्हें जिसका मन स्पर्श
नहीं करता उन्हीं के चरणस्पर्श की इच्छा गंगादिकतीर्थ करते हैं। मेरी स्त्री, मेरा धन आदि के लोभ का अर्थ ही है
अधोगति की ओर जाना। अतः स्त्री को धन की इच्छा न करना ही साधुओं की पवित्रता है। ऐसी पवित्रता होते
हुए भी वह व्रत, तप, तीर्थ आदि की निन्दा नहीं करता। उन व्रतादिकों का विधिपूर्वक आचरण करते समय
अत्यन्त श्रेष्ठ ब्राह्मणों का सा सदाचरण करता है। मगर के पाश में आने वाला पुरुष जिस प्रकार प्राणसंकट आने
पर भी उस पाश से नहीं छूटता उसी प्रकार वह जीवब्रह्म को गले लगाता है। उस ब्रह्म को आगे करके ही वह
गृहस्थ धर्म का उत्तम रीति से पालन करता है और उस कर्म में उसे साक्षात ब्रह्म का ही अनुभव होता है। लोगों
के अनुसार वह कर्म करता रहता है लेकिन वास्तव में वह ब्रह्मस्वरूप में ही विचरण करता रहता है। इसे वही
जानता है। इसका अनुभव दूसरों को नहीं होता। कुम्हार मटकी तैयार हो जाने पर उसे चाक पर से उतार लेता है
किन्तु चाक पहले की ही गति से घूमता रहता है। उसी प्रकार साधु पूर्व संस्कार के अनुसार कर्म करता रहता है
लेकिन उसकी प्रवृत्ति शून्य रहती है। साधु का यह बहुत महान लक्षण है। यह सुनने में आसान है किन्तु आचरण
करने के लिये कठिन है। यह ग्यारहवाँ लक्षण अत्यन्त पवित्र है। अब बारहवाँ विचित्र लक्षण सुनो। किसी भी
वस्तु का संग्रह करने अथवा उसे स्वीकार करने का विचार मन को स्पर्श ही नहीं करता ऐसी वृत्ति साधु की
'अपरिग्रहता' है। देह की अथवा घरबार की भी संगति न करना इसी का नाम है 'अकिंचनता'। स्फटिक को
काजल पर रखा जाय तो वह काला दिखायी देता है, लाल रंग पर रखो तो उत्तम लाल रंग का दिखाई देता है,
नीले रंग पर रखो तो नीले रंग का ही लगता है, लेकिन उसका शुद्ध स्वरूप निराला ही होता है। उसी स्फटिक