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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 316, कुल 869 में से

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पृष्ठ 316

३०० श्रीमद् एकनाथी भागवत
त्वं ब्रह्म परं व्योम पुरुषः प्रकृतेः परः।
अवतीर्णोऽसि भगवन् स्वेच्छोपात्तपृथग्वपुः ॥ २८ ॥
तुम निर्गुण और सर्वत्र समान हो, तुम चित्स्वरूप और चिदाकाश हो, पुरुषों में उत्तम तथा वन्दनीय ऐसे
एक तुम ही हो। प्रकृति-पुरुषों से भी महान जो परब्रह्म है वह तुम हो। वेदशास्त्र तुम्हारी थाह नहीं लगा पाते।
तुम इन्द्रियों के लिये अगोचर हो। अब हमारे भाग्य का स्वरूप देखो। तुम्हें हम प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देख रहे
हैं। मुकुट, कुण्डल तथा वनमाला धारण की हुई तुम्हारी मेघ श्यामल मूर्ति कैसे शोभायमान हो रही है। तुम्हारे ये
सुन्दर कमलनेत्र, पीताम्बर धारण किया हुआ तुम्हारा ऐसा स्वरूप देखकर तन-मन बिलकुल तृप्त हो जाता है।
तुम सारे जगत का ही जीवन हो। तुम्हारा दर्शन अत्यन्त मधुर है। उस दर्शन से संसार की इच्छा पूर्ण हो जाती है।
लेकिन ऐसे उस देह की भी तुम्हें इच्छा नहीं है। भगवन! तुम इतने निरिच्छ हो। फिर भी भक्तों पर कृपा करने
की प्रबल इच्छा से तुम अनेक अवतार धारण करते हो। भक्तों की ही इच्छा के लिये तुम अपनी लीला से देह का
नाटक दिखाते हो। हे कृष्णनाथ! सचमुच, भक्तों पर कृपा करने के लिये ही तुमने अवतार लिया है, इसलिये मेरे
प्रार्थना किये बिना ही तुमने मेरे प्रश्नों का उत्तर देना स्वीकार किया है। जिस प्रकार बछड़े की हुंकार सुनते ही
गाय के स्तनों से दूध बहने लगता है उसी प्रकार देखो, उद्धव के प्रश्न से भगवान भी आत्मज्ञान से सराबोर हो
गये। सुबह शाम गृहस्वामी को दूध मिलता है वह बछड़े के कारण ही। वत्स को देखते ही जिस प्रकार गाय को
दूध उतर आता है उसी प्रकार श्रीकृष्ण उद्धव के वश हो गये। उद्धव श्रीकृष्ण के प्रेम के कारण ही अच्छा लगता
था इसलिये उद्धव के प्रश्न उसे अत्यन्त प्रिय लगते थे। श्रीकृष्ण का साथ मिलने के कारण उद्धव का भाग्य
कितना महान है। उद्धव जो भी प्रश्न पूछते, उसे सादर स्वीकार करने के लिये श्रीकृष्ण अंजुली आगे बढ़ाकर
तैयार रहते थे। श्रीकृष्ण उसकी भक्ति पर इतने मुग्ध हो गये थे कि वे उसे चाटने के लिये उद्यत थे। जिसके पंख
भी अभी नहीं निकले हैं ऐसे बच्चों को चिड़िया जिस प्रकार अपनी चोंच से चारा चुगाती है, उसी प्रकार
आत्मज्ञान की गूढ़ बात श्रीकृष्ण उद्धव के हृदय में उड़ेलने लगे। अब श्रीकृष्ण पाँच श्लोकों में उद्धव के प्रश्नों
का उत्तर देंगे और उनमें साधुओं के अत्यन्त पवित्र लक्षण बतायेंगे। साधुओं के लक्षण अपार हैं लेकिन श्रीकृष्ण
उनमें से तीस लक्षण चुनकर उद्धव को बतला रहे हैं।
श्रीभगवानुवाच
कृपालुरकृतद्रोहस्तितिक्षुः सर्वदेहिनाम्।
सत्यसारोऽनवद्यात्मा समः सर्वोपकारकः ॥ २९ ॥
कृपा का कोई स्वतंत्र स्थान नहीं है। वह जिसके प्रति उत्पन्न होती है वही साधु है। कृपा संतों की ही देह
में रहती है। इसी कारण उसे सारे संसार में मान्यता प्राप्त हुई है। कृपा को उनके ही कारण महत्त्व प्राप्त हुआ,
उनकी ही कृपा पर दया जीवित रही, उन्होंने ही कठोरता का काँटा दूर किया और उन्होंने ही निष्ठुरता का
समूल उखाड़ फेंका। साधु की कृपा समस्त प्राणिमात्र पर एक सी रहती है। यहाँ कुछ तथा वहाँ कुछ इस
प्रकार का भेदभाव वहाँ नहीं होता। उनके हृदय में अवकृपा नहीं रहती। दयालु मनुष्य का हृदय बड़ा विचित्र
रहता है। वह प्राणिमात्र का जीवन अपने जीवन में समाहृत कर लेता है और उनका दुःख हरण कर सुख देता
है। इस प्रकार उसकी कृपा अद्भुत रहती है। जिसके कारण उसे दुःख होता है उसे वह दूसरों को कदापि नहीं
देता और जिसके कारण उसे सुख मिलता है उसे वह प्राणिमात्र को अवश्य देता है। इसी का नाम है कृपा। यह