सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 317, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 317

ग्यारहवाँ अध्याय ३०१
संतों का प्रथम लक्षण है। दूसरा लक्षण है अद्रोहता। उसके बारे में भी बताता हूँ। अद्रोहता लोगों के बीच भटक
रही थी, उसे रहने के लिये स्थान नहीं मिल पा रहा था। तब वह साधु संतों की शरण में आयी। वहाँ उसे रहने
के लिये पर्याप्त स्थान मिला। साधु शरणागत पर दया करते हैं इसलिये उन्होंने अद्रोहता का प्रतिपालन किया।
वे प्राणिमात्र में भगवान का ही दर्शन करते हैं अतः उनमें द्रोह का नामोनिशान भी नहीं रह जाता। उनमें
व्याघ्रसर्प आदि के प्रति भी द्वेष उत्पन्न नहीं होता। वे उन्हें उपद्रव दें तो भी साधु उनका द्वेष नहीं करते। देह पर
कोई विपदा आ जाय तो उससे प्रारब्ध कर्म का ही नाश होता है इसलिये साधु उस आपत्ति के प्रति मन में द्वेष
नहीं आने देता और आत्मज्ञान के कारण क्रोध का स्पर्श भी नहीं करता। इसी को अद्रोहता कहते हैं। यह दूसरा
लक्षण है। अब तितिक्षा के सम्बन्ध में बताता हूँ, सुनो। इसका अर्थ है साधुओं के मन में होने वाली
सहनशीलता। शान्ति परदेसी हो गयी थी। वह जिसके पास भी जाती वह उसे लौटा देता था। तब वह अत्यन्त
दीन होकर संतों के घर आयी। संतों ने अत्यन्त प्रेम से उसका प्रतिपालन किया इससे वह भगवान की भी
लाडली हो गयी और उन्होंने सारा वैभव उसके सुपुर्द किया। वह सारा वैभव लेकर शान्ति संतों के ही पास ही
निरन्तर रहती है। इसीलिये उनमें दिन रात शान्ति दिखाई देती है। समस्त प्राणिमात्र भी यदि उन्हें त्रस्त करें तो
भी वे किसी को 'भला' या 'बुरा' नहीं कहते। वह आत्मशान्ति के आधार पर नाचता रहता है। वह उत्तम संत
है। ऐसी जो सहनशीलता होती है उसी का नाम 'तितिक्षा' है यह ध्यान रखो। यह संतों का तीसरा लक्षण है।
अब सत्य की सत्यता सुनो। सत्य इस जग में अल्पायु ही होता है, वह यहीं जन्म लेता है और यहीं मर जाता
है। उसका कहीं विकास नहीं होता था इसलिये वह संतों के पास आया। सत्य और संत की भेंट होते ही दोनों
का सत्यस्वरूप में विलय हो गया, सत्य संतरूप हो गया और सृष्टि में चिरंजीव हो गया। इस प्रकार सत्य संतों
की कृपादृष्टि से ही सत्यत्त्व से पुष्ट हो गया। वह संतों के बल से ही संसार में सर्वत्र फैल गया। इसीलिये
सत्य के योग से परब्रह्म से भेंट होती है। संतों के इस उपकार से उपकृत होने के लिये सत्य उनके चरणों पर
गिर पड़ा इसलिये सत्य को संतों के चरणों के सिवा कोई ठौर नहीं है। इस प्रकार जो सत्य का आधारस्वरूप
रहते हैं, जिनके पंखों के नीचे सत्य जीवित रहता है, जिनके बल से सत्य समर्थ होता है, जिनकी दृष्टि सत्य से
तृप्त होती है और जिनका व्यवहार सत्य भाषण से ही होता है, यही श्रेष्ठ की महानता है। वही संतों का घर
है। ऐसे ही संतों का मैं सम्मान करता हूँ। मैं निरन्तर उनके ही पास रहता हूँ। जिन्होंने असत्य आचरण न करने
का निश्चय किया रहता है, जिनके पास सत्य सप्रमाण उपस्थित रहता है, जो निरन्तर सत्य से सम्पन्न रहते हैं
उनका आचरण साधु का प्रमुख लक्षण है। इसी का नाम है 'सत्यसार'। यही संतों का सच्चा लक्षण है। यह
संतों का चौथा प्रमुख लक्षण है। अब शुद्ध और अपार गुण बताता हूँ, सुनो। जिसने निन्दा, मत्सर आदि सारे
दोषों को आत्मज्ञान से धो दिया और अनिंदित आत्मज्ञान से चित्त को अत्यन्त पवित्र कर लिया, जिसने गुरु
आज्ञारूप तीर्थ में स्नान किया और जिसके कारण सर्वांग रूप से शान्ति प्राप्त की, उसी प्रकार जो त्रिविध तापों
से मुक्त हो गया और मत्स्वरूप से पवित्र हो गया उसकी पवित्रता का क्या वर्णन किया जाय ? स्वयं तीर्थ भी
उसके चरणों के तीर्थ की इच्छा करते हैं। मैं स्वयं भी उसके पदरज की आकांक्षा करता हूँ फिर दूसरों की क्या
कथा कही जाय ? श्रीकृष्ण ने कहा, "हे उद्धव ! यह 'अनवद्य' नाम का पाँचवाँ गुण है। अब सबको समान
दृष्टि से देखने के छठवें गुण के बारे में सुनो। आत्मस्वरूप के कारण साधु को सर्व समता प्राप्त रहती है
इसलिये वह प्राणिमात्र को समान दृष्टि से ही देखता है। समुद्र में नमक का ढोंका डालने से जिस प्रकार वह
उसमें विलीन हो जाता है, उसी प्रकार उस साधु के अंतर में विषमता पूर्ण रूप से नष्ट हो जाती है। अनेक