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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 326, कुल 869 में से

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पृष्ठ 326

३१० श्रीमद् एकनाथी भागवत
करुणा। मन में धन की आशा कर वैद्य दवाइयों का पुलिंदा खोलता है अथवा सम्भावना पर दृष्टि रखकर जिस
प्रकार पौराणिक कथा सुनाने लगता है उस प्रकार का व्यवहार केवल विषय के स्वार्थ के लिये होता रहता है।
लेकिन साधु की बात वैसी नहीं होती। वह निरिच्छ होते हुए दयालु रहता है। उसकी आँखों में दया का समुद्र
भरा रहने के कारण ही वह अपना तन, मन, धन खर्च करके भी अनाथों पर दया करता है और दीनदुबलों को
संकट से मुक्त करता है। उसे अपने स्वार्थ की जितनी चिन्ता रहती है उससे भी अधिक चिन्ता अनाथ प्राणियों के
प्रति होती है। उद्धव! सचमुच इसी का नाम है पूर्ण दया। यह साधु का सत्ताईसवाँ लक्षण है, इसे ध्यान में रखो।
अब 'कवि' शब्द का प्रतिपादन ध्यान से सुनो। वेद और शास्त्र का रहस्य जिसे हाथ के मैल के समान स्पष्ट है
और जो सदैव ब्रह्मानन्द में डोलता रहता है उसका ही नाम सचमुच 'कवि' है। उपनिषद का अर्थ जिसके मुख
की ओर जोहता रहता है और शब्दज्ञान और अनुभवज्ञान जिससे सत्य होता है उसी का नाम 'कवि' प्रसिद्ध है।
'कवि' इस शब्द के वर्णन से अट्ठाईस लक्षण पूरे हो गये। अब दो अत्यन्त गहन लक्षण शेष हैं उन्हें अगले दो
श्लोकों में बताने का विचार श्रीकृष्ण ने किया।
आज्ञायैवं गुणान् दोषान् मयाऽऽदिष्टानपि स्वकान्।
धर्मान् संत्यज्य यः सर्वान् मां भजेत स सत्तमः ॥ ३२ ॥
प्रपंच नगर के चारों ओर 'कर्म' की दुस्तर नदी प्रसिद्ध ही है। उसी के जल पर जीव जीते हैं। उत्पत्ति और
स्थिति उसके इस तट पर होती है। उस नदी के जल से ही कर्म को कर्मफल आते हैं और उस पानी के बल से
ही स्वर्ग, नरक आदि का भोग भोगना पड़ता है। प्रपंच नगरी से निकल कर जो परमार्थ की ओर दौड़ कर आने
लगता है सो वह कर्मनदी में गोता खाकर डूब जाता है। कुछ ज्ञानी इसे तरना कहते हैं लेकिन वही कर्म में गोता
खाकर स्वयं डूबते हैं और दूसरों को भी उसमें डुबाते हैं। वे व्यर्थ ही तरने की बकवास करते हैं। ऐसे कितने डूबे
उनका पता नहीं है। लेकिन वही डूबते समय बताते हैं कि तरने का उपाय कर्म ही है और यह कहकर सबको
डुबाते हैं। 'न कर्मणां' यह वेद का वचन है। इसका अर्थ है 'कर्म' से कोई ब्रह्मज्ञानी नहीं होता। लेकिन कर्मठ
लोग इसे स्वीकार नहीं करते क्योंकि उन्हें कर्म का अहंकार रहता है। कर्म पूरी तरह देह के माथे रहता है। अगर
उस देह का ही अभिमान नहीं छूटा तो कर्म का त्याग कभी नहीं होगा उलटे देहबुद्धि से कर्मबन्धन अवश्य प्राप्त
होगा। कुछ ऐसे भी नष्ट होते हैं जो कर्म ही नहीं करते और कर्म नदी के इस तट पर खड़े होकर तर जाने की
बात करते हैं। इस प्रकार जो वर्णाश्रम कर्म का त्याग करने वाले होते हैं वे कर्म भ्रष्ट हैं। उन्हें पाखण्डी और पापी
समझना चाहिये। इस कर्मनदी को पार करके जाने वाला कोई एक भी वीर नहीं दिखाई देता। जब बड़े-बड़े नेता
इसमें डूब कर मर गये तो औरों की क्या बिसात है? इस कर्मनदी की उत्पत्ति सचमुच मुझसे ही है। उसका
यथार्थ भी तुम्हें आत्मज्ञान से बता देता हूँ। 'आज्ञायैवं' यह मूल श्लोक का पहला मूल पद है। उसके ही कारण
यह कर्मनदी फलीफूली है उसे स्पष्ट करता हूँ। मेरे आज्ञारूपी गम्भीर मेघों ने मेरे श्वासोच्छ्वास की वायु के योग
से चतुर्वेद की विधि की धाराओं की असीम वर्षा की। इससे कर्मनदी में असीम बाढ़ आयी। उतार किधर है,
किसी की समझ में नहीं आया। वहाँ गुण दोषों का घेरा पड़ा है तथा विधि-निषेधों के प्रवाह में कर्माकर्म का
भँवरा किस प्रकार भीतर बाहर घूम रहा है, देखो! संकल्प विकल्पों के बड़े-बड़े टीले नदी में चारों ओर खड़े हैं
जिससे नदी चारों ओर विस्तृत फैली हुई है। जो उसे पार करना चाहता है वह उन टीलों में फँसकर डूब जाता है।
एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाता। कहीं मगर के पाश में पड़ जाय तो फिर पूछिये ही मत। वह पूरा का पूरा
निगल जाता है। संकट में भी बाहर नहीं छोड़ता। देखते-देखते अधोगति तक पहुँचा देता है। अंगविकलता के