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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 318, कुल 869 में से

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पृष्ठ 318

३०२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
प्रकार के सुवर्ण के अलंकार खरीदने पर यदि उन्हें बाद में तोड़ा न जाय तो वे स्वाभाविक रूप से सुवर्ण ही
बने रहते हैं उसी प्रकार विविध प्रकार के आकार और नाम के कारण संसार विषम दिखायी देता है किन्तु साधु
चित्तस्वरूप होने के कारण जग को समान स्वरूप में देखता है। आत्मज्ञान के कारण वह विषमता को नहीं
देखता। ऐसी समसमान स्थिति में, दैवयोग से सुख-दुःख प्राप्त होते हुएं भी वह साम्यावस्था तद्रूपता के
स्वाभाविक ऐक्यभाव के कारण द्वंद्वभाव से मुक्त रहती है। दाहिनी ओर से आ मिली महानदी तथा बायीं ओर से
मिले गाँव के नाले को गंगा नदी उनके सारे गुणदोष त्याग कर अपने में एकरूप कर लेती है। फिर वहाँ यह
पवित्र है और वह अपवित्र है यह कहना बिलकुल ही सम्भव नहीं है। मधुरता तथा कटुता के भेद को गंगा
अपने स्वरूप से समरूपता प्रदान करती है। उसी प्रकार समदृष्टि होने के कारण साधु को सुख-दुःख की
भावना एक ही जैसी होती है। सदा आत्मज्ञान से परिपूर्ण रहना यही संतों का महान लक्षण है। बहुरूपिया एक
होते हुए भी गाय, बाघ के अलग-अलग रूप लेता है लेकिन उस स्वांग में एक बार बहुरूपिये को पहचान लेने
पर स्वांग का भ्रम दूर हो जाता है। उसी प्रकार भय अथवा अभय यह भाषा केवल द्वैत की भावना के कारण
होती है। साधु द्वैत की दृष्टि से एकरूपता से परिपूर्ण होने के कारण भय और निर्भय का भेद नहीं जानता। द्वंद्व
के समय समत्व से परिपूर्ण रहना यह साधु का छठवाँ लक्षण है। अब 'परोपकार' उसका सातवाँ लक्षण है।
वृक्ष अपने पत्ते, फूल, छाया, फल, छाल, लकड़ी, जड़ आदि से लोगों के लिये फलदायी होता है और सभी पर
सदा उपकार करता रहता है। जो वृक्ष का पालन-पोषण करता है अथवा उसे तोड़ने के लिये उसकी जड़ पर
जो प्रहार करता है उन दोनों को वह पुष्प, फल आदि से समान रूप से संतुष्ट करता है। वृक्ष फलों से लदा
रहता है लेकिन उनमें से एक भी फल वृक्ष चख कर नहीं देखता। उसी प्रकार जो कर्मफल का स्पर्श नहीं
करता वह अनायास ही परब्रह्मस्वरूप हो जाता है। उसी प्रकार साधु की काया, वाचा तथा मन से उपकार करने
के लिये ही होती है, अपना पराया का भेद वह जानता ही नहीं। सब पर उपकार करना ही वह जानता है। उसी
प्रकार जिस प्रकार चन्द्रमा आकाश में उदित होकर सारे संसार का अन्धकार दूर करता है, विश्व का ताप दूर
करता है और अपने किरणों से सबको शान्त कर देता है। उससे निकलने वाला अमृत केवल चकोर ही प्राशन
करे अन्य कोई न करें ऐसा भेद चन्द्रमा नहीं करता। जो भी जिस भावना से भजन करता है, उसी प्रकार उसे
सुख प्राप्त होता है। उसी प्रकार साधु के प्रति जो जैसी श्रद्धा रखता है, उसे वैसा ही सुख प्राप्त होता है। इस
प्रकार साधु सब पर उपकार करता है। कौए चन्द्रमा का धिःकार करते हैं और चकोर चन्द्रामृत प्राशन करते हैं।
उसी प्रकार दुष्ट साधुओं का धिःकार करते हैं और भक्तिवान साधु समागम से आत्मलाभ प्राप्त करते हैं। सातवें
गुण का विस्तार बताते समय परोपकार का वर्णन किया। अब अगले श्लोक में श्रीकृष्ण साधु के लक्षणों में से
ग्यारह और गुणों का लक्षण बता रहे हैं।
कामैरहतधीर्दान्तो मृदुः शुचिरकिंचनः ।
अनीहो मितभुक्शान्तः स्थिरो मच्छरणो मुनिः ॥ ३० ॥
शय्या पर उर्वशी भी आ जाय लेकिन फिर भी वह काम से क्षुब्ध नहीं होता, दिन रात स्वानंद में रमण
करते रहने के कारण वह विषयवासना को प्रायः भूल जाता है। भिखारी जब पालकी में बैठता है तो उसे पहले
के वाहनों का जिस प्रकार विस्मरण होता है उसी प्रकार यह भी आत्मानंद से तृप्त होने के कारण विषयवासना
उसे तुच्छ मालूम होती है और उसे उसका विस्मरण होता है। कोई वस्तु प्राप्त करने में असम्भव हो तो उसकी