श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 327, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंमत्स्य मांस की टोह में घूमते रहते हैं। कर्मठता के कछुए तो पत्थर की तरह कठोर होते हैं। जो भोगविलास के
कारण आलसी बन जाते हैं उन्हें कालसर्प अपने चंगुल में फँसा लेता है। उनके नाक में और मुँह में पानी भर
जाने के कारण मुँह से शब्द भी नहीं निकल पाता। कुछ व्यग्रता में डूब गये। कुछ तर जाने की आशा में कर्म के
प्रवाह में ही फँस जाते हैं। वे विधि निषेध के घेरे से सहसा बाहर नहीं आते। कुछ स्वकर्म के प्रवाह में फँस कर
दूर तक बहते चले जाते हैं। उन्हें सत्यलोक के मगर अपने बिल में घसीट ले जाते हैं। कुछ तो उस पार जा ही
नहीं पाते वे बीच ही में सुन्दर फल देखकर बीच रास्ते की ओर दौड़ते हैं और स्वर्ग के संकट में फँस जाते हैं।
युक्ति के बल पर तरने की आशा से जो निकलते हैं वे अहंकाररूपी भँवर में फँस जाते हैं जहाँ देव मछलियाँ उन्हें
निगल जाती हैं। कुछ तीनों वेदों की तुंबी दीक्षारूपी रस्सी से पेट के नीचे बाँध लेते हैं लेकिन वे अप्सराओं के
मायाजाल में फँस कर अंततः डूब जाते हैं। मंत्र-तंत्र का प्रयास करने वाले बेचारे दीक्षित तो अपने ही स्थान पर
डूब जाते हैं। सारांश यह कि कर्म नदी के उस पार पहुँचने वाला कोई नहीं दिखाई देता। यहाँ ऐसा कोई बिरला
ही दिखाई देता है। जो कोई इन सारे उपायों को एक ओर रख अनन्य भक्ति से मेरा भजन करता है उसे यह
कर्मनदी बिलकुल सूखा ही छोड़ देती है। जब तक मेरी भक्ति की नाव नहीं मिलती और उस पर प्रेम की पाल
नहीं चढ़ती तब तक बचाव के सभी प्रकार के प्रयास दुर्बल सिद्ध होते हैं। तो फिर ये पागल व्यर्थ का प्रयास क्यों
करते हैं ? अनन्य भक्ति का मार्ग स्वीकार कर, धर्मकर्म का त्याग करना यही तरने का सर्वोत्तम उपाय है। अन्य
कोई भी उपाय दुर्बल तथा अधोगति तक पहुँचाने वाला है। अपना धर्म क्या है और कर्म क्या है यह जाने बिना
अथवा मन से ही नास्तिकता स्वीकार कर अथवा आलस के कारण जो कर्म का त्याग करते हैं, यह उस प्रकार
का त्याग नहीं है अथवा शरीर को क्लेश होगा इस भय से, अथवा आलस के कारण या ज्ञान के अहंकार से जो
कर्म नहीं छोड़ते उस प्रकार का भी त्याग नहीं है यह ध्यान में रखो। मेरी वेदरूपी आज्ञा अत्यन्त पवित्र है। उन
वेदों का विस्तार से विचार कर स्वधर्म कर्मों के जो कर्मवाद हैं उन्हें जानने वाला तथा स्वधर्मगुण अत्यन्त उत्तम
है तथा उसमें बिगाड़ आ जाने से अधःपतन होता है ये दोनों बातें ध्यान में रखकर जो मेरी भक्ति के प्रति समर्पित
होता है, ऐसा भक्त अन्य किसी बात का स्मरण न कर अखण्ड हरि का ही स्मरण करता है। इसी को कहते हैं,
भक्ति में बिका प्राण! अन्य भजन आनुमानिक हैं। मेरे भजन प्रेम के कारण वह कर्म की याद भी भूल जाता है।
दरिद्र कर्म को कौन पूछता है ? वह भक्तों को बाधक नहीं होता। मेरे प्यार भरे भजन में रंग जाने पर वह सारे
कर्मों को भूल जाता है। वही भजन की समाधि है ऐसा समझना चाहिये। वहाँ सचमुच ही कर्म बाधक नहीं
होता। जिसकी कर्म पर श्रद्धा रहती है वही कर्म का अधिकारी होता है और जिसकी श्रद्धा श्रीकृष्ण पर होती है
वह कर्म का अधिकारी नहीं होता। जो जीवभाव से भक्ति को ही समर्पित होता है वह तत्क्षण कर्म से विलग हो
गया ऐसा मानना चाहिये। उसके भावार्थ पर जब मैं बिका तब वह कर्म में कैसे बँध सकता है ? गुणदोषों की
जननी अविद्या का जिसने निराकरण कर दिया और मेरे भजन में मग्न हो गया उस साधु को मैं प्रणाम करता हूँ।
देह में आत्म भावना की जो कल्पना है उसे ही मुख्य रूप से अविद्या समझना चाहिये। वह कल्पना ही यदि
अपने स्थान पर समाप्त हो जाय तो सचमुच संसार से अविद्या नष्ट हो जाती है। अविद्या का त्याग हो जाने पर
उसके साथ ही धर्म-अधर्मादिक का भी अपने आप त्याग हो जाता है। मस्तक टूट जाने पर शरीर कर्म करने के
लिये उठ नहीं पाता उसी प्रकार अविद्या का त्याग होने पर सभी धर्मों का त्याग धीरे-धीरे हो ही जाता है। देखो!
दिन में चन्द्रमा का उदय दिखायी देने पर भी वह होते हुए भी न होने जैसा होता है। उसी प्रकार अविद्या का
अस्त हो जाने पर धर्म के सभी प्रकारों की वही स्थिति होती है। सूर्योदय हो जाने पर खोजने पर भी जुगनू नहीं