श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 315, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंग्यारहवाँ अध्याय २९९
ज्ञानी और वक्ता अनेक हैं, पर वे रजतमगुणयुक्त हैं। वे अपने-अपने गुणों के अनुसार निरूपण करते हैं
: इसलिये उन्हें पूछना मन को स्वीकार नहीं होता और अति सात्विक पुरुष सत्वगुण से ही व्याप्त रहता है इसलिये
वह जब बोलने लगता है तो उसका वाक् प्रवाह गलत दिशां की ओर होने लगता है। इससे शुद्ध आत्मज्ञान नहीं
हो पाता। लेकिन हे कृष्णनाथ ! तुम वैसे नहीं हो। सच्चे गुण तुम्हारे ही पास हैं। तुम केवल लीला से देह धारण
करते हो और आत्मज्ञान देने वाले एक तुम ही हो। इसीलिये तुम्हें त्रिभुवन में 'उत्तमश्लोक' (जिसकी कीर्ति
पवित्र है) कहते हैं। इसलिये तुम्हारे अतिरिक्त अन्य कोई हमें स्वीकार नहीं है। हे कृष्णनाथ मेरे प्रश्न का उत्तर
देने वाले एक तुम ही हो। तो तुम्हें जो सर्वथा मान्य हो ऐसा साधु कौन है? जो जो साधु पुरुष तुम्हें मान्य है
उनके लक्षण बताओ। कौन-सी भक्ति तुम्हें प्रिय है? उसके भी लक्षण बताओ। जो तुम्हें प्राप्त करा दे, अत्युत्तम,
श्रेष्ठों में श्रेष्ठ तथा संतों ने आदरपूर्वक जिसे स्वीकार किया हो ऐसी श्रेष्ठ भक्ति कौन-सी है? तुम कहोगे, संतों
ने किस भक्ति को आदर से स्वीकार किया है इसे संतों से ही पूछो, तो मेरा सारा विश्वास तुम्हारे भाषण पर है।
इसलिये दूसरे से पूछना मुझे स्वीकार्य नहीं है। जो लोग अलग-अलग देवताओं का भजन करते हैं, वे अपने ही
देवता की भक्ति को उत्तम कहते हैं। लेकिन हे श्रीकृष्ण! आपको जो मान्य हो वही मुझे बतायें। कुल, शील और
भाषण जिनका समान होता है उस पुरुष को ही साधु कहते हैं। लेकिन तुम अपने मुख से जिसे शुद्ध कहोगे वही
मेरे लिए वन्दनीय है। अगले श्लोक में उद्धव ने शार्ङ्गधर श्रीकृष्ण की तीन सम्बोधनों से प्रार्थना की है। उन तीन
सम्बोधनों में नियोजित तीन विशेषणों से उसने अपने विचार श्रीकृष्ण को समर्पित किये और मैं श्रवण करने का
अधिकारी हूँ यह भी बताया।
एतन्मे पुरुषाध्यक्ष लोकाध्यक्ष जगत्प्रभो।
प्रणतायानुरक्ताय प्रपन्नाय च कथ्यताम् ॥ २७॥
पुरुषों में उत्तम पुरुष तुम हो, सारे कर्मों का तथा धर्मों का विचार करने वाले तुम हो इसीलिये हे सर्वसाक्षी
गोविन्द ! तुम्हें 'पुरुषाध्यक्ष' कहते हैं। जैसा कर्म रहता है उसी के अनुसार उसका फल देने वाले तुम हो इसीलिये
तुम्हारा वर्णन लोकाध्यक्ष के रूप में होता है। उसी प्रकार ब्रह्मादिकों के नियंता और संसार का प्रतिपालन करने
वाले तुम ही हो। हे श्रीकृष्ण! "यदि संसार का पालन करने वाला मैं ही हूँ, और उस संसार में तुम भी हो तो
तुम्हें ही मैं ज्ञानकथा सुनाऊँ ऐसी कौन सी विशेषता तुझमें है?" ऐसा तुम कहोगे। लेकिन तुम्हारे यह कहने पर
भी तुम सर्वज्ञ और सर्वेश्वर हो, तुम अन्तरात्मा तथा सबका नियमन करने वाले ईश्वर हो इसलिये यदि तुम्हें मेरा
अधिकार ठीक लगता हो तो मुझे ज्ञान का निर्धार बताओ। मुझे अधिकार न भी हो तो भी मैं तुम्हारी शरण/में
आया हूँ। तुम्हारे यहाँ तो शरणागत की उपेक्षा कभी नहीं होती। विषयवासना में दारुण दुःख है यह जानकर ही
तुम्हारे चरणों में आया हूँ। अत्यन्त दीन होने के कारण मैं तुम्हारा भिखारी हो गया हूँ। इसलिये मुझ पर अवश्य
कृपा करो। मेरी वासनाएँ असीम हो गयी हैं उनका निस्तारण करना मेरे बस में नहीं है। हे कृष्ण! उनका तुम
निवारण करो। इसलिये मैं तुम्हारे चरणों में आया हूँ। मैं तुम्हारा लाडला भक्त हूँ यह कहने में भी अहंकार मालूम
होता है। लेकिन हे अनन्त ! तुम सर्वज्ञ हो और दीनों के प्रति कृपालु हो। हे श्रीकृष्ण! मैं ही एक श्रवण का
अधिकारी हूँ यह भी मैं नहीं कह सकता। इसलिये हे कृपानिधे ! मुझ पर कृपा करें। यह कहकर उसने उनके पैर
पकड़ लिये। "हम दोनों एक ही कुल में पैदा हुए नैसर्गिक मित्र हैं इसलिये मेरा पैर पकड़ना ठीक नहीं है।"
ऐसा यदि तुम कहोगे तो हे गोविन्द ! यह कहने का मर्म भी मैंने जान लिया है।