श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 324, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें३०८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
नहीं जाने देता। देह को अनेक प्रकार के सुख प्राप्त हों अथवा उसे हाथी के मस्तक पर बैठा दिया जाय तो भी
वह मन को देहाभिमान के पास भटकने नहीं देता अथवा प्रलयकाल के गड़गड़ाहट से भले ही पंचमहाभूतों में
अफरातफरी मची हुई हो लेकिन वह अपने श्रेष्ठ धैर्य से मन को देह से नहीं मिलने देता। इस बीच वह काल
की जबर्दस्त चोट के कारण वृत्ति को परब्रह्म की राह पर निश्चयपूर्वक लाकर चित्स्वरूप के बाजार में बेच देता
है। वहाँ उसे तत्काल स्वानंदरूपी उत्तम ग्राहक मिल गया तो उसने जीव के साथ मन, बुद्धि, प्राण, विवेक आदि
देकर उससे बदले में स्वानंद ले लिया। इसी का नाम है धैर्य ! साधु का यह इक्कीसवाँ गुण है। अब षट्विकारों
पर किस प्रकार विजय प्राप्त की जाती है यह भी सुनो। वह साधु स्वानंद से तृप्त रहता है इसलिये उसे भूख नहीं
लगती। सांसारिक जीवन से वह तृप्त रहता है इसलिये उसे प्यास का भी विस्मरण हो जाता है। आत्मसुख का
उपभोग करते-करते शोक और दुःख तो भूल ही गया। चित्स्वरूप के ज्ञान से सन्देहरहित हो जाने के कारण मोह
भी उसके सामने नहीं आता। वह जागृति, स्वप्न और सुषुप्तावस्था इन तीनों से बाहर आत्मज्ञान के परिसर में
रहता है। वहाँ यदि जरा का आगमन होता है तो वह थर-थर काँपने लगता है। उसका कार्य और कारण दोनों ही
व्यर्थ हो जाते हैं। देहपन से उसे देह का भी भान नहीं रह पाता इसलिये मृत्यु की भी मृत्यु हो जाती है। वह
साक्षात् काल को भी निगल लेता है। इस प्रकार इन षट्विकारों को अनायास ही जीत कर साधु निश्चिंत होकर
इस संसार में जीते हैं। यह उसका बाईसवाँ लक्षण है। सभी प्राणियों में उसे अपने स्वामी (ब्रह्मस्वरूप) का दर्शन
होता है। फिर मान-सम्मान की अपेक्षा किससे की जाय ? इसलिये सचमुच ही मान-अभिमान का त्याग कर वे
विनम्र वृत्ति से जीते हैं। पहले देह में अभिमान जागृत होता है, तब मान-सम्मान की इच्छा होती है यह नियम है।
लेकिन यहाँ तो देह का भान ही नहीं रह गया है इसलिये मान-अभिमान भी रसातल में पहुँच जाते हैं। इसी का
नाम 'अमानिता' है। यह साधु का तेईसवाँ लक्षण है। अब 'साधु' किस प्रकार सम्मान देता है यह भी सुनो। वह
ब्रह्मदेव से लेकर मक्खी तक सभी को शिरसावंद्य मानता है। चराचर में सर्वत्र उसकी एकनिष्ठता रहती है।
ब्रह्मस्वरूप के अतिरिक्त अन्य किसी बुद्धि को वह जानता भी नहीं है। समस्त प्राणिमात्र में वह ब्रह्मरूप ही
देखता है और इसीलिये वह सब के आगे साष्टांग दण्डवत् करता है। वह देवता, मनुष्य अथवा गधे के बीच
भेदभाव नहीं करता। सभी को वह बड़े सन्तोष से नमन करता है। कितने ही कौशल से विभिन्न प्रकार के
अलंकार क्यों न बनाये गये हों लेकिन उससे सोने के गुण में कमी नहीं आती। उसी प्रकार नाम अथवा रूप की
भिन्नता के कारण वह अपने मन में रंच मात्र की भी कमी नहीं लाता। चीनी का निंबोली का कड़ुआ फल बनाने
से वह कड़ुआ नहीं हो जाता। उसी प्रकार सुअर जैसा कितना ही कनिष्ठ जानवर क्यों न हो लेकिन उसका
ब्रह्मस्वरूप नष्ट नहीं होता। समुद्र में भयंकर से भयंकर लहरें उठती हैं लेकिन उनमें शुद्ध पानी ही रहता है उसी
प्रकार कोई भी प्राणी हो उसमें ब्रह्मस्वरूप ही भरा रहता है। इसी प्रकार साधु समस्त प्राणियों को सम्मान ही देता
है। यही उसका इक्कीसवाँ लक्षण है। अब उसकी 'परबोधकता' अर्थात् दूसरों को बोध करने के सामर्थ्य के बारे
में सुनो। जिसका जैसा भाव और श्रद्धा होती है उसे वैसा ही उपदेश करना साधु को भाता है। कोई ज्ञान प्राप्त
करने पर भी पागल ही बना रहे और उसके अंतःकरण में उस ज्ञान की अव्यवस्थित छाप ही पड़ी रहे तो सच्चे
शिष्य की वास्तविक स्थिति उसकी समझ में नहीं आती। अर्थात्, ऐसा गुरु उपदेश करने के लिये पात्र नहीं होता।
कोई यदि ज्ञान के आश्चर्य से ही अंतःकरण भर जाने के कारण विस्मय से स्थितःप्रज्ञ होकर रह जाय और
लकड़ी की तरह या ढोंके की तरह पड़ा रह जाय तो गुरु को उपदेश करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती।
कोई ज्ञान प्राप्त होने पर कंजूस हो जाता है। प्राण जाने पर भी वह कुछ नहीं बोलता। भय के कारण मौन ही