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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 869 में से

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पृष्ठ 322

३०६ श्रीमद् एकनाथी भागवत

पूर्वजों का मूल निवास होता है। अपना सबसे उत्तम आधार वही है। वहीं जिसका मनोधर्म स्थिर रहता है और
मेरा जन्म ही नहीं हुआ है, मैंने मृत्यु देखी ही नहीं है यह भावना मन में स्थिर हुई रहती है उस स्थिति को
'स्थिरता' कहते हैं। अपने आश्रम को चारों आश्रमों में श्रेष्ठ समझता है तथा अपना मनोधर्म स्थिर कर वर्णाश्रम
चलाता है तथा चारों वर्णों में जिसे पवित्रता प्राप्त हुई है, जिसके कारण ब्राह्मणों को ब्राह्मणत्व प्राप्त हुआ है ऐसे
ब्रह्म के स्थान पर जिसका मन स्थिर हुआ है, उसी स्थिति को 'स्थिरता' कहा जायगा। त्रिभुवन में स्थिरता
बिलकुल मरने जैसी स्थिति में आ गयी थी। उसका हाथ थामने वाला और उसका पालन करने वाला कोई
दिखायी नहीं दे रहा था। उसे कोई द्वार पर खड़ा नहीं करता था फिर पथ्य आदि कौन देता ? सबने उसे लावारिस
की तरह छोड़ दिया था, तब सज्जनों ने उसका पालन-पोषण किया। इस प्रकार स्थिरता संतों के बल पर अच्छी
तरह हृष्ट-पुष्ट हुई, वर्णाश्रमादि झूठे भेद नष्ट कर तथा अकारादि मातृकों का भेद कर एकदम बड़ी हो गयी और
स्वस्वरूप में एकत्व प्राप्त कर स्थिरता वहीं स्थिर हो गयी। तब उसने सहज ही संतों को मार्ग प्रशस्त कर दिया।
तब स्वस्वरूप से ही स्वकर्म करना स्वस्वरूप से ही वर्णाश्रम चलाना तथा स्वस्वरूप से ही स्वधर्म का पालन
करना यही स्थिरता का स्वरूप है ऐसा जो हमारे धर्म कर्म का आचरण है, उसी का नाम उत्तम स्थिरता है। अब
'मेरी शरण में आना' यह जो सोलहवाँ लक्षण है उसके सम्बन्ध में सुनो। नदी जब समुद्र की शरण में आती है तो
वह उससे एकरूप होकर समुद्र स्वरूप ही हो जाती है। उसी प्रकार जो वृत्ति मेरी शरण में आती है वह मत्स्वरूप
ही हो गयी ऐसा समझना चाहिये। नमक पानी की शरण में आता है तो उसका तत्काल पानी हो जाता है, उसी
प्रकार जो अनन्य भाव से मेरी शरण में आता है वह मेरे ही रूप में रहता है यह ध्यान में रखो। मेरी शरणआकर
जो मान-सम्मान अथवा कीर्ति की अपेक्षा करता है वह गुड़ में कंकड़ की तरह होता है। गुड़ से सना हुआ पत्थर
गुड़ से लिपटा रहता है लेकिन खाना बनाते समय उसका असली स्वरूप मालूम होता है। उसी प्रकार जो बाह्य
रूप से मेरा भजन करता है और मन में विषय की अभिलाषा करता है, वह वास्तव में अनन्यभाव से मेरी शरण
में नहीं आया है। उसे लालच का बहुत बड़ा कलंक लगा हुआ है। कोई लड़की सर्वांग सुन्दर हो किन्तु उसकी
नाक पर कोढ़ का सफेद दाग हो तो जैसे कोई पुरुष उससे शादी नहीं करेगा उसी उसी प्रकार मेरे भजन में विषय
लोभ दोष है यह ध्यान में रखो। या जैसे विधवा सुहाग की बिन्दी माथे पर लगाती है तो लोग उस पर थूकते हैं
या जैसे 'कै' को लोग अत्यन्त घृणित मानते हैं, उसी प्रकार विषय की अभिलाषा अत्यन्त निन्दनीय है। त्रैलोक्य
के साम्राज्यवैभव का विस्तार कर जो मेरी शरण में आता है वह ऐक्य भाव से मेरे जैसा हो जाता है। फिर उसे
मान-अपमान कैसा ? इसी का नाम है मेरी शरण में आना। उद्धव ! यह सत्रहवाँ लक्षण है इसे ध्यान में रखो। अब
'मनन' नामक गुण के बारे में सुनो। वेदशास्त्र अथवा गुरुवचनों का निरूपण श्रवण करने अथवा अद्वैत का श्रवण
करने के उपरान्त युक्तिपूर्वक साधक बाधक विचारों से मन में विचार करने का नाम है 'मनन' । अग्नि और कपूर
का मिलन होने पर वह कपूर अग्निरूप ही हो जाता है, उसी प्रकार मेरे स्वरूप में मन रखने पर वह मन
चित्स्वरूप हो जाता है। जिस प्रकार जल में उत्पन्न नमक जल में मिलते ही जलस्वरूप हो जाता है, उसी प्रकार
मन भी चित्स्वरूप का ही अंशभूत रहता है, मनन के योग से वह चित्स्वरूप हो जाता है। अस्तु ! मनन के ही
सामर्थ्य से जहाँ तक मन पहुँचना चाहता है, वहाँ तक उसके साथ मैं रहता हूँ, अथवा यदि वह स्थिर रहता है तो
वहाँ भी मैं रहता ही हूँ। दीपक जिधर भी जाकर बैठता है वहाँ तो प्रकाश रहता ही है और अगर कहीं भी गये
बिना वह अपने ही स्थान पर रहता है तो वहाँ भी प्रकाश रहता है। उसी प्रकार मेरा मनन करते हुए यदि मन
मद्रूप हुआ तो फिर वह कहीं भी जाय लेकिन उसकी मद्रूपता नहीं टूटती। इस प्रकार मेरा जो केवल शुद्ध स्वरूप