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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 329, कुल 869 में से

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पृष्ठ 329

ग्यारहवाँ अध्याय ३१३
ही मैं अपने मन से यह कथा नहीं लिख रहा हूँ। इसे लिखवाने वाला श्रीकृष्ण ही हैं इसे श्रोतागण सत्य मानें।
अब श्रोतागण सावधान हो जायें। कथा का पिछला सन्दर्भ यह है कि दोनों एक दूसरे से गले मिले थे और उद्धव
को अत्यन्त आश्चर्य हुआ था। कृष्णनाथ प्रेम से विह्वल हो गये थे, उन्होंने अपने को सँभाला और उद्धव की पीठ
थपथपा कर उसे सावधान किया। उसने उद्धव से कहा "सचमुच तुम्हें भक्ति की कथा अच्छी लगी अतः मैं तुम्हें
वही कथा सुनाता हूँ। ध्यान देकर सुनो। कोई मुझे जान कर मेरा भजन करता है तो भाव ही मुझे भजता है।
लेकिन मैं उन दोनों को ही भक्ति में रमता हूँ और ये दोनों ही मुझे अच्छे लगते हैं।"
ज्ञात्वाज्ञात्वाथ ये वै मां यावान् यश्चास्मि यादृशः ।
भजन्त्यनन्यभावेन ते मे भक्ततमा मताः ॥ ३३ ॥
आत्मस्वरूप में रहनेवाला, सच्चिदानंद, जगत का आदि, आनन्द का मूल स्रोत, नित्य सिद्ध, परमपवित्र ऐसे
मेरे रूप को वे भली-भाँति जानते हैं। देश, काल और वर्तमान इन सबमें सदा परिपूर्ण, सर्वात्म, सच्चिदानंदघन
तथा भेदरहित ऐसा एक मैं ही हूँ। सत्य, ज्ञान और अनन्तस्वरूप परब्रह्म वास्तव में मैं हूँ। यह जानकर जो मेरा
भजन करते हैं वही उत्तम भागवत हैं इसे ध्यान में रखो। तुम कहोगे कि शुद्ध स्वरूप की प्राप्ति हो जाने के बाद
भजन कैसे किया जाय ? तो इसका उत्तर यह है कि जब देवता और भक्त दोनों वही बन जाते हैं और 'मैं' होकर
मेरा भजन करते हैं। दायाँ और बायाँ ये दोनों भाग अलग हैं किन्तु शरीर एक ही है उसी प्रकार देवता और भक्त
ये विभाग मेरे स्वरूप में पूर्णरूप से दिखायी देते हैं। जरा देखो ! लोहे का दर्पण बनाना है तो उसे लोहे से ही
बनाना होता है और वह अपने प्रकाश से प्रकाशित हो इसलिये उसे लोहे से ही चमकाना होता है। दर्पण साफ हो
जाने के बाद वह चन्द्र, सूर्य, आकाश, पृथ्वी के प्रतिबिम्ब स्वयं में धारण करता है। यह उससे अनायास ही होता
है। उसी प्रकार मेरे भक्त भी जब 'मैं' होकर अनन्यभाव से मेरा ही भजन करते हैं तब मेरा सारा वैभव उनमें
प्रतिबिम्बित होता है। अथवा जिस प्रकार समुद्र में लहरों के ऊपर और नीचे पानी ही रहता है उसी प्रकार मेरा
भक्त मुझ में ही होने के कारण अंतर्बाह्य मद्रूप ही होता है। जिस प्रकार नृसिंह की सुवर्ण की मूर्ति सुवर्ण के ही
हिरण्यकश्यपु का विदारण करती है और सुवर्ण के ही प्रह्लाद को गले लगाती है वैसी ही मेरे भजन की स्थिति
है। वहाँ सगुण और निर्गुण रूप में मैं ही रहता हूँ। जिस प्रकार सुवर्ण और कंगन अभिन्न होते हैं उसी प्रकार मद्रूप
हो जाने के बाद वह और मैं दोनों अभिन्न ही रहते हैं। इसलिये वह जिधर भी देखता है उधर उसे मेरा ही स्वरूप
दिखाई देने लगता है और दृश्य, द्रष्टा का त्रिगुट नष्ट होकर वह तत्काल मत्स्वरूप में मिल जाता है। यह जानकर
जो मेरा भजन करते हैं, वही भक्त उत्तम होते हैं, यह जान लो। उसी प्रकार मुझे जाने बिना जो मेरा भजन करते हैं
वे मेरे भोले भक्त हैं। उस भोले भक्त ने वेदों का पठन नहीं किया होता, वेदांतशास्त्र का श्रवण नहीं किया होता
उसमें विकल्प का लक्षण नहीं होता, वह केवल अनन्य भावार्थी होता है। उसे सगुण, निर्गुण का ज्ञान नहीं होता
लेकिन हृदय में देवता का वास है इतना वह जानता है। देह में जड़त्व है इसीलिये देवता उससे आचरण कराता
है। अपनी आँखें निकाल कर अलग से दूर रखे तो वहाँ हृदयस्थ नारायण न होने के कारण वह अन्धा ही होता
है। इसलिये देखने की कला भी देवता की ही होती है। जीभ केवल चमड़े की होती है। उसे रस का स्वाद क्या
होगा ? उसे काट डालने से वह बेचारी किसी प्रकार का स्वाद नहीं जानती। इसलिये जिह्वा के द्वारा रसास्वादन
करने वाला हृदयस्थ परमात्मा ही है। बुद्धि को ज्ञान प्रदान करने वाला भी सचमुच हृदय का नारायण ही है। मन
का आवागमन भी उस हृदयस्थ के ही अधीन होता है इसीलिये जब दूर हो जाने पर भी वह लौटकर हृदय में ही