ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
इस कीर्ति-स्मरणसे सदैव । भोगते महा-सुखका वैभव ।
हर्षामृत उर्मिपर स-भाव । डुलते जाते ॥ ३ ॥
अजी ! जीनेसे है यह जग । तुझसे करता अनुराग ।
तथा करनेसे दुष्ट-भंग । अधिकाधिक ॥ ४ ॥
किंतु त्रिभुवनके राक्षस । भय खाते तेरा हृषीकेश ।
तथा भागते हैं दिशा दस । अमर्याद ॥ ५ ॥
और ये सुर सिद्ध किन्नर । अथवा सभी सचराचर ।
देख तुझको है नमस्कार । करते सहर्ष ॥ ६ ॥
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्
गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
अनंत देवेश जगन्निवास
त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥ ३७ ॥
अजी ! यहां किस कारण । राक्षस ये जो नारायण ।
न झुकते तव चरण । भागते सदैव ॥ ७ ॥
और यह तुझको क्या पूछना । इतना तो हमको भी जानना ।
सूर्योदय बाद कैसे रहना । अंधःकारका साध्य ॥ ८ ॥
तू है स्वयं-प्रकाशका आगर । और हुवा है अब जो गोचर ।
तभी निशाचरोंका है अंधार । मिटा सहज ॥ ९ ॥
अब तक जो थे हम जन । न जानते थे तेरी महान ।
महिमा उसका हुवा ज्ञान । इसी समय ॥ ५१० ॥
प्रभो न क्यों ये तुझको नमेंगे
आधार तू ब्रह्मका आदि-कर्ता
अनंत देवेश जगन्निवास
है या नहीं के पर है परेश ॥ ३७ ॥
३८३ विश्व-रूप-दर्शनयोग
जहांसे विविध सृष्टि-माळ । फैलती भूत-ग्रामकी बेळ ।
ब्रह्म जो तेरी इच्छाका फळ । प्रसवता है ॥ ११ ॥
देव ! निःसीमत्व सर्वोदित । देव ! निःसीममें गुण अनंत ।
देव ! निःसीमागम्य सतत । देवेंद्र देवका ॥ १२ ॥
तू है जगत्त्रयका जो आश्रय । अक्षर सदाशिव है निश्चय ।
तू ही सत-असतका प्रश्रय । उससे परेका ॥ १३ ॥
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण
स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम
त्वया ततं विश्वमनंत रूप ॥ ३८ ॥
प्रकृति पुरुषका तू आदि । तू ही महत्तत्वकी अवधी ।
स्वयं तू है जो आदि अनादि । पुरातन पुराण ॥ १४ ॥
तू सकळ विश्वका जीवन । जीव मात्रका तू ही निधान ।
भूत और भविष्यका ज्ञान । तेरे ही करमें ॥ १५ ॥
श्रुतिका तू है लोचन । स्वरूप सुख अभिन्न ।
त्रिभुवन आयतन- । का आयतन तू ॥ १६ ॥
इसीलिये तू परम । तू ही रहा महा धाम ।
कल्पांतमें महद्ब्रह्म । तुझमें विलीन ॥ १७ ॥
वास्तवमें तू ही है देव । विश्व विस्तारता सदैव ।
अनंत रूप देवदेव । अवर्णनीय ॥ १८ ॥
देवादि तू, देव पुराण आत्मा
संसारका अंतिम आसरा तू ।
तू जानता है तुझ मोक्ष-धाम
विस्तारिता विश्व अनंत रूप ॥ ३८ ॥
ज्ञानेश्वरी ३८४
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशांकः
प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः
पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥ ३९ ॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते
नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं
सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥ ४० ॥
एक तू क्या नहीं है देव । तथा कहां नहीं तू देव ।
जहां जैसे ही तू है देव । नमस्कार मेरा ॥ १९ ॥
वायु है तू अनंत । यम तू नियमित ।
भूतमात्रमें नित । बसता तू अग्नि ॥ ५२० ॥
वरुण और तू सोम । सृष्टा तथा तू है ब्रह्म ।
पितामहका परम । आदि जनक तू ॥ २१ ॥
और जहां जो जो कुछ है । रूप है अथवा नहीं है ।
नमन जहां जैसा भी है । जगन्नाथ तुझको ॥ २२ ॥
तू अग्नि तू वायु समस्त देव
प्रजापते ब्रह्म-पिता सु-श्रेष्ठ ।
तुझे नमस्कार सहस्र बार
पुनः पुनः और पुनः पुनः है ॥ ३९ ॥
आगे कि पीछे सब ओर देव
सदा नमस्कार जहां जहां तू ।
उत्साह सामर्थ्य अनंत तेरा
सभी बना तू तुझमें सभी है ॥ ४० ॥
(49) ३८५ विश्व-रूप-दर्शनयोग
ऐसा हो सानुराग चित्त । स्तुति करता पांडुसुत ।
आगे पीछे नमन नित । कहता नमस्ते ॥ २३ ॥
पुनः देखता साद्यंत । श्रीमूर्त्ति जो है सतत ।
तथा कहता है पार्थ । नमस्ते देव ॥ २४ ॥
देख देख कर सतत । प्रसन्न होता पार्थ-चित्त ।
कहता है वह हो नत । नमस्कार देव ॥ २५ ॥
यहां चराचरमें समस्त । देखता उसीको अखंडित ।
तथा करता है प्रणिपात । नमस्कार देव ॥ २६ ।
वह रूप ऐसा अद्भुत । आश्चर्य स्फूर्त जो अनंत ।
पुनः पुनः कहता पार्थ । नमस्कार देव ॥ २७ ॥
अन्य स्तवन न सूझता । शांत रहना भी न होता ।
ऐसा प्रेम भाव जगता । कहता नमस्कार ॥ २८ ॥
वास्तवमें ऐसा ही बार बार । नमन करता सहस्र बार ।
फिर कहता है श्री चक्रधर । प्रणाम तेरे सम्मुख ॥ २९ ॥
देवका पेट पीठ है नहीं । इससे हमें लाभ भी नहीं ।
फिर भी तेरी पीठको सही । नमस्कार स्वामी ॥ ५३० ॥
रहा है तू मेरे पीछेसे । तभी पीछे कहता तुझसे ।
सम्मुख विमुख विश्वसे । होता नहीं तेरा ॥ ३१ ॥
भिन्न भिन्न अब अवयव । नहीं जान सकता मैं देव ।
तभी नमन तुझको सर्व- । सर्वात्मक स्वामी ॥ ३२ ॥
देव ! तू अनंत बल-धाम । नमन है अमित विक्रम ।
सकल काल सर्वत्र सम । सर्वेश देव ॥ ३३ ॥
अजी ! संपूर्ण अवकाशमें जैसे । आकाश ही आकाश रहता ऐसे ।
सर्वत्वमें तू सर्व-व्यापी है वैसे । हुआ सर्व-सर्व ॥ ३४ ॥
अथवा तू है केवल । सब ही सब अखिल ।
क्षीरार्णवमें कल्लोल । क्षीरका जैसे ॥ ३५ ॥
ज्ञानेश्वरी ३८६
इसीलिये हे देव । भिन्न नहीं तू सर्व ।
हुआ है अनुभव । सर्व सर्व तू है ॥ ३६ ॥
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं
हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
अजानता महिमानं तवेदं
मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥ ४१ ॥
किंतु तू है ऐसा महान । हमें नहीं इसका भान ।
या तुझे आप्त ही मान । किया बर्ताव ॥ ३७ ॥
हुई यह बड़ी अनुचित बात । लिया मैंने संमार्जनमें अमृत ।
कामधेनु देकर किया स्वीकृत । गर्दभ-शावक ॥ ३८ ॥
चट्टान मिला था हमको पारसका । तोड़के आधार बनाया मकानका ।
औ' काटकर बनाया सुर-तरुका । खोंडा बगियामें ॥ ३९ ॥
हाथ लगी थी चिंतामणिकी खान । किया जो गोरु हांकनेका साधन ।
वैसे तेरी समीपताके कारण । खोया महत्व ॥ ५४० ॥
यह क्या युद्ध तथा इसका मूल्य । परंतु है तू परब्रह्म अमूल्य ।
फिर भी आज दिया है तुझे कार्य । सारथी बनाके ॥ ४१ ॥
उन कौरवोंके घर । शिष्टाईमें चक्रधर ।
बेचा है तू सर्वेश्वर । सामान्य बातमें ॥ ४२ ॥
योगियोंका तू समाधिसुख । यह नहीं जानता मैं मूर्ख ।
तेरा उपरोध मैं सन्मुख । तुझसे ही करता ॥ ४३ ॥
समान माना अविनीत होके
हे कृष्ण हे यादव हे सखा जो ।
न जानके ये महिमा तिहारी
प्रमाद् या प्रेमसे ही पुकारा ॥ ४१ ॥
३८७ विश्व-रूप-दर्शनयोग
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि
विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं
तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ ४२ ॥
हे आदि अनादि पुरुष ! तुझसे हंसी-विनोद किया क्षमा कर —
इस विश्वका तू अनादिमूल । जहां जब मिला हंसीके बोल ।
बोला सगाईके नाते केवल । विनोदसे बहु ॥ ४४ ॥
आते थे हम जब तेरे सदन । पाते थे तुझसे ही बहु सम्मान ।
तो भी अति लगावसे जनार्दन । बैठते थे रूठके ॥ ४५ ॥
समझाना हमारे पांव छूकर । तुझसे है इस भांति चक्रधर ।
बैठते जैसे हटके रूठ कर । ऐसे किया बहुत ॥ ४६ ॥
आत्मीय-जन भावके नाते । उलटे हो हम थे बैठते ।
ऐसे प्रकार किसे सोहते । भूल हुयी स्वामी ॥ ४७ ॥
अरे ! कलावाजी कर देवसे । आखाडेमें भिडते थे मस्तीसे ।
सतरंजमें आ अति-क्रोधसे । लड़ते थे देव ॥ ४८ ॥
जो चाहा जो तुझसे मांगना । तुझको ही उपदेश करना ।
“तुझसे क्या हमारा ! ” भी बोलना । हमारी उदंडता ॥ ४९ ॥
ऐसे हैं हमारे अनंत अपराध । त्रिलोकमें नहीं समाते अगाध ।
तेरे चरण छू लेता कर सौगंध । था यह सब अज्ञानसे ॥ ५५० ॥
भोजनके समय देव । रखते स्मरण सदैव ।
किंतु मूर्ख मैं जो सगर्व । अडके बैठता ॥ ५१ ॥
खेला फिरा साथ जीमा कि सोया
एकांतमें या सबके समक्ष ।
तथा हंसी की तुझ तुच्छ माना
क्षमा करो भान तेरा किसे है ॥ ४२ ॥
ज्ञानेश्वरी ३८८
जाके देवके अंतरगृहमें । खेलते शंका न लाता मनमें ।
इतना क्या लुढ़कता शैय्यामें । साथ ही देष ॥ ५२ ॥
कृष्ण कहके ही पुकारता । यादव कह तुझे देखता ।
अपनी सौगंध भी खिलाता । जाते हुए तुझे ॥ ५३ ॥
एकासन पर देव ! बैठना । सदैव तेरी अवज्ञा करना ।
अति-स्नेहसे ऐसा बरतना । हुवा देव ॥ ५४ ॥
इसीलिये यह क्या क्या सब । कहूं मैं स्वामी तुझसे अब ।
मैं हूं अपराध ढेर सब । रहा अनंत ॥ ५५ ॥
प्रभो तेरे संन्मुख या विमुख । की हैं भली बुरी बाते अनेक ।
मां जैसे निभाती है शिशुकी चूक । वैसे निभा लेना मुझे ॥ ५६ ॥
जब कभी ले आती है सरिता । गंदा पानीका प्रवाह बहता ।
तब कैसे सागर समा लेता । उलघास नहीं अन्य ॥ ५७ ॥
वैसे प्रीति या स-प्रमाद । मुझसे हुआ जो विरोध ।
या बोला कुछ भी मुकुंद । उपहासकी बात ॥ ५८ ॥
तथा देवके क्षमत्वसे क्षमा । आधार है जो सब भूत-ग्राम ।
इसीलिए हे श्री पुरुषोत्तम । तुझसे मांगता अल्प ॥ ५९ ॥
तभी कर तू अप्रमेय । शरणागत धनंजय ।
जिसे तूने अपना लिया । क्षमा कर अपराध ॥ ५६० ॥
पितासि लोकस्य चराचरस्य
त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो
लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥ ४३ ॥
तू है पिता स्थावर जंगमोंका
तू है बड़ा ही गुरु पूजनीय ।
त्रिलोकमें ना तुझ तुल्य कोई
कहांसे आवे अनुपमप्रभावी ॥ ४३ ॥
३८९
विश्व-रूप-दर्शनयोग
मुझे हुआ अब इसका ज्ञान । आता देवकी महिमा महान् ।
देव है यहां उत्पत्ति स्थान । चराचरका सब ॥ ६१ ॥
हरिहरादि जो है समस्त । उनका तू परम दैवत ।
वेदोंका भी है जो ज्ञानदात । तू ही आदि-गुरु ॥ ६२ ॥
गंभीर है तू श्रीराम । विविध भूतैक सम ।
सकल गुण अप्रतिम । अद्वितीय ॥ ६३ ॥
कोई नहीं है तेरे समान । यह कहनेका क्या कारण ।
तुझसे ही हुआ है गगन । उसमें समाया विश्व ॥ ६४ ॥
ऐसे तेरे समान है अन्य कोई । कहनेमें वाणी अत्यंत लजाई ।
वहां अधिककी क्या बात आई । कहनेकी देव ॥ ६५ ॥
इसीलिये त्रिभुवनमें तू एक । कोई नहीं तुझसे अधिक ।
तेरा महिमा ही ऐसे अलौकिक । नहीं होता बखान ॥ ६६ ॥
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं
प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः
प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥ ४४ ॥
ऐसे कह कर जो अर्जुन । करता दंडवत नमन ।
आया सात्विकताका उफान । लहराकर ॥ ६७ ॥
कहता तब प्रसीद प्रसीद । वाचा होती है अतीव गद्गद् ।
उभार ले तू मुझे अपराध- । सागरसे देव ॥ ६८ ॥
विश्व-सुहृदको सगा मान । नहीं किया उचित सन्मान ।
तुझ ईश्वरमें सा-भिमान । किया प्रभुत्व ॥ ६९ ॥
इसीलिये मैं करता प्रणाम
प्रसन्न हो तू स्तवनीय देव ।
क्षमा करो जी मुझ पुत्र मान
सखा सखाको प्रिय ज्यों प्रियाको ॥ ४४ ॥
ज्ञानेश्वरी. ३९०
वर्णनीय तू प्रेमके कारण । करता सभामें मेरा वर्णन ।
तब सगर्व अपना बखान । करता मैं अधिक ॥ ७० ॥
ऐसे हैं कितने ही अपराध । उनकी मर्यादा नहीं गोविंद ।
क्षमा कर लक्ष लक्ष प्रमाद । प्रसाद रूप तू ॥ ७१ ॥
किंतु ऐसे विनय करनेमें । योग्यता कहां है देव मुझमें ।
शिशु जैसे पिताके दुलारमें । बोलता वैसे ही ॥ ७२ ॥
पिता पुत्रके अपराध । कितने भी हों वे अगाध ।
सहता है पिता निर्द्वंद्व । वैसे सह ले तू ॥ ७३ ॥
सखाकी उद्धतता । सखा शांत सहता ।
वैसे ही हे अनंत । सहन कर तू ॥ ७४ ॥
प्रियमैं कभी सम्मान । न करता प्रिय जान ।
आप उठाये रूठन । क्षमा करोजी ॥ ७५ ॥
या होता जहां जी-लगे स्नेहीका मिलन । कहा जाता जीवन संकटमें कथन ।
ऐसा करनेमें वहां आत्म-निवेदन । न होता संकोच ॥ ७६ ॥
जिसने किया तन-मन अर्पण । प्रेमादर-युत पतिके चरण ।
मिलनसे होता सर्वस्व कथन । स्वाभाविक वैसे ॥ ७७ ॥
वैसे ही देव मैंने अब । कह डाला तुझसे सब ।
दूसरा हेतु रहा कब । अपना स्वामी ॥ ७८ ॥
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा
भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
तदेव मे दर्शय देव रूपं
प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ ४५ ॥
अपूर्व देखा अपरूप दृश्य
तो भी बना व्याकुल चित्त मेरा ।
मुझे बताओ प्रभु मूळ रूप
प्रसन्न हो तू जगका निवास ॥ ४५ ॥
३९१ विश्व-रूप-दर्शनयोग
फिर भी किया मैंने देवसे प्यार । मांग की विश्व-रूपकी जिद्द कर ।
पूर्ण की जो माय-बाप बन कर । स्नेहाथं देव ॥ ७९ ॥
गाछ जो सुर-तरुका । अंगनमें लगानेका ।
बाछा भी काम-धेनुका । दिया खेलने ॥ ५८० ॥
मेरा नक्षत्रोंका दांव लगाना । चंद्रको गेंद बनाके खेलना ।
ऐसी धुनको भी पूर्ण करना । माता बनकर ॥ ८१ ॥
अमृत-बिंदुके लिये करते यत्न । उसकी वर्षा चारमास रात दिन ।
जिससे हर बालका जो कणकण । चिंतामणि हुवा ॥ ८२ ॥
तूने ऐसा कृतार्थ किया । बहु अधिक स्नेह दिया ।
परम-ब्रह्मको दिखाया । जो नहीं सुनाथा ॥ ८३ ॥
कैसा होगा इसका प्रत्यक्ष दर्शन । न होता उपनिषदोंको आकलन ।
हृदयकी ऐसी जो गिरह महान । मुझसे खोली प्रभु ॥ ८४ ॥
देव ! कल्पके आदिसे । इस क्षण तक ऐसे ।
हुए मेरे कितनेसे । यहां जन्म ॥ ८५ ॥
किया मैंने इन जन्मोंका संपूर्ण । खोज खोज कर अवलोकन ।
विश्व-रूप-श्रवणका भी स्मरण । वहां नहीं मिला ॥ ८६ ॥
अजी ! बुद्धि-शक्ति या ज्ञान । न जाता जिसके अंगन ।
कल्पना भी अंतःकरण । कर न सकता ॥ ८७ ॥
तब इसका दर्शन होना । इसकी कैसी करें कल्पना ।
कभी न देखा या सुना । ऐसा हुवा कहीं ॥ ८८ ॥
ऐसा यह विश्व-रूप । दिखाया मुझे अनूप ।
जिससे स्वरूप-रूप । हुवा चित्त ॥ ८९ ॥
चतुर्भुज सौम्य रूप दर्शनकी कामना—
अब रही एक कामना । तुझसे सानंद बात करना ।
तथा सामिप्यको अनुभवना । आलिंगनसे ॥ ५९० ॥
इस रूपसे यह कैसे करना । तब किस मुखसे कहो बोलना ।
अनंतको कैसे अंकमें भरना । नहीं होता यह देव ॥ ९१ ॥
ज्ञानेश्वरी ३९२
तमी वायुके साथ दौडना । गगनको आलिंगन देना ।
अथवा जल-क्रीडा करना । महा-सागरमें ॥ ९२ ॥
ऐसे करनेमें देव । भय-ग्रस्त होता जीव ।
विश्व-रूप तू केशव । समेट लेना ॥ ९३ ॥
घूम फिर देखना चराचर । सुखसे रहनेमें होना घर ।
वैसे चतुर्भुज है मनोहर । निवास देव ॥ ९४ ॥
योगाभ्यासका अनुभव । शास्त्राध्ययनका भी देव ।
अंतिम सिद्धांत केशव । यही एक ॥ ९५ ॥
हमने यज्ञ किये सकल । उस फलका भी यही फल ।
दान-पुण्यका भी है केवल । यही कारण ॥ ९६ ॥
अन्य दान-पुण्यका कारण । तीर्थ-यात्रादि जो है साधन ।
इसका कारण है दर्शन । चतुर्भुजका सतत ॥ ९७ ॥
चतुर्भुज दर्शनका जो चाव । बनाता उतावला केशव ।
वह व्याकुलता वासुदेव । दूर कर सत्वर ॥ ९८ ॥
अजी ! अंतःकरणका ज्ञाता । सकल विश्वका रचयिता ।
पूजित देवोंसे भी पूजित । तू हो प्रसन्न ॥ ९९ ॥
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तम्
'इच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन
सहस्र बाहो भव विश्वमूर्ते ॥ ४६ ॥
जैसे नीलोत्पल रंजन । रंगता जो सदा गगन ।
तेजका ओज देता रत्न । इंद्र-नीलको ॥ ६०० ॥
हो तू गदा चक्र किरीट-धारी
चाहूँ वही मै तव रूप देखूं ।
संवार कर तू अनंत बाहू
चतुर्भुजा रूप बन विश्व-मूर्ते ॥ ४६ ॥
(50) ३९३ विश्व-रूप-दर्शनयोग
या परिमळ आया मरगज । आनंदमें उमड आये भुज ।
गोदमें खेला सो मकरध्वज । हुवा सुंदर ॥ १ ॥
अजी ! मस्तकपर रखा मुकुट । मस्तक बना-मुकुटका मुकुट ।
अंगारमें हुवा सौंदर्य प्रकट । शरीरसे ही ॥ २ ॥
जैसे इंद्र-धनुषका जो वर्तुल । घेरता मेघको गगन-मंडल ।
वैसे देवके शरीरको शामल । माला वैजयंती ॥ ३ ॥
कैसी वह है उदार गदा । मोक्ष देती असुरोंको सदा ।
वैसे ही चक्र वह गोविंद । सोहता सौम्य तेजसे ॥ ४ ॥
वैसे ही रूप शाम-सुंदर । देखनेको शिशु है आतुर ।
इसीलिये प्रभु तू सत्वर । बन जा वैसे ॥ ५ ॥
विश्व-रूपका उत्सव देख । शिथिल हुई है मेरी आंख ।
अब हुई हैं अति उत्सुक । कृष्ण-मूर्तिके लिये ॥ ६ ॥
कृष्ण-रूप वह जो साकार । उसके बिना सूना संसार ।
विश्व-रूप भी जो है असार । मानती आंखें ॥ ७ ॥
भोग मोक्षमें हमें कभी कहीं । श्रीमूर्तिके बिना कुछ भी नहीं ।
इसीलिये अब साकार होई । समेटले यह रूप ॥ ८ ॥
भगवान उवाच
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेंदं
रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं
यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥ ४७ ॥
श्रीभगवानने कहा
प्रसन्न होके निज-योग द्वारा
तुझे दिखाया यह विश्वरूप ।
अनंत तेजोमय आद्य पूज्य
देखा किसीने तुझसे न पूर्व ॥ ४७ ॥
ज्ञानेश्वरी ३९४
अर्जुनका गंवारापन—
सुन अर्जुनकी यह बात । विश्व-रूप हुवा जो विस्मित ।
कहता ऐसा अव्यवस्थित । देखा न कोई ॥ ९ ॥
कैसी वस्तु हुई यह प्राप्त । इस लाभसे न होता मुदित ।
कैसे भयसे करता बात । सनकी बनकर ॥ ६१० ॥
होते जब हम सहज प्रसन्न । निहाल कर देते हैं तन मन ।
किसे देना यह वैभव अर्जुन । ऐसा कभी हुवा क्या ॥ ११ ॥
अपना सर्वस्व बटोर । खडा किया यह सुन्दर ।
तेरे लिये हे धनुर्धर । विश्व-रूप ॥ १२ ॥
यही जो अपर अपार । स्वरूप मेरा परात्पर ।
यहींसे सब अवतार । कृष्णादिक ॥ १३ ॥
तेरे चाहके ही कारण । पगलाई है कृपा जान ।
औ' इस गोप्यका महान् । ध्वज उभारा ॥ १४ ॥
ज्ञान-तेजसे जो निखिल । यह विश्वात्मक केवल ।
अनंत रूप है अचल । सबका आद्य ॥ १५ ॥
तेरे बिना यह अर्जुन । किसीने न देखा सुना जान ।
नहीं इसके योग्य साधन । इसीलिये ॥ १६ ॥
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै-
र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके
द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥ ४८ ॥
बोलाइसे वेद न यज्ञ द्वारा
या दान देके ना उग्र तपसे ।
तेरे बिना दर्शन है किसीको
हुवा नहीं जो जगमें अशक्य ॥ ४८ ॥
३९५ विश्व-रूप-दर्शनयोग
इसकी खोजमें जो गये । वेद वे मौन बैठ गये ।
यज्ञ वैसे ही लौट आये । स्वर्गसे ही ॥ १७ ॥
साधकोंने देखा मात्र त्रास । इसीलिये सूखा योगाभ्यास ।
तथा स्वाध्यायमें न सौरस । रूप-दर्शनका ॥ १८ ॥
पूर्ण आचरित सत्कर्म । दौडे हो अतीव संभ्रम ।
करके अतिशय श्रम । पाया सत्यलोक ॥ १९ ॥
तपने देखा प्रभुत्व । छोडा अपना उग्रत्व ।
तप-साधनसे तत्व । रहा अपरांतर ॥ ६२० ॥
वह तूने यहां अनायाससे । देखा स्वाभाविक ही उल्हाससे ।
मनुष्य-लोकमें किसीको वैसे । असंभव जान ॥ २१ ॥
ध्यान-रूप संपत्तिके कारण । तू एकमेव है यहां अर्जुन ।
ऐसा नहीं परम-भाग्यवान । ब्रह्मदेव भी ॥ २२ ॥
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो
दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् ।
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वम्
तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥ ४९ ॥
अर्जुनका अनाडीपन—
तभी यह विश्व-रूप महान । इसका तू भय नहीं मान ।
इससे कुछ भी श्रेष्ठ महान । अपने चित्तमें ॥ २३ ॥
अजी ! छलक रहा अमृत सागर । भाग्यसे पहुंचा कोई उसके तीर ।
तब मरनेके भयसे तजकर । भागेगा क्या वहांसे ॥ २४ ॥
धरो नहीं व्याकुल मूढ भाव
निहार मेरा वह घोर रूप ।
भय छोड़ तू हो प्रसन्न-चित्त
निहार मेरा प्रिय पूर्व रूप ॥ ४९ ॥
ज्ञानेश्वरी ३९६
अथवा देखा सुवर्णका टीला । उसको उठावूं मैं कैसे भला ।
कहके यह उसे छोड़ चला । ऐसे होता क्या ? ॥ २५ ॥
अथवा मानो चिंतामणि मिला । इस बोझको उठावूं क्यों भला ।
कामधेनु पालनेका झमेला । कह छोड़ेगा कोई ? ॥ २६ ॥
अथवा घरमें आया चन्द्रमा । इससे होता है बड़ा ही उष्मा ।
या सूर्यसे होती छायाकी कालिमा । मान तजेंगे क्या ? ॥ २७ ॥
वैसे ऐश्वर्य जो है महा-तेज । आया तेरे हाथमें जो सहज ।
और तू अकुलाया अचरज । कहना क्या ? ॥ २८ ॥
अरे ! है तू कितना गंवार । तुझे कहूं क्या मैं धनुर्धर ।
गले मिलता छोड शरीर । छायाके तू ॥ २९ ॥
विश्व-रूप मेरा निज-रूप । वहां बनाकर मन विरूप ।
प्रेम करता है तू क्षुद्र-रूप । चतुर्भुजसे ॥ ६३० ॥
इतने पर भी छोड़ तू पार्थ । विश्व रूपकी यह अनास्था ।
इसके विषयमें धर आस्था । श्रद्धा-पूर्वक ॥ ३१ ॥
यद्यपि विश्व-रूप है भयंकर । न दीखता उसका ओर छोर ।
किंतु है वह निश्चयका घर । उपासनामें ॥ ३२ ॥
जैसे है कृपणकी चित्तवृत्ति । गढे धनमें उल्झी रहती ।
केवल शरीर करता कृति । करना वैसे ॥ ३३ ॥
अथवा अपने घकुलेमें सब जीव । उल्झाकर उडती पक्षिणी सदैव ।
अंतरिक्षमें करने अपना निभाव । लाचारीसे ॥ ३४॥
अथवा गाय चरती है बाहर । मन लगा है बछडेके ऊपर ।
वैसे तू नित्य इसपे प्रेम कर । अपने स्वामित्वसे ॥ ३५ ॥
वैसे सामान्य चित्त । सख्य-सुख निमित्त ।
पूज तू मूर्तिमंत । चतुर्भुज ॥ ३६ ॥
किंतु कहता हूं सुन अर्जुन । यह बात कभी नहीं न भूलना ।
इस स्वरूप विषय भावना । करना स्थिर ॥ ३७ ॥
३९७ विश्व-रूप-दर्शनयोग
कभी किसीने जो देखा नहीं था। सो देख तू भय-भीत हुवा था।
संचित प्रेम-सर्वस्व जो भी था। रख वह यहीं पर ॥ ३८ ॥
अब तू जैसा ही है कहता। वैसे शांत रूप मैं धरता।
विश्वतोमुख यह कहता। तू निहार अब ॥ ३९ ॥
सञ्जय उवाच
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा
स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।
आश्वासयामास च भीतमेनं
भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥ ५० ॥
विश्वरूप विसर्जन --
ऐसा वाक्य कह वह तत्क्षण । मनुष्य हुवा देव विलक्षण ।
कहें क्या प्रेमका वह लक्षण । लीला-कौतुक ॥ ६४० ॥
श्रीकृष्ण है कैवल्यधाम प्रकट । देता है सर्वस्व विश्व-रूप श्रेष्ठ ।
किंतु न भाता अर्जुनको जो शिष्ट । वह रूप अद्भुत ॥ ४१ ॥
जैसे कोई वस्तु लेकर लौटाना । रत्नोंका खोट निकालते बैठना ।
अथवा कन्या देखकर कहना । यह मन-भाया नहीं ॥ ४२ ॥
दिखा दी उसको विश्व रूपकी जो दशा । इससे दीखता प्रेम विकास है कैसा ।
देवने दिया रहस्यमय उपदेश । धनंजयको ॥ ४३ ॥
सुवर्णका घड गलाकर । किया जो आभूषण सुन्दर ।
नहीं हुवा उसका स्वीकार । गलाया पुनः ॥ ४४ ॥
संजयने कहा
ऐसा कहा श्रीहरिने तुरंत
तथा दिखाया वह पूर्व-रूप ।
आश्वस्त करने डरे हुएको
हुवा पुनः सौम्य उदार देव ॥ ५० ॥
ज्ञानेश्वरी ३९८
वैसे शिष्यके प्रेममें आकर । कृष्णत्वको पूर्ण गलाकर ।
लिया जो विश्व-रूप भयंकर । बना फिर श्रीकृष्ण ॥ ४५ ॥
अजी ! शिष्यका दिया यह त्रास । सहनेवाले गुरु कहां कौन देश ।
न जाने कैसे हरिका प्रेम-विकास ! कहता है संजय ॥ ४६ ॥
विश्व-रूपका यह योग विस्तार । समा लिया अपनेमें ही सत्वर ।
तथा प्रकटा कृष्ण-रूप सुन्दर । क्षण भरमें ॥ ४७ ॥
जैसे त्वं पद होता संपूर्ण । तत् पदमें लीन सर्व रूपेण ।
वृक्ष मिटा होता बीज-कण । यह उसी भांति ॥ ४८ ॥
अथवा स्वप्न-संभ्रम जैसा । निगलता जागृत जीव-दशा ।
श्रीकृष्णने योग-विस्तार वैसा । समा लिया अपनेमें ॥ ४९ ॥
जैसे सूर्यादिका तेज बिंबमें । घनादिका जल गगनमें ।
ज्वारका जल सब समुद्रमें । वैसे नरेंद्र ॥ ५० ॥
अथवा कृष्ण रूपका थान । खोल दिया विश्व-रूप दर्शन ।
दिखाता स-कौतुक जनार्दन । प्रिय अर्जुनको ॥ ५१ ॥
मानो तब उसका आकार प्रकार । गाहक कहता है देखकर ।
यह नहीं हमारे मन अनुसार । और समेटा थान ॥ ५२ ॥
अपना पसारा फैलाकर । विश्वको किया सहज पार ।
उसे समेट हुवा साकार । बना मन-मोहन ॥ ५३ ॥
वह भाग्य अर्जुनको मिला जो किसीको नहीं मिला था—
अथवा हुवा अनंत । जैसे था बना जो सांत ।
पार्थको करने शांत । था जो अधीर ॥ ५४ ॥
जैसे देखता है स्वर्ग स्वप्नमें । जगते ही पाता बिछावनमें ।
ऐसे ही पार्थको क्षण-भरमें । हुवा अति विस्मय ॥ ५५ ॥
अथवा गुरु-कृपासे संपूर्ण । प्रपंच-ज्ञान होता है क्षीण ।
तथा होता पर-ब्रह्म स्फुरण । वैसा देखा कृष्ण-रूप ॥ ५६ ॥
सोचता था पार्थ चितमें एक । विश्व-रूपके परदेको रोक ।
वह गया बड़ा ही हुवा नेक । मेरे हितमें ॥ ५७ ॥
३९९ · विश्व रूप-दर्शनयोग
आया जैसे कालको जीतकर । अथवा बवंडर चीरकर ।
या सप्त-सागर तैरकर । अपने बाहूसे ॥ ५८ ॥
उसे हुआ ऐसा अति-संतोष । माना पार्थने परम-उल्लास ।
देख कर श्रीकृष्णको स-हास । विश्व-रूपके नंतर ॥ ५९ ॥
सूर्यके होते ही अस्तमान । नक्षत्रोंसे भरता गगन ।
वैसे देखने लगा अर्जुन । लोगों सह पृथ्वी ॥ ६६० ॥
देखता वैसे ही कुरु-क्षेत्र । दोनों ओर हैं वैसे सगोत्र ।
रण-सज्ज वीर ले शस्त्रास्त्र । चलाते हुए ॥ ६१ ॥
रण-मध्यमें वहां सब शांत । वैसा ही रथ खडा है रक्षित ।
बैठा है उसमें श्रीलक्ष्मी-कांत । अपने पास ॥ ६२ ॥
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥ ५१ ॥
एवं पहले जैसे था वैसे । देखा यह वीर्य-विलाससे ।
फिर कहता जिया मैं ऐसे । हुवा अब ॥ ६३ ॥
बुद्धिको छोड कर ज्ञान । भयसे गया था जो वन ।
अहंकार सह है मन । भाग गया था ॥ ६४ ॥
इन्द्रियां प्रवृत्ति भूल गयी थीं । भाषा प्राणसे वंचित हुई थीं ।
शरीर-ग्राममें अव्यवस्था थी । अभूतपूर्व ॥ ६५ ॥
हुवे वे सब अब प्रफुल्लित । प्रकृति हुई फिरसे जीवित ।
अब हुवा पुनरुज्जीवित । ऐसे लगता मुझे ॥ ६६ ॥
जीवने ऐसा सुख पा लिया । फिर कृष्णसे है कह दिया ।
मैंने तेरा वह जो पा लिया । यह मानवी रूप ॥ ६७ ॥
अर्जुनने कहा
देखके यह जो सौम्य मानवी-रूप माधव ।
हुवा प्रसन्न औ' शांत आया मैं निज भावमें ॥ ५१ ॥
ज्ञानेश्वरी ४००
देवेश ! तूने यह रूप दिखाकर । मुझ राह भूले शिशुको बुलाकर ।
माताने मानो स्नेहसे गोद लेकर । कराया स्तन-पान ॥ ६८ ॥
अजी ! महा सागरमें विश्व-रूपके । जूझ रहा था हमलोंसे तरंगोंके ।
अब पा लिया किनारा निज-मूर्ति के । दर्शनानुग्रहसे देव ॥ ६९ ॥
सुन तू यह द्वारकापुराध्यक्ष । विश्व रूपसे मानो सूखा था वृक्ष ।
इस दर्शनसे तूने की है रक्षा । प्रेम-मेघ-वर्षासे ॥ ६७० ॥
तृषार्थिको जैसे मिला अपार । लहराता अमृत-सिंधु तीर ।
जीनेका संदेह हुवा है दूर । इस दर्शनसे ॥ ७१ ॥
मेरे हृदयांगणमें आज । खिली आनंद-लता सहज ।
सुख-दर्शनका हुवा साज । मुझको तेरे ॥ ७२ ॥
भगवान उवाच
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ ५२ ॥
पार्थके ऐसे बोलको सुन । ऐसे क्यों कहता जनार्दन ।
तू आ-प्रेमका दृढ स्थान मान । विश्व-रूप वह ॥ ७३ ॥
सदैव यहां मूर्ति-दर्शन । करना केवल लेके तन ।
भूला तू मेरा यह कथन । सुभद्रापति ॥ ७४ ॥
केवल अनन्य भक्तिसे ही यह मिलता है—
अरे ! ऐसा कैसा तू अंधा अर्जुन । हाथ आया स्वर्गका मेरु महान ।
कहता है वह ओछा तेरा मन । यह है भ्रम-भाव ॥ ७५ ॥
रूप है जो मेरा विश्वात्मक । दिखाया तुझे प्रेम-पूर्वक ।
शंभूने किये तप अनेक । किंतु न पा सका वह ॥ ७६ ॥
तथा संकटमें अष्टांग-योगके । पडते हैं योगी आशासे इसके ।
किंतु नहीं पाते भाग्य दर्शनके । इसके कभी वे ॥ ७७ ॥
श्री भगवानने कहा
देखा तूने वह मेरा अति दुर्लभ दर्शन ।
चाहते देव भी नित्य वह स्वरूप दर्शन ॥ ५२ ॥
४०१ विश्व-रूप-दर्शनयोग
(51)
विश्व-रूप कभी किसी काल । देखेंगे अणुमात्र केवल ।
इस आशासे देव सकल । करते हैं चिंतन ॥ ७८ ॥
अंजली जैसे आशाकी । माथे पर ले सदाकी ।
निहारते आकाशकी । राह चातक ॥ ७९ ॥
ऐसे उत्कंठासे भरकर । देखते हैं सदा सुर नर ।
निहारते हैं आठो प्रहर । उसके दर्शनार्थ ॥ ८० ॥
फिर भी विश्व-रूप सरीखा । स्वप्न भी किसीने नहीं देखा ।
प्रत्यक्ष मिला जो वह सुख । तुझको यहां ॥ ८१ ॥
नाहं वेदैर्न तपसा न दाने न चेज्यया ।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ५३ ॥
वहां पहुंचनेका साधन । कोई नहीं जान तू अर्जुन ।
वेद सहित षड्दर्शन । व्यर्थ है वहां ॥ ८२ ॥
करने विश्व-रूप दर्शन । करनेमें सब तपको जान ।
अशक्य पानेमें वह स्थान । धनंजय ॥ ८३ ॥
तथा जैसे देखा तूने सविस्तर । वैसे ज्ञान यज्ञसे भी धनुर्धर ।
निहारना जान तू अति दुस्तर । किसीको भी ॥ ८४ ॥
इसका है एक ही प्रकार । सुन तू यह चित्त देकर ।
चित्त करता जब स्वीकार । भक्तिको नित्य ॥ ८५ ॥
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥ ५४ ॥
वह भी भक्ति है कैसी । वर्षा न जानती जैसी ।
दूसरा आसरा वैसी । धरती बिन ॥ ८६ ॥
तप यज्ञ किया दान तथा अभ्यास वेदका ।
तो भी दर्शन है मेरा अशक्य जो तुझे मिला ॥ ५३ ॥
अनन्य भक्तिसे शक्य मेरा है ज्ञान दर्शन ।
तत्वता जानना पाना प्रवेश मुझमें फिर ॥ ५४ ॥
ज्ञानेश्वरी ४०२