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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 459

जाके देवके अंतरगृहमें । खेलते शंका न लाता मनमें ।
इतना क्या लुढ़कता शैय्यामें । साथ ही देष ॥ ५२ ॥
कृष्ण कहके ही पुकारता । यादव कह तुझे देखता ।
अपनी सौगंध भी खिलाता । जाते हुए तुझे ॥ ५३ ॥
एकासन पर देव ! बैठना । सदैव तेरी अवज्ञा करना ।
अति-स्नेहसे ऐसा बरतना । हुवा देव ॥ ५४ ॥
इसीलिये यह क्या क्या सब । कहूं मैं स्वामी तुझसे अब ।
मैं हूं अपराध ढेर सब । रहा अनंत ॥ ५५ ॥
प्रभो तेरे संन्मुख या विमुख । की हैं भली बुरी बाते अनेक ।
मां जैसे निभाती है शिशुकी चूक । वैसे निभा लेना मुझे ॥ ५६ ॥
जब कभी ले आती है सरिता । गंदा पानीका प्रवाह बहता ।
तब कैसे सागर समा लेता । उलघास नहीं अन्य ॥ ५७ ॥
वैसे प्रीति या स-प्रमाद । मुझसे हुआ जो विरोध ।
या बोला कुछ भी मुकुंद । उपहासकी बात ॥ ५८ ॥
तथा देवके क्षमत्वसे क्षमा । आधार है जो सब भूत-ग्राम ।
इसीलिए हे श्री पुरुषोत्तम । तुझसे मांगता अल्प ॥ ५९ ॥
तभी कर तू अप्रमेय । शरणागत धनंजय ।
जिसे तूने अपना लिया । क्षमा कर अपराध ॥ ५६० ॥
पितासि लोकस्य चराचरस्य
त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो
लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥ ४३ ॥
तू है पिता स्थावर जंगमोंका
तू है बड़ा ही गुरु पूजनीय ।
त्रिलोकमें ना तुझ तुल्य कोई
कहांसे आवे अनुपमप्रभावी ॥ ४३ ॥
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विश्व-रूप-दर्शनयोग