ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 455, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंवायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशांकः
प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः
पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥ ३९ ॥
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते
नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं
सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥ ४० ॥
एक तू क्या नहीं है देव । तथा कहां नहीं तू देव ।
जहां जैसे ही तू है देव । नमस्कार मेरा ॥ १९ ॥
वायु है तू अनंत । यम तू नियमित ।
भूतमात्रमें नित । बसता तू अग्नि ॥ ५२० ॥
वरुण और तू सोम । सृष्टा तथा तू है ब्रह्म ।
पितामहका परम । आदि जनक तू ॥ २१ ॥
और जहां जो जो कुछ है । रूप है अथवा नहीं है ।
नमन जहां जैसा भी है । जगन्नाथ तुझको ॥ २२ ॥
तू अग्नि तू वायु समस्त देव
प्रजापते ब्रह्म-पिता सु-श्रेष्ठ ।
तुझे नमस्कार सहस्र बार
पुनः पुनः और पुनः पुनः है ॥ ३९ ॥
आगे कि पीछे सब ओर देव
सदा नमस्कार जहां जहां तू ।
उत्साह सामर्थ्य अनंत तेरा
सभी बना तू तुझमें सभी है ॥ ४० ॥
(49) ३८५ विश्व-रूप-दर्शनयोग