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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 456

ऐसा हो सानुराग चित्त । स्तुति करता पांडुसुत ।
आगे पीछे नमन नित । कहता नमस्ते ॥ २३ ॥
पुनः देखता साद्यंत । श्रीमूर्त्ति जो है सतत ।
तथा कहता है पार्थ । नमस्ते देव ॥ २४ ॥
देख देख कर सतत । प्रसन्न होता पार्थ-चित्त ।
कहता है वह हो नत । नमस्कार देव ॥ २५ ॥
यहां चराचरमें समस्त । देखता उसीको अखंडित ।
तथा करता है प्रणिपात । नमस्कार देव ॥ २६ ।
वह रूप ऐसा अद्भुत । आश्चर्य स्फूर्त जो अनंत ।
पुनः पुनः कहता पार्थ । नमस्कार देव ॥ २७ ॥
अन्य स्तवन न सूझता । शांत रहना भी न होता ।
ऐसा प्रेम भाव जगता । कहता नमस्कार ॥ २८ ॥
वास्तवमें ऐसा ही बार बार । नमन करता सहस्र बार ।
फिर कहता है श्री चक्रधर । प्रणाम तेरे सम्मुख ॥ २९ ॥
देवका पेट पीठ है नहीं । इससे हमें लाभ भी नहीं ।
फिर भी तेरी पीठको सही । नमस्कार स्वामी ॥ ५३० ॥
रहा है तू मेरे पीछेसे । तभी पीछे कहता तुझसे ।
सम्मुख विमुख विश्वसे । होता नहीं तेरा ॥ ३१ ॥
भिन्न भिन्न अब अवयव । नहीं जान सकता मैं देव ।
तभी नमन तुझको सर्व- । सर्वात्मक स्वामी ॥ ३२ ॥
देव ! तू अनंत बल-धाम । नमन है अमित विक्रम ।
सकल काल सर्वत्र सम । सर्वेश देव ॥ ३३ ॥
अजी ! संपूर्ण अवकाशमें जैसे । आकाश ही आकाश रहता ऐसे ।
सर्वत्वमें तू सर्व-व्यापी है वैसे । हुआ सर्व-सर्व ॥ ३४ ॥
अथवा तू है केवल । सब ही सब अखिल ।
क्षीरार्णवमें कल्लोल । क्षीरका जैसे ॥ ३५ ॥
ज्ञानेश्वरी ३८६