ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथवा देखा सुवर्णका टीला । उसको उठावूं मैं कैसे भला ।
कहके यह उसे छोड़ चला । ऐसे होता क्या ? ॥ २५ ॥
अथवा मानो चिंतामणि मिला । इस बोझको उठावूं क्यों भला ।
कामधेनु पालनेका झमेला । कह छोड़ेगा कोई ? ॥ २६ ॥
अथवा घरमें आया चन्द्रमा । इससे होता है बड़ा ही उष्मा ।
या सूर्यसे होती छायाकी कालिमा । मान तजेंगे क्या ? ॥ २७ ॥
वैसे ऐश्वर्य जो है महा-तेज । आया तेरे हाथमें जो सहज ।
और तू अकुलाया अचरज । कहना क्या ? ॥ २८ ॥
अरे ! है तू कितना गंवार । तुझे कहूं क्या मैं धनुर्धर ।
गले मिलता छोड शरीर । छायाके तू ॥ २९ ॥
विश्व-रूप मेरा निज-रूप । वहां बनाकर मन विरूप ।
प्रेम करता है तू क्षुद्र-रूप । चतुर्भुजसे ॥ ६३० ॥
इतने पर भी छोड़ तू पार्थ । विश्व रूपकी यह अनास्था ।
इसके विषयमें धर आस्था । श्रद्धा-पूर्वक ॥ ३१ ॥
यद्यपि विश्व-रूप है भयंकर । न दीखता उसका ओर छोर ।
किंतु है वह निश्चयका घर । उपासनामें ॥ ३२ ॥
जैसे है कृपणकी चित्तवृत्ति । गढे धनमें उल्झी रहती ।
केवल शरीर करता कृति । करना वैसे ॥ ३३ ॥
अथवा अपने घकुलेमें सब जीव । उल्झाकर उडती पक्षिणी सदैव ।
अंतरिक्षमें करने अपना निभाव । लाचारीसे ॥ ३४॥
अथवा गाय चरती है बाहर । मन लगा है बछडेके ऊपर ।
वैसे तू नित्य इसपे प्रेम कर । अपने स्वामित्वसे ॥ ३५ ॥
वैसे सामान्य चित्त । सख्य-सुख निमित्त ।
पूज तू मूर्तिमंत । चतुर्भुज ॥ ३६ ॥
किंतु कहता हूं सुन अर्जुन । यह बात कभी नहीं न भूलना ।
इस स्वरूप विषय भावना । करना स्थिर ॥ ३७ ॥
३९७ विश्व-रूप-दर्शनयोग