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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 466

इसकी खोजमें जो गये । वेद वे मौन बैठ गये ।
यज्ञ वैसे ही लौट आये । स्वर्गसे ही ॥ १७ ॥
साधकोंने देखा मात्र त्रास । इसीलिये सूखा योगाभ्यास ।
तथा स्वाध्यायमें न सौरस । रूप-दर्शनका ॥ १८ ॥
पूर्ण आचरित सत्कर्म । दौडे हो अतीव संभ्रम ।
करके अतिशय श्रम । पाया सत्यलोक ॥ १९ ॥
तपने देखा प्रभुत्व । छोडा अपना उग्रत्व ।
तप-साधनसे तत्व । रहा अपरांतर ॥ ६२० ॥
वह तूने यहां अनायाससे । देखा स्वाभाविक ही उल्हाससे ।
मनुष्य-लोकमें किसीको वैसे । असंभव जान ॥ २१ ॥
ध्यान-रूप संपत्तिके कारण । तू एकमेव है यहां अर्जुन ।
ऐसा नहीं परम-भाग्यवान । ब्रह्मदेव भी ॥ २२ ॥
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो
दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् ।
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वम्
तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥ ४९ ॥
अर्जुनका अनाडीपन—
तभी यह विश्व-रूप महान । इसका तू भय नहीं मान ।
इससे कुछ भी श्रेष्ठ महान । अपने चित्तमें ॥ २३ ॥
अजी ! छलक रहा अमृत सागर । भाग्यसे पहुंचा कोई उसके तीर ।
तब मरनेके भयसे तजकर । भागेगा क्या वहांसे ॥ २४ ॥
धरो नहीं व्याकुल मूढ भाव
निहार मेरा वह घोर रूप ।
भय छोड़ तू हो प्रसन्न-चित्त
निहार मेरा प्रिय पूर्व रूप ॥ ४९ ॥
ज्ञानेश्वरी ३९६