ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंफिर भी किया मैंने देवसे प्यार । मांग की विश्व-रूपकी जिद्द कर ।
पूर्ण की जो माय-बाप बन कर । स्नेहाथं देव ॥ ७९ ॥
गाछ जो सुर-तरुका । अंगनमें लगानेका ।
बाछा भी काम-धेनुका । दिया खेलने ॥ ५८० ॥
मेरा नक्षत्रोंका दांव लगाना । चंद्रको गेंद बनाके खेलना ।
ऐसी धुनको भी पूर्ण करना । माता बनकर ॥ ८१ ॥
अमृत-बिंदुके लिये करते यत्न । उसकी वर्षा चारमास रात दिन ।
जिससे हर बालका जो कणकण । चिंतामणि हुवा ॥ ८२ ॥
तूने ऐसा कृतार्थ किया । बहु अधिक स्नेह दिया ।
परम-ब्रह्मको दिखाया । जो नहीं सुनाथा ॥ ८३ ॥
कैसा होगा इसका प्रत्यक्ष दर्शन । न होता उपनिषदोंको आकलन ।
हृदयकी ऐसी जो गिरह महान । मुझसे खोली प्रभु ॥ ८४ ॥
देव ! कल्पके आदिसे । इस क्षण तक ऐसे ।
हुए मेरे कितनेसे । यहां जन्म ॥ ८५ ॥
किया मैंने इन जन्मोंका संपूर्ण । खोज खोज कर अवलोकन ।
विश्व-रूप-श्रवणका भी स्मरण । वहां नहीं मिला ॥ ८६ ॥
अजी ! बुद्धि-शक्ति या ज्ञान । न जाता जिसके अंगन ।
कल्पना भी अंतःकरण । कर न सकता ॥ ८७ ॥
तब इसका दर्शन होना । इसकी कैसी करें कल्पना ।
कभी न देखा या सुना । ऐसा हुवा कहीं ॥ ८८ ॥
ऐसा यह विश्व-रूप । दिखाया मुझे अनूप ।
जिससे स्वरूप-रूप । हुवा चित्त ॥ ८९ ॥
चतुर्भुज सौम्य रूप दर्शनकी कामना—
अब रही एक कामना । तुझसे सानंद बात करना ।
तथा सामिप्यको अनुभवना । आलिंगनसे ॥ ५९० ॥
इस रूपसे यह कैसे करना । तब किस मुखसे कहो बोलना ।
अनंतको कैसे अंकमें भरना । नहीं होता यह देव ॥ ९१ ॥
ज्ञानेश्वरी ३९२