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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 468

कभी किसीने जो देखा नहीं था। सो देख तू भय-भीत हुवा था।
संचित प्रेम-सर्वस्व जो भी था। रख वह यहीं पर ॥ ३८ ॥
अब तू जैसा ही है कहता। वैसे शांत रूप मैं धरता।
विश्वतोमुख यह कहता। तू निहार अब ॥ ३९ ॥
सञ्जय उवाच
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा
स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।
आश्वासयामास च भीतमेनं
भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥ ५० ॥
विश्वरूप विसर्जन --
ऐसा वाक्य कह वह तत्क्षण । मनुष्य हुवा देव विलक्षण ।
कहें क्या प्रेमका वह लक्षण । लीला-कौतुक ॥ ६४० ॥
श्रीकृष्ण है कैवल्यधाम प्रकट । देता है सर्वस्व विश्व-रूप श्रेष्ठ ।
किंतु न भाता अर्जुनको जो शिष्ट । वह रूप अद्भुत ॥ ४१ ॥
जैसे कोई वस्तु लेकर लौटाना । रत्नोंका खोट निकालते बैठना ।
अथवा कन्या देखकर कहना । यह मन-भाया नहीं ॥ ४२ ॥
दिखा दी उसको विश्व रूपकी जो दशा । इससे दीखता प्रेम विकास है कैसा ।
देवने दिया रहस्यमय उपदेश । धनंजयको ॥ ४३ ॥
सुवर्णका घड गलाकर । किया जो आभूषण सुन्दर ।
नहीं हुवा उसका स्वीकार । गलाया पुनः ॥ ४४ ॥
संजयने कहा
ऐसा कहा श्रीहरिने तुरंत
तथा दिखाया वह पूर्व-रूप ।
आश्वस्त करने डरे हुएको
हुवा पुनः सौम्य उदार देव ॥ ५० ॥
ज्ञानेश्वरी ३९८