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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 472

विश्व-रूप कभी किसी काल । देखेंगे अणुमात्र केवल ।
इस आशासे देव सकल । करते हैं चिंतन ॥ ७८ ॥
अंजली जैसे आशाकी । माथे पर ले सदाकी ।
निहारते आकाशकी । राह चातक ॥ ७९ ॥
ऐसे उत्कंठासे भरकर । देखते हैं सदा सुर नर ।
निहारते हैं आठो प्रहर । उसके दर्शनार्थ ॥ ८० ॥
फिर भी विश्व-रूप सरीखा । स्वप्न भी किसीने नहीं देखा ।
प्रत्यक्ष मिला जो वह सुख । तुझको यहां ॥ ८१ ॥
नाहं वेदैर्न तपसा न दाने न चेज्यया ।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ५३ ॥
वहां पहुंचनेका साधन । कोई नहीं जान तू अर्जुन ।
वेद सहित षड्दर्शन । व्यर्थ है वहां ॥ ८२ ॥
करने विश्व-रूप दर्शन । करनेमें सब तपको जान ।
अशक्य पानेमें वह स्थान । धनंजय ॥ ८३ ॥
तथा जैसे देखा तूने सविस्तर । वैसे ज्ञान यज्ञसे भी धनुर्धर ।
निहारना जान तू अति दुस्तर । किसीको भी ॥ ८४ ॥
इसका है एक ही प्रकार । सुन तू यह चित्त देकर ।
चित्त करता जब स्वीकार । भक्तिको नित्य ॥ ८५ ॥
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥ ५४ ॥
वह भी भक्ति है कैसी । वर्षा न जानती जैसी ।
दूसरा आसरा वैसी । धरती बिन ॥ ८६ ॥
तप यज्ञ किया दान तथा अभ्यास वेदका ।
तो भी दर्शन है मेरा अशक्य जो तुझे मिला ॥ ५३ ॥
अनन्य भक्तिसे शक्य मेरा है ज्ञान दर्शन ।
तत्वता जानना पाना प्रवेश मुझमें फिर ॥ ५४ ॥
ज्ञानेश्वरी ४०२