ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि
विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं
तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ ४२ ॥
हे आदि अनादि पुरुष ! तुझसे हंसी-विनोद किया क्षमा कर —
इस विश्वका तू अनादिमूल । जहां जब मिला हंसीके बोल ।
बोला सगाईके नाते केवल । विनोदसे बहु ॥ ४४ ॥
आते थे हम जब तेरे सदन । पाते थे तुझसे ही बहु सम्मान ।
तो भी अति लगावसे जनार्दन । बैठते थे रूठके ॥ ४५ ॥
समझाना हमारे पांव छूकर । तुझसे है इस भांति चक्रधर ।
बैठते जैसे हटके रूठ कर । ऐसे किया बहुत ॥ ४६ ॥
आत्मीय-जन भावके नाते । उलटे हो हम थे बैठते ।
ऐसे प्रकार किसे सोहते । भूल हुयी स्वामी ॥ ४७ ॥
अरे ! कलावाजी कर देवसे । आखाडेमें भिडते थे मस्तीसे ।
सतरंजमें आ अति-क्रोधसे । लड़ते थे देव ॥ ४८ ॥
जो चाहा जो तुझसे मांगना । तुझको ही उपदेश करना ।
“तुझसे क्या हमारा ! ” भी बोलना । हमारी उदंडता ॥ ४९ ॥
ऐसे हैं हमारे अनंत अपराध । त्रिलोकमें नहीं समाते अगाध ।
तेरे चरण छू लेता कर सौगंध । था यह सब अज्ञानसे ॥ ५५० ॥
भोजनके समय देव । रखते स्मरण सदैव ।
किंतु मूर्ख मैं जो सगर्व । अडके बैठता ॥ ५१ ॥
खेला फिरा साथ जीमा कि सोया
एकांतमें या सबके समक्ष ।
तथा हंसी की तुझ तुच्छ माना
क्षमा करो भान तेरा किसे है ॥ ४२ ॥
ज्ञानेश्वरी ३८८