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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 464

या परिमळ आया मरगज । आनंदमें उमड आये भुज ।
गोदमें खेला सो मकरध्वज । हुवा सुंदर ॥ १ ॥
अजी ! मस्तकपर रखा मुकुट । मस्तक बना-मुकुटका मुकुट ।
अंगारमें हुवा सौंदर्य प्रकट । शरीरसे ही ॥ २ ॥
जैसे इंद्र-धनुषका जो वर्तुल । घेरता मेघको गगन-मंडल ।
वैसे देवके शरीरको शामल । माला वैजयंती ॥ ३ ॥
कैसी वह है उदार गदा । मोक्ष देती असुरोंको सदा ।
वैसे ही चक्र वह गोविंद । सोहता सौम्य तेजसे ॥ ४ ॥
वैसे ही रूप शाम-सुंदर । देखनेको शिशु है आतुर ।
इसीलिये प्रभु तू सत्वर । बन जा वैसे ॥ ५ ॥
विश्व-रूपका उत्सव देख । शिथिल हुई है मेरी आंख ।
अब हुई हैं अति उत्सुक । कृष्ण-मूर्तिके लिये ॥ ६ ॥
कृष्ण-रूप वह जो साकार । उसके बिना सूना संसार ।
विश्व-रूप भी जो है असार । मानती आंखें ॥ ७ ॥
भोग मोक्षमें हमें कभी कहीं । श्रीमूर्तिके बिना कुछ भी नहीं ।
इसीलिये अब साकार होई । समेटले यह रूप ॥ ८ ॥
भगवान उवाच
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेंदं
रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं
यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥ ४७ ॥
श्रीभगवानने कहा
प्रसन्न होके निज-योग द्वारा
तुझे दिखाया यह विश्वरूप ।
अनंत तेजोमय आद्य पूज्य
देखा किसीने तुझसे न पूर्व ॥ ४७ ॥
ज्ञानेश्वरी ३९४