ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदेवेश ! तूने यह रूप दिखाकर । मुझ राह भूले शिशुको बुलाकर ।
माताने मानो स्नेहसे गोद लेकर । कराया स्तन-पान ॥ ६८ ॥
अजी ! महा सागरमें विश्व-रूपके । जूझ रहा था हमलोंसे तरंगोंके ।
अब पा लिया किनारा निज-मूर्ति के । दर्शनानुग्रहसे देव ॥ ६९ ॥
सुन तू यह द्वारकापुराध्यक्ष । विश्व रूपसे मानो सूखा था वृक्ष ।
इस दर्शनसे तूने की है रक्षा । प्रेम-मेघ-वर्षासे ॥ ६७० ॥
तृषार्थिको जैसे मिला अपार । लहराता अमृत-सिंधु तीर ।
जीनेका संदेह हुवा है दूर । इस दर्शनसे ॥ ७१ ॥
मेरे हृदयांगणमें आज । खिली आनंद-लता सहज ।
सुख-दर्शनका हुवा साज । मुझको तेरे ॥ ७२ ॥
भगवान उवाच
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ ५२ ॥
पार्थके ऐसे बोलको सुन । ऐसे क्यों कहता जनार्दन ।
तू आ-प्रेमका दृढ स्थान मान । विश्व-रूप वह ॥ ७३ ॥
सदैव यहां मूर्ति-दर्शन । करना केवल लेके तन ।
भूला तू मेरा यह कथन । सुभद्रापति ॥ ७४ ॥
केवल अनन्य भक्तिसे ही यह मिलता है—
अरे ! ऐसा कैसा तू अंधा अर्जुन । हाथ आया स्वर्गका मेरु महान ।
कहता है वह ओछा तेरा मन । यह है भ्रम-भाव ॥ ७५ ॥
रूप है जो मेरा विश्वात्मक । दिखाया तुझे प्रेम-पूर्वक ।
शंभूने किये तप अनेक । किंतु न पा सका वह ॥ ७६ ॥
तथा संकटमें अष्टांग-योगके । पडते हैं योगी आशासे इसके ।
किंतु नहीं पाते भाग्य दर्शनके । इसके कभी वे ॥ ७७ ॥
श्री भगवानने कहा
देखा तूने वह मेरा अति दुर्लभ दर्शन ।
चाहते देव भी नित्य वह स्वरूप दर्शन ॥ ५२ ॥
४०१ विश्व-रूप-दर्शनयोग
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