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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 470

आया जैसे कालको जीतकर । अथवा बवंडर चीरकर ।
या सप्त-सागर तैरकर । अपने बाहूसे ॥ ५८ ॥
उसे हुआ ऐसा अति-संतोष । माना पार्थने परम-उल्लास ।
देख कर श्रीकृष्णको स-हास । विश्व-रूपके नंतर ॥ ५९ ॥
सूर्यके होते ही अस्तमान । नक्षत्रोंसे भरता गगन ।
वैसे देखने लगा अर्जुन । लोगों सह पृथ्वी ॥ ६६० ॥
देखता वैसे ही कुरु-क्षेत्र । दोनों ओर हैं वैसे सगोत्र ।
रण-सज्ज वीर ले शस्त्रास्त्र । चलाते हुए ॥ ६१ ॥
रण-मध्यमें वहां सब शांत । वैसा ही रथ खडा है रक्षित ।
बैठा है उसमें श्रीलक्ष्मी-कांत । अपने पास ॥ ६२ ॥
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥ ५१ ॥
एवं पहले जैसे था वैसे । देखा यह वीर्य-विलाससे ।
फिर कहता जिया मैं ऐसे । हुवा अब ॥ ६३ ॥
बुद्धिको छोड कर ज्ञान । भयसे गया था जो वन ।
अहंकार सह है मन । भाग गया था ॥ ६४ ॥
इन्द्रियां प्रवृत्ति भूल गयी थीं । भाषा प्राणसे वंचित हुई थीं ।
शरीर-ग्राममें अव्यवस्था थी । अभूतपूर्व ॥ ६५ ॥
हुवे वे सब अब प्रफुल्लित । प्रकृति हुई फिरसे जीवित ।
अब हुवा पुनरुज्जीवित । ऐसे लगता मुझे ॥ ६६ ॥
जीवने ऐसा सुख पा लिया । फिर कृष्णसे है कह दिया ।
मैंने तेरा वह जो पा लिया । यह मानवी रूप ॥ ६७ ॥
अर्जुनने कहा
देखके यह जो सौम्य मानवी-रूप माधव ।
हुवा प्रसन्न औ' शांत आया मैं निज भावमें ॥ ५१ ॥
ज्ञानेश्वरी ४००