ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
या सकल जल संपत्ति । लेकर सागरमें जाती ।
जैसे गंगा अनन्य-गति । लय हो मिलती है ॥ ८७ ॥
वैसे सर्व भाव सहित । होकर अति स्नेह-सिक्त ।
रहना मुझमें हो रत । मेरे ही रूपमें ॥ ८८ ॥
तथा मैं रहता ऐसा । क्षीर-सागरमें है जैसा ।
तटपे मध्यमें एकसा । रहता है दूध ॥ ८९ ॥
मुझसे चींटी पर्यंत । चराचरमें समस्त ।
भजनमें नहीं भ्रांत । होता कभी ॥ ६९० ।
उसी क्षणसे है होती । विश्व-रूपकी प्रतीति ।
नयन सम्मुख आती । मूर्ति विश्व-रूपकी ॥ ९१ ॥
ईंधनसे जैसे अग्नि प्रदीप्त । होनेसे होता ईंधन समाप्त ।
तथा ईंधन ही अग्नि बन व्याप्त । होता है वैसे ॥ ९२ ॥
सूर्यके अभावसे जैसे अंबर । बन जाता है स्वयं ही अंधकार ।
सूर्योदयसे होता है तेजाकार । पूर्णरूपसे वह ॥ ९३ ॥
वैसे है मेरा साक्षात्कार । दूर करता अहंकार ।
तथा मिटता द्वैताकार । सहज भावसे ॥ ९४ ॥
फिर मैं वह यह संपूर्ण । बनता है जो एक रूपेण ।
तथा एक भाव एक गुण । होता है समरस ॥ ९५ ॥
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः संगवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पांडव ॥ ५५ ॥
मेरे लिए ही जो सतत । करता कर्म समर्पित ।
मेरे बिन उसे जगत । लगता सूना ॥ ९६ ॥
दृश्यादृश्य उसे सकल । जो कुछ है मैं ही केवल ।
उसका जीनेका जो फल । मेरा ही नाम ॥ ९७ ॥
मग्न जो कर्ममें मेरे भक्तिसे है भरा हुआ ।
असंग सर्व-निर्वैर पाता हो मुझ मत्पर ॥ ५५ ॥
४०३ विश्व-रूप-दर्शनयोग
प्राणि-मात्रोंकी बातको भूल । सर्वत्र देखता मुझे ही केवल ।
इसीलिये होता निर्वैर सकल । विश्वको भजता ॥ ९८ ॥
अजी ! होता है जो ऐसा भक्त । होनेपे उसका देह-पात ।
मैं ही हो जाता है वह पार्थ । पूर्ण रूपसे ॥ ९९ ॥
अगले अध्यायकी भूमिका—
ऐसा वह विश्वोदर तोंदल । वैसे ही करुणा-रस रसाल ।
श्रीकृष्ण बोला ऐसे मधुबोल । कहता संजय ॥ ७०० ॥
सुनकर यह पांडुकुमार । आनंद-संपदामें भरकर ।
श्रीहरि पद-कमल-भ्रमर । मान अपनेको ॥ १ ॥
उसने देखली वे दोनो मूर्ति । अपने चितमें भरी आकृति ।
तब विश्व-रूपसे कृष्णाकृति । लगी सुंदर ॥ २ ॥
किंतु उसका बना जो ज्ञान । अमान्य करता जनार्दन ।
व्यापकसे न होता महान । कभी रूप एक ॥ ३ ॥
करनेमें समर्थन । इसका श्री भगवान ।
कहता है दो वचन । अर्जुनसे ॥ ४ ॥
उन्हें सुनकर अर्जुन । चितमें करता चिंतन ।
इसमें बड़ा है कौन । पूछें इनसे ॥ ५ ॥
ऐसा सोचकर चितमें पार्थ । करेगा प्रश्न जो अब उचित ।
सुनेंगे अब हम जो खचित । अगले निरूपणमें ॥ ६ ॥
प्रांजल ओवी प्रबंध । कहा मैंने स-विनोद ।
यह निवृत्ति प्रसाद । कहे ज्ञानदेव ॥ ७ ॥
भरके सद्भावनाकी अंजली । मैंने ओवी सुमन भरी खुली ।
अर्पण की हे चरण युगली । विश्व-रूपके ॥ ८ ॥
गीता श्लोक ५५
ज्ञानेश्वरी ओवी ७०८.
ॐ
१२
भक्तियोग
मातृ-रूपसे गुरुका वन्दन—
जय-जय हे शुद्धे । उदारतम प्रसिद्ध ।
अनवरत आनन्दे । वर्षा कर ॥ १ ॥
विषयव्यालका जकडनव । विषतम भ्रमका अंजन ।
गुरु-कृपाके स्निग्ध-नयन । निर्विष करेंगे ॥ २ ॥
झुरसा हो कैसे ही तापमें । या जला हो कैसे हि शोकमें ।
तव कृपा-रस-कल्लोलमें । होंगे शीतल ॥ ३ ॥
अजी ! योग-सुखका उमंग । तव स्नेह-रसके तरंग ।
सोऽहं सुख सिद्धिसें अंतरंग । भर देते हैं ॥ ४ ॥
आधार शक्तिकी गोदमें । बढाती प्रेम-सुख-मोदमें ।
हृदयाकाश पालनेमें । झुलाती सदा ॥ ५ ॥
उतारती प्रागज्योतिकी आरति । मन पवन खिलौनोंसे खिलाती ।
आत्म-सुख अलंकारसे सजाती । बालकको नित ॥ ६ ॥
सत्रहवींका स्तन्य देती । अनाहतके गीत गाती ।
समाधि-बोधमें सुलाती । समझाके ॥ ७ ॥
तभी तू साधकोंकी मां कहलाती । चरणमें साहित्य-लता खिलती ।
तब चरण तलकी छाया ही गति । सर्वदा मुझे ॥ ८ ॥
अजी ! सद्गुरुकी कृपा-दृष्टि । तब कारुण्य जिसकी अधिष्ठी ।
सकल विद्याओंकी जो सृष्टि । धात्री ही है ॥ ९ ॥
तभी हे अंबे श्रीमंते । निज-जन कल्पलते ।
आज्ञा दे तू मुझे माते । ग्रन्थ-निरूपणकी ॥ १० ॥
नव-रसके भरे सागर । जो हैं महा रत्नोंके आगर ।
भावार्थके ऊँचे गिरिवर । उठ आयेंगे ॥ ११ ॥
साहित्य सुवर्णकी खान । हो देश-भाषाका अंगन ।
विवेक-वल्लीका उद्यान । लगे सर्वत्र ॥ १२ ॥
संवाद-फल निधान । प्रमेयोंका उपवन ।
लगे सर्वत्र गहन । निरंतर ॥ १३ ॥
पटे पाखंडकी खायी महान । मिटे वाग्वाद सब अर्थ-शून्य ।
भगे कुतर्कके दुष्ट-श्वान । सदाके लिए ॥ १४ ॥
मेरा चित्त सदैव श्री कृष्ण गुणवर्णनमें समर्थ हो—
श्रीकृष्ण-गुणगानमें चित्त । रहे मेरा सर्वदा समर्थ ।
श्रोता श्रवणासनपे रत । रहे निरंतर ॥ १५ ॥
त्रिभुवनके सभी नगर । बने ब्रह्मविद्याका आगर ।
लेन-देनका रहे आधार । सुविचार मात्र ॥ १६ ॥
मां अपने स्नेहांचलमें । संभालो सर्वदा गोदमें ।
वहां यह सब लीलामें । उपजाऊँ मैं ॥ १७ ॥
इस विनयसे रीझ उठी । श्रीगुरुकी अनुग्रह-दृष्टि ।
कहा कर अब गीता गोष्ठि । न बोल अन्य ॥ १८ ॥
वहांका यह महा-प्रसाद । पाकर हुआ महदानन्द ।
अब कहूँगा गीता-प्रबंध । सुनियेजी ॥ १९ ॥
अर्जुन उवाच
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥ १ ।
विलीन तुझमें होके भजता भक्त जो तुझे ।
कोई अक्षर अव्यक्त योगियोंमें श्रेष्ठ कौन हैं ॥ १ ॥
ज्ञानेश्वरी ४०६
ईश्वर प्राप्तिके दो मार्ग—
तब सकल वीराधिराज । सोम-वंशका विजयध्वज ।
बोलने लगा वह आत्मज । पांडु नृपतिका ॥ २० ॥
कृष्ण ! मैने किया श्रवण । तथा विश्वरूप दर्शन ।
भय-ग्रस्त हुआ जी मन । देख अद्भुत ॥ २१ ॥
कृष्ण-मूर्तिका है रूप सुन्दर । जिसका किया चितने आधार ।
श्रीकृष्ण तूने ना कहकर । दूर किया मुझसे ॥ २२ ॥
अजी ! व्यक्त तथा अव्यक्त । एकमात्र तू है निर्भ्रांत ।
भक्तिसे जो मिलता व्यक्त । अव्यक्त योगसे ॥ २३ ॥
अजी ! ये हैं दो ही पथ । दर्शनार्थिको उचित ।
द्वारमें व्यक्त अव्यक्त । पहुंचाते जो ॥ २४ ॥
कस होता है जो तोला स्वर्णका । वही कस होता एक रत्तिका ।
इसीलिए जो है एक व्यापक । दूसरा है सीमित ॥ २५ ॥
जो महानता अमृत व सिंधुकी । वही शक्ति है अमृत-बिंदुकी ।
करनेसे आचमन दोनोंकी । मिलती एकसे जो ॥ २६ ॥
इन दोनोंसे तत्वतः तुझे कौन जानता है ?—
बात है यह मेरा चित्त । प्रतीत करता निश्चित ।
जानना चाहूं तेरा मत । योगेश्वर ॥ २७ ॥
श्रीकृष्ण तूने क्षण एक । स्वीकार किया जो व्यापक ।
यथार्थमें था या कौतुक । जिज्ञासासे ॥ २८ ॥
तेरे लिए ही सब कर्म । तु ही है जिनका परम ।
भक्तका यह मनो-धर्म । सर्व-समर्पण ॥ २९ ॥
तथा अन्य सब भांति । तुझको ही मान गति ।
दृढ़ कर यह मति । भजते तुझे ॥ ३० ॥
तथा जो प्रणवके उस पार । वैखरीके लिए भी जो है पर ।
उपमा रहित औ' निराकार । वस्तु है जो ॥ ३१ ॥
४०७ भक्तियोग
वह है अक्षर औ' अव्यक्त । तथा निर्देश देश रहित ।
तत्वऽमसि भावसे पूजित । ज्ञानियोंसे ॥ ३२ ॥
योगी या भक्तमें तत्वता । तुमको कौन है जानता ।
कह तू मुझको अनंता । इस समय ॥ ३३ ॥
सुन अर्जुनकी यह बात । जगद्बन्धु हो प्रसन्न चित्त ।
कहे करना प्रश्न उचित । जानता तू ॥ ३४ ॥
भगवान उवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥ २ ॥
दिन रात मेरा चिंतन करनेवाला भक्त मुझे जानता है -
जैसे अस्ताचलके समीप । गये रवि-बिंबके आतप ।
रविके पीछे अपने आप । चलता वैसे ॥ ३५ ॥
वर्षा-ऋतुकी जो सरिता । चढ़ती जाती पांडुसुता ।
वैसी नित्य-नूतन आस्था । दीखे भजनमें ॥ ३६ ॥
मिलन स्थलमें जैसे सागर । गंगा-प्रवाह होता अनिवार ।
वैसा आता है अनिवार पूर । प्रेम-भावका ॥ ३७ ॥
वैसे जो सर्वेंद्रिय सहित । नित रहता मुझमें रत ।
स्मरता रहता दिन-रात । न जानकर भी ॥ ३८ ॥
इस प्रकार है जो भक्त । कर सर्वस्व समर्पित ।
उसको ही मैं योगयुक्त । मानता श्रेष्ठ ॥ ३९ ॥
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥ ३ ॥
मुझमें मनको रोप भजता नित्य जो मुझे ।
जुड़ा परम श्रद्धासे उसे मैं श्रेष्ठ मानता ॥ २ ॥
जो है अचिंत्य अव्यक्त सर्व-व्यापी अवर्णित ।
नित्य निश्चल निर्लिप्त जो अक्षर उपासता ॥ ३ ॥
ज्ञानेश्वरी ४०८
निराकारका योग-मार्ग—
तथा अन्य है जो पांडव । आरूढ होके सोऽहं भाव ।
उलझते निरवयव । अक्षरसे ॥ ४० ॥
जहाँ मनकी रसाई नहीं होती । बुद्धिकी दृष्टि भी नहीं पहुँचती ।
वहाँ होगी इन्द्रियोंकी कौन गति । कह तू अर्जुन ॥ ४१ ॥
ध्यानमें भी वह आना कठिन । होता नहीं उसका एक स्थान ।
न होता उसका आकार गुण । इससे ही ॥ ४२ ॥
जिसका सर्वत्र सर्व काल । रहना सदैव सर्व-स्थल ।
देख होती कुंठित सकल । चिंतन-शक्ति ॥ ४३ ॥
जिसका आदि अन्त है नहीं । तथा है नहींका पता नहीं ।
जिसका कोई उपाय नहीं । जाननेका ॥ ४४ ॥
जो स्थिर न चर । जर ना अजर ।
पाया वह पर । जिन्होंने स्वयं ॥ ४५ ॥
संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवंति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ ४ ॥
उनके वैराग्य महाज्वालसे । विषय-वाहिनीको जलानेसे ।
अधजले इंद्रियोंको धैर्यसे । समेट लिया है ॥ ४६ ॥
फिर संयमके पाशमें । पैंठके अंतर तममें ।
इंद्रियाँ हृदय द्वारमें । बाँध रखी ॥ ४७ ॥
लगाया अपानका जो द्वार । देकर आसन मुद्राधार ।
मूलबन्धका सुदृढ़ घर । बना लिया ॥ ४८ ॥
तोड़ा लगाव चाहका । ढा दिया ढाँचा भयका ।
मिटाया निद्रा-तमका । अंधियारा जो ॥ ४९ ॥
रोकता इन्द्रियां सारी सर्वत्र सम-बुद्धिसे ।
पाते हैं मुझको ही वे विश्वके हितमें रत ॥ ४ ॥
(52) ४०९ भक्तियोग
महा ज्वालाओंसे वजाग्निकी । होली कर अपान धातुकी ।
व्याधि-वर्ग मुंडोंसे पूजा की । शतघ्नीकी ॥ ५० ॥
फिर मशाल कुण्डलिनीकी । आधारचक्र पर खड़ी की ।
राह बतायी ब्रह्म-रंध्रकी । उस प्रभाने ॥ ५१ ॥
नव-द्वारके किवाड पर । संयम सांखली लगाकर ।
खोला सुषुम्ना गवाक्ष-द्वार । धनंजय ॥ ५२ ॥
तब प्राण-शक्ति चामुंडा । प्रहारसे संकल्प भेड ।
मन महिषासुर मुंड । लेती है बलि ॥ ५३ ॥
इडा पिंगलाका ऐक्य कर । अनाहद नाद जगाकर ।
जीत लिया इन्द्रामृत नीर । उसी क्षण ॥ ५४ ॥
फिर मध्यमा मध्य विवर । जिसका द्वार अति सुन्दर ।
खोलके ब्रह्मरंध्र शिखर । पालिया है ॥ ५५ ॥
सिवा मकारांत सोपान । छोड करके जो गहन ।
फाँकमैं ले शून्य गगन । पाया ब्रह्मैक्य ॥ ५६ ॥
ऐसे जो सर्वत्र समबुद्धि । निगल जानेमें सोऽहं सिद्धि ।
प्राप्त करते हैं निरवधि । योग दुर्ग ॥ ५७ ॥
अपनेको ही बेचकर । लेते हैं शून्य निराकार ।
वे भी पाते हैं धनुर्धर । मुझको ही ॥ ५८ ॥
अव्यक्तोपासकसे व्यक्तोपासक भले-क्यों कि—
पाते हैं योग बलसे । विशेष हैं कछु ऐसे ।
नहीं कष्ट ही अधिकसे । पाते हैं वे ॥ ५९ ॥
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ ५ ॥
विशेष क्लेश पाते हैं गूंथ अव्यक्तमें चित्त ।
होना अज्ञातमें बोध कठिन देह-धारिको ॥ ५ ॥
ज्ञानेश्वरी ४१०
सकल भूतोंके हितार्थ । निरालंब औ' अव्यक्त ।
उसमें हुआ जो आसक्त । बिना भक्तिके ॥ ६० ॥
उसको इन्द्रादिक पद । करते हैं पथमें वध ।
तथा ऋद्धि-सिद्धियोंका द्वंद्व । बनते हैं रोडे ॥ ६१ ॥
काम-क्रोधके उत्पात । करते बडे आघात ।
तथा शून्यसे भिडन्त । नित है तनको ॥ ६२ ॥
प्याससे प्यास ही है पीना । भूखसे भूख ही है खाना ।
दिन रात हवा गिनना । हवासे ही ॥ ६३ ॥
सतत-जागृति जहां सोना । इन्द्रिय इन्द्रियको ही भोगना ।
वृक्षोंसे मैत्री करके बोलना । स्वभावसे ॥ ६४ ॥
शीतको बिछाना । तापको ओढना ।
घरमें हैं सोना । वर्षाके ॥ ६५ ॥
अथवा यह हे धनंजया । अग्नि-प्रवेश है नित-नया ।
आंतर बिना ही पूर्णतया । करना ही योग ॥ ६६ ॥
न है यह स्वामीका काज । जिसमें मिलता स-व्याज ।
किंतु मात्र मृत्युसे झूज । नित्य-नयी ॥ ६७ ॥
ऐसा मृत्युसे भी जो भीषण । तप्त विष घूंटसे भी तीक्ष्ण ।
पहाड लीलनेमें आनन । न फटेगा क्या ? ॥ ६८ ॥
योगीका जो पथ । चलते हैं पार्थ ।
दुःख ही हैं साथ । उनके सदा ॥ ६९ ॥
अजी ! लोहेके ही चने । पडते हैं नित खाने ।
पेट भरने या मरने । क्या कहें इसे ? ॥ ७० ॥
बाहुसे तरना सागर । पैरोंसे गगन विहार ।
ऐसा ही है पांडुकुमार । बात जो यह ॥ ७१ ॥
बीच रण रंगमें जाकर । तनपे घाव न झेलकर ।
सूर्य मण्डलको भेदकर । आना कैसे ? ॥ ७२ ॥
४११ भक्तियोग
पंगुकी बराबरी वायुसे । शरीरीकी निर्गुणमें वैसे ।
प्रवेश है समान रूपसे । जान तू पांडव ॥ ७३ ॥
फिर भी करके साहस । लिपट लेते हैं आकाश ।
जिससे पायेंगे वे क्लेश । निश्चित जान ॥ ७४ ॥
किंतु इस और पार्थ । न जाने क्या है व्यथा ।
तभी है ये भक्ति-पंथ । आते हैं जन ॥ ७५ ॥
भक्ति पंथ सरल है—क्यों कि—
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायंत उपासते ॥ ६ ॥
कर्मेंन्द्रिय यहां स-सुख । करती हैं कर्म विशेष ।
प्राप्त हैं जो वर्ण विशेष । स्वभाव-जन्य ॥ ७६ ॥
विधिको है पालना । निषिद्धको त्यागना ।
अर्पण कर जलाना । कर्म-फलको ॥ ७७ ॥
इस भांति कर समर्पण । कर्मका करते हैं क्षालन ।
ऐसे करते कर्म अर्जुन । जो हैं भक्त ॥ ७८ ॥
दूसरे भी हैं जो जो सर्व । काया वाचा मनके भाव ।
मेरे बिना नहीं है ठाव । कोई भी अन्य । ॥ ७९ ॥
ऐसे होके जो मत्पर । उपासते निरंतर ।
जिससे हैं मेरा घर । ध्यानसे वे ॥ ८० ॥
उनकी रुचि चाह चाव । मेरे लिए ही है ये सर्व ।
योग-क्षेम मोक्षादि भाव । त्यजे कुलादि भी ॥ ८१ ॥
ऐसा यह अनन्य-योग । न्योच्छावर मन प्राण अंग ।
उनका क्या है एकेक भाग । करता हूं मैं सब ॥ ८२ ॥
किंतु जो सब ही कर्म करके मुझ अर्पण ।
अनन्य भक्तिसे मेरा करते नित्य चिंतन ॥ ६ ॥
ज्ञानेश्वरी ४१२
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ ७ ॥
निष्काम भक्तसे मैं अत्यंत प्रेम करता हूँ—
अथवा जो पांडुकुमार । आता जो माताके उदर ।
उससे माता कैसे प्यार । करती है नित ॥ ८३ ॥
वैसा मैं करता उनसे । जहां वे जैसे रहते वैसे ।
कलिकालके परिहारसे । करता स्वीकार ॥ ८४ ॥
वैसा तो कभी मेरा भक्त । संसार चिंता नहीं करता ।
अजी ! क्या श्रीमंतकी कांता । मांगती कोरास ॥ ८५ ॥
वैसा वे सर्वदा सर्वत्र । माननाजी मेरा कलत्र ।
लजाऊँ ना मैं तिलमात्र । उनकी सेवामें ॥ ८६ ॥
जन्म-मृत्युके भंवरमें । देख डूबे हुए विश्वमें ।
उठे ये विचार मनमें । ऐसे सब ॥ ८७ ॥
भव सागरके खम्भारमें । भय न हो किसके हियमैं ।
यहां यदि मेरे ही जनमें । होगी भीति ॥ ८८ ॥
इसीलिये मैं अर्जुन ! रूप लेकर सगुण ।
जहां बसते सज्जन । आया वहां ॥ ८९ ॥
मेरे नाम हैं जो अनंत । नांव है यहां मूर्तिमंत ।
इसको लेकर मैं पार्थ । बना मांझी ॥ ९० ॥
ये जो परिग्रह रहित । उनको लगाया ध्यानार्थ ।
जो ये परिग्रह सहित । उनको नाममें ॥ ९१ ॥
प्रेमकी पेटी बांधकर । लाया किसीको तैराकर ।
पहुंचाया है तीर पर । सायुज्यके ॥ ९२ ॥
रोक्ता मुझमें चित्त उनको शीघ्र मैं स्वयम् ।
बिना विलम्ब उद्धार करता भव-सिंधुसे ॥ ७ ॥
४१३ भक्तियोग
जिसने पकडे मत्पाद । भले ही होवे चतुष्पाद ।
उनको मिला महापद । मेरे सानिध्यका ॥ ९३ ॥
इसीलिए जी भक्त । नहीं होते चिंतित ।
उनका समुद्धर्त्ता । मैं हूं सदा ॥ ९४ ॥
तथा जबसे की भक्ति । दी मुझको चित्त-वृत्ति ।
उनके फंदकी शक्ति । खींचती मुझे ॥ ९५ ॥
इस कारणसे अर्जुन । कर भक्तिका आचरण ।
यह मंत्र रखो स्मरण । मनमें सदा ॥ ९६ ॥
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥ ८ ॥
मन बुद्धि आदिका मुझमें लीन होनेसे मद्रूप हो जाता है—
अजी ! मानस यह एक । मेरे स्वरूपमें वृत्तिक ।
करके रख तू निष्कंक । निश्चित बुद्धिसे ॥ ९७ ॥
इन दोनों साधनसे । मुझमें रहे प्रेमसे ।
मिलन होगा मुझसे । तेरा निश्चित ॥ ९८ ॥
मन बुद्धिने घर । किया मेरे भीतर ।
रहा क्या भेद और । मेरे तेरेका ॥ ९९ ॥
जैसे ज्योति बुझने पर । मिट जाती कांति सत्वर ।
या अस्त होते ही भास्कर । जाता प्रकाश ॥ १०० ॥
तजता जब तनको प्राण । निकल जाते सभी कण ।
जहां मन-बुद्धिका गमन । वहां अहंकार ॥ १ ॥
इसीलिये मेरे स्वरूपमें । मन बुद्धिके रत आनेमें ।
होगा तू विश्व-व्यापकतामें । मैं ही मान ॥ २ ॥
मनको मुझमें रोक बुद्धि भी मुझमें रख ।
तभी तू फिर निःशंक पाएगा मम रूप ही ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ४१४
इस बचनमें कहीं । अन्यथा कछु भी नहीं ।
मेरी प्रतिज्ञा है यही । सौगंध पूर्वक ॥ ३ ॥
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनंजय ॥ ९ ॥
मद्रूपका क्षणिक अनुभव-अभ्यास-योग—
अथवा यह चित्त । मन बुद्धि सहित ।
मुझको अचुंबित । न दे सके तो ॥ ४ ॥
तब तो ऐसा कर । दिनमें क्षण भर ।
सबको भूलकर । रत हो मुझमें ॥ ५ ॥
जिससे तू निमिष एक । अनुभवेगा मेरा सुख ।
उससे होगा अरोचक । विषय-मात्र ॥ ६ ॥
जैसा शरत्काल आता । सूखते जाती सरिता ।
वैसी छूटेगी ममता । प्रपंचसे ॥ ७ ॥
फिर पूर्णमासीसे जैसे । शशि-बिंब लगता वैसे ।
अमावसमें पूर्णरूपसे । मिट जाता है ॥ ८ ॥
ऐसे वासनासे निकलकर । मुझमें चित्त चुभते जाकर ।
धीरे धीरे वह अर्जुन स्थिर । होगा मद्रूप ॥ ९ ॥
अजी ! अभ्यास योगका अर्थ । एक ही जो है सर्व समर्थ ।
जिससे न होगा कुछ प्राप्त । ऐसा नहीं ॥ ११० ॥
सुन अभ्यासका बल । देता मति अन्तराल ।
व्याघ्र सर्पको प्रांजल । करते इससे ॥ ११ ॥
विषका ही आहार बनता । सागरपे पगसे चलता ।
कोई वाग्ब्रह्मको ही जीतता । अभ्यास बलसे १२ ॥
करना चित्तको शांत असाध्य मुझमें तब ।
अभ्यास योगसे चाह तू मेरी प्राप्तिको कर ॥ ९ ॥
४१५ भक्तियोग
अभ्यासको कुछ नहीं । सर्वथा दुष्कर कहीं ।
इसलिए मुझमें ही । उससे रत हो ॥ १३ ॥
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ १० ॥
निराग्रह वृत्तिसे जीवन-यापन—
अथवा अभ्यासमें ऐसा । न आता साहस सहसा ।
तब रह अब है जैसा । अर्जुन तू ॥ १४ ॥
इन्द्रियोंका निग्रह न कर । विषय-भोग कम न कर ।
याभिमानका त्याग न कर । स्वजातिका ॥ १५ ॥
कर कुल धर्माचरण । विधि निषेधका पालन ।
तब भी सुखसे जीवन । चलता रहता है ॥ १६ ॥
किंतु काया वाचा मन । करता जो आचरण ।
उसका जो अहंपन । न मान तू ॥ १७ ॥
जिसको है विश्व चलाना । पूर्ण यह उसने जाना ।
करना या नहीं करना । उसका काम ॥ १८ ॥
उसमें कुछ जो न्यून पूर्ण । उससे अछूता रख मन ।
स्वजातिके लिए ही जीवन । देकर तू ॥ १९ ॥
जैसा ही माली चलाता ले जाता । वैसा ही पानी है सहज जाता ।
यदि तू वैसा ही करता जाता । निराभिमानसे ॥ १२० ॥
वैसे ही देख तू पार्थ । कैसा है अपना पथ ।
देखता क्या यह रथ । अल्पसा भी ॥ २१ ॥
तभी प्रवृत्ति या निवृत्ति । इससे दूर रख मति ।
तथा अखंड चित्त-वृत्ति । मेरे स्मरणमें ॥ २२ ॥
अभ्याससे न हो साध्य तब मत्कर्म आचर ।
मिलेगी तुझको सिद्धि सत्कर्म करने पर ॥ १०
ज्ञानेश्वरी ४१६
जैसे वृक्ष अथवा वेल। गिर देते हैं पक्व फल।
वैसे तज दें फल सकल। कर्म सिद्धिके ॥ ज्ञा. १२-१२९
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कर्म जो होता है तुझे प्राप्त । न मान तू अल्प या बहुत ।
चुपचाप कर तू अर्पित । मुझको सदा ॥ २३ ॥
ऐसी ही मद्भावना । तन त्यागमें अर्जुना ।
तू सायुज्य सदन । पायेगा मेरा ॥ २४ ॥
कर्म-रत रहकर कर्म फल समर्पण—
अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥ ११ ॥
न तो यह भी तुझे । न दे सके कर्म मुझे ।
तब तू सतत मुझे । भजते जा ॥ २५ ॥
बुध्दिके पेट पीठमें । कर्मके आदि अंतमें ।
मुझको जोड़ देनेमें । यदि है दुस्तर ॥ २६ ॥
तो यह भी रहने दो । मदर्पणकी जाने दो ।
किंतु निग्रही होने दो । बुध्दि तेरी ॥ २७ ॥
और जैसे जिस काल । कर्म होते हैं सकल ।
उसके वे सब फल । तजते जा ॥ २८ ॥
जैसे वृक्ष अथवा वेल । गिरा देते हैं पक फल ।
वैसे त्यज दे फल सकल । कर्म सिद्धिके ॥ २९ ॥
मनमें मेरा करना स्मरण । अथवा मुझे करना अर्पण ।
यदि है तुझे यह अग्रहण । जाने दे शून्यमें ॥ ३० ॥
जैसे पत्थर पे पड़ी वर्षा व्यर्थ । तथा आगमें हुई बुवाई व्यर्थ ।
अथवा देखा हुआ स्वप्न है व्यर्थ । वैसा कर्म-फळ ॥ ३१ ॥
अजी ! जैसे आत्मजामें । जीव निष्काम मनमें ।
वैसे सकल कर्ममें । अकाम होना ॥ ३२ ॥
ऐसा कर्म न होता तो मुझमें योग साधके ।
यत्नसे छोड़ तू सारे कर्मके फल अर्जुन ॥ ११ ॥
(53) ४१७ भक्तियोग
जैसे उठती अग्नि-ज्वाल । आकाशमें व्यर्थ सकल ।
वैसे लय हो कर्म-फल । शून्यमें ही ॥ ३३ ॥
अर्जुन यह जो फल त्याग । दीखता है अति असंग ।
योगमें है यह महायोग । सर्वोत्कृष्ट ॥ ३४ ॥
फल-त्याग यह अविकार । जिससे न हो कर्म विस्तार ।
अंकुरता वेणु एक बार । उसी भांति ॥ ३५ ॥
इस शरीरसे ही शरीर । पाना है रुकता बार बार ।
पुनरागमनपे पत्थर । पड़ता मानो ॥ ३६ ॥
अभ्यासकी महत्ता—
फिर अभ्यासका सोपान । सौंपता है ज्ञानका स्थान ।
ज्ञानसे ध्यानका मिलन । सहज होगा ॥ ३७ ॥
ध्यानका तब आलिंगन । करते हैं भाव संपूर्ण ।
रहते तब दूर जान । कर्म-जात ॥ ३८ ॥
जहां कर्म ही दूर है । फल-त्याग सरल है ।
त्यागका जो सहज है । शांति-सुख ॥ ३९ ॥
शांतिके लिये है तब । अभ्यास करना अब ।
क्रमागत ही है सब । सुभद्रापति ॥ १४० ॥
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ।
ध्यानात् कर्मफलत्यागः त्यागाच्छान्तिरनंतरम् ॥ १२ ॥
अभ्याससे भी गहन । अर्जुन फिर है ज्ञान ।
ज्ञानसे भी है जो ध्यान । महत्वका ॥ ४१ ॥
फिर है कर्म-फल-त्याग । जो है ध्यानसे भी सुभग ।
उससे श्रेष्ठ है जो भोग । शांति सुखका ॥ ४२ ॥
मिलता यज्ञसे ज्ञान होती तन्मयता फिर ।
तब पूर्ण फल-त्याग देता है शांति सत्वर ॥ १२ ॥
ज्ञानेश्वरी ४१८
अध्याय ९: राजविद्याराजगुह्ययोग
यह है ऐसा पथ । इस पथसे पार्थ ।
शांतिका ही मध्यस्थ । प्राप्त करता है ॥ ४३ ॥
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुणा एव च ।
निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ॥ १३ ॥
भक्तकी स्थिति-गुण-विकास—
अजी प्राणि मात्रमें कहीं । द्वेषका जो नाम भी नहीं ।
आप-पर-भाव भी नहीं । चैतन्यका-सा ॥ ४४ ॥
उत्तमका करना स्वीकार । अधमका करें अस्वीकार ।
नहीं जानती ऐसा प्रकार । जैसे धरणी ॥ ४५ ॥
राजाके तनको चलाना । रंक-शरीरको हनना ।
न सोचता कृपालु प्राण । वैसा ही वह ॥ ४६ ॥
करें गायका तृषा-निवारण । विष बन व्याघ्रको दे मरण ।
न जानता ऐसा एक भी क्षण । नदी-नीर ॥ ४७ ॥
वैसे हैं सभी भूत-मात्र । उसके समान जो मित्र ।
जैसे धात्रीको है सर्वत्र । सम-भाव ॥ ४८ ॥
मैं तूकी भाषा बोलना । सुख-दुःखको जानना ।
“मेरा” ऐसा भी कहना । नहीं है उसे ॥ ४९ ॥
क्षमामें वैसी ही क्षमता । धरित्री समान योग्यता ।
संतोष नित है बढ़ता । उसकी गोदमें ॥ १५० ॥
संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥ १४ ॥
किसीका न करे द्वेष दया मैत्री बना क्षमा ।
मैं मेरा सब भूला जो सहके सुख दुःखको ॥ १३ ॥
सदा संतुष्ट जो योगी संयमी दृढ निश्चयी ।
मन-बुद्धि मुझे देता भक्त है मुझको प्रिय ॥ १४ ॥
४१९ भक्तियोग
वर्षा-ऋतुके बिना सागर । पूर्ण रहता आत्म-निर्भर ।
वैसा ही वह निरुपचार । सदा-संतुष्ट ॥ ५१ ॥
देकर अपनी सौगंध । देता है हृदयको बोध ।
इससे निश्चयमें बाध । न आता कभी ॥ ५२ ॥
हृदय-भुवनमें जिसके । एक ही आसन पे बैठके ।
शासन करते विराजके । जीव-परमात्मा ॥ ५३ ॥
ऐसी योग समृद्धि । पाकर निरवधि ।
चढाके मन-बुद्धि । मुझपे ही ॥ ५४ ॥
बाहर भीतर योग । शुद्धतामें भी सुबग ।
फिर भी ममानुराग । जिसे सप्रेम ॥ ५५ ॥
अर्जुन ऐसे जो भक्त । वही योगी तथा मुक्त ।
वह वल्लभा मैं कांत । ऐसे जान ॥ ५६ ॥
उससे मुझे जो प्रेम है । जीवनसे भी अधिक है ।
यह बात भी अपूर्ण है । कहूं कैसे ॥ ५७ ॥
अजी ! भक्तोंकी जो कहानी । मुझपे मोहके मोहिनी ।
अकथनीय है कथनी । कहलाती श्रद्धा ॥ ५८ ॥
इसीलिए जी हम । कह गये उपमा ।
वैसे तो वह प्रेम । रहता मौन ॥ ५९ ॥
रहने दो यह किरीटी । प्रिय जनोंकी यह जो गोष्टि ।
प्रेमसे जो पुलक उठी । अति वेगसे ॥ १६० ॥
उसपर भी हे पार्था । सकल संवाद-कर्ता ।
उसको यहां यथार्थ । उपमा भला ॥ ६१ ॥
इसीलिए पांडुसुता । प्रिय तू औ' तू ही श्रोता ।
फिर प्रियकी ही वार्ता । प्रसंग आया है ॥ ६२ ॥
तभी मैं अब बोलता । बोलका सुख भोगता ।
कहके हरि डुलता । आनंद मगन ॥ ६३ ॥
ज्ञानेश्वरी ४२०