ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस कीर्ति-स्मरणसे सदैव । भोगते महा-सुखका वैभव ।
हर्षामृत उर्मिपर स-भाव । डुलते जाते ॥ ३ ॥
अजी ! जीनेसे है यह जग । तुझसे करता अनुराग ।
तथा करनेसे दुष्ट-भंग । अधिकाधिक ॥ ४ ॥
किंतु त्रिभुवनके राक्षस । भय खाते तेरा हृषीकेश ।
तथा भागते हैं दिशा दस । अमर्याद ॥ ५ ॥
और ये सुर सिद्ध किन्नर । अथवा सभी सचराचर ।
देख तुझको है नमस्कार । करते सहर्ष ॥ ६ ॥
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्
गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
अनंत देवेश जगन्निवास
त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥ ३७ ॥
अजी ! यहां किस कारण । राक्षस ये जो नारायण ।
न झुकते तव चरण । भागते सदैव ॥ ७ ॥
और यह तुझको क्या पूछना । इतना तो हमको भी जानना ।
सूर्योदय बाद कैसे रहना । अंधःकारका साध्य ॥ ८ ॥
तू है स्वयं-प्रकाशका आगर । और हुवा है अब जो गोचर ।
तभी निशाचरोंका है अंधार । मिटा सहज ॥ ९ ॥
अब तक जो थे हम जन । न जानते थे तेरी महान ।
महिमा उसका हुवा ज्ञान । इसी समय ॥ ५१० ॥
प्रभो न क्यों ये तुझको नमेंगे
आधार तू ब्रह्मका आदि-कर्ता
अनंत देवेश जगन्निवास
है या नहीं के पर है परेश ॥ ३७ ॥
३८३ विश्व-रूप-दर्शनयोग