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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 463

तमी वायुके साथ दौडना । गगनको आलिंगन देना ।
अथवा जल-क्रीडा करना । महा-सागरमें ॥ ९२ ॥
ऐसे करनेमें देव । भय-ग्रस्त होता जीव ।
विश्व-रूप तू केशव । समेट लेना ॥ ९३ ॥
घूम फिर देखना चराचर । सुखसे रहनेमें होना घर ।
वैसे चतुर्भुज है मनोहर । निवास देव ॥ ९४ ॥
योगाभ्यासका अनुभव । शास्त्राध्ययनका भी देव ।
अंतिम सिद्धांत केशव । यही एक ॥ ९५ ॥
हमने यज्ञ किये सकल । उस फलका भी यही फल ।
दान-पुण्यका भी है केवल । यही कारण ॥ ९६ ॥
अन्य दान-पुण्यका कारण । तीर्थ-यात्रादि जो है साधन ।
इसका कारण है दर्शन । चतुर्भुजका सतत ॥ ९७ ॥
चतुर्भुज दर्शनका जो चाव । बनाता उतावला केशव ।
वह व्याकुलता वासुदेव । दूर कर सत्वर ॥ ९८ ॥
अजी ! अंतःकरणका ज्ञाता । सकल विश्वका रचयिता ।
पूजित देवोंसे भी पूजित । तू हो प्रसन्न ॥ ९९ ॥
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तम्
'इच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन
सहस्र बाहो भव विश्वमूर्ते ॥ ४६ ॥
जैसे नीलोत्पल रंजन । रंगता जो सदा गगन ।
तेजका ओज देता रत्न । इंद्र-नीलको ॥ ६०० ॥
हो तू गदा चक्र किरीट-धारी
चाहूँ वही मै तव रूप देखूं ।
संवार कर तू अनंत बाहू
चतुर्भुजा रूप बन विश्व-मूर्ते ॥ ४६ ॥
(50) ३९३ विश्व-रूप-दर्शनयोग