ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअर्जुनका गंवारापन—
सुन अर्जुनकी यह बात । विश्व-रूप हुवा जो विस्मित ।
कहता ऐसा अव्यवस्थित । देखा न कोई ॥ ९ ॥
कैसी वस्तु हुई यह प्राप्त । इस लाभसे न होता मुदित ।
कैसे भयसे करता बात । सनकी बनकर ॥ ६१० ॥
होते जब हम सहज प्रसन्न । निहाल कर देते हैं तन मन ।
किसे देना यह वैभव अर्जुन । ऐसा कभी हुवा क्या ॥ ११ ॥
अपना सर्वस्व बटोर । खडा किया यह सुन्दर ।
तेरे लिये हे धनुर्धर । विश्व-रूप ॥ १२ ॥
यही जो अपर अपार । स्वरूप मेरा परात्पर ।
यहींसे सब अवतार । कृष्णादिक ॥ १३ ॥
तेरे चाहके ही कारण । पगलाई है कृपा जान ।
औ' इस गोप्यका महान् । ध्वज उभारा ॥ १४ ॥
ज्ञान-तेजसे जो निखिल । यह विश्वात्मक केवल ।
अनंत रूप है अचल । सबका आद्य ॥ १५ ॥
तेरे बिना यह अर्जुन । किसीने न देखा सुना जान ।
नहीं इसके योग्य साधन । इसीलिये ॥ १६ ॥
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै-
र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके
द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥ ४८ ॥
बोलाइसे वेद न यज्ञ द्वारा
या दान देके ना उग्र तपसे ।
तेरे बिना दर्शन है किसीको
हुवा नहीं जो जगमें अशक्य ॥ ४८ ॥
३९५ विश्व-रूप-दर्शनयोग