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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 457

इसीलिये हे देव । भिन्न नहीं तू सर्व ।
हुआ है अनुभव । सर्व सर्व तू है ॥ ३६ ॥
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं
हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
अजानता महिमानं तवेदं
मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥ ४१ ॥
किंतु तू है ऐसा महान । हमें नहीं इसका भान ।
या तुझे आप्त ही मान । किया बर्ताव ॥ ३७ ॥
हुई यह बड़ी अनुचित बात । लिया मैंने संमार्जनमें अमृत ।
कामधेनु देकर किया स्वीकृत । गर्दभ-शावक ॥ ३८ ॥
चट्टान मिला था हमको पारसका । तोड़के आधार बनाया मकानका ।
औ' काटकर बनाया सुर-तरुका । खोंडा बगियामें ॥ ३९ ॥
हाथ लगी थी चिंतामणिकी खान । किया जो गोरु हांकनेका साधन ।
वैसे तेरी समीपताके कारण । खोया महत्व ॥ ५४० ॥
यह क्या युद्ध तथा इसका मूल्य । परंतु है तू परब्रह्म अमूल्य ।
फिर भी आज दिया है तुझे कार्य । सारथी बनाके ॥ ४१ ॥
उन कौरवोंके घर । शिष्टाईमें चक्रधर ।
बेचा है तू सर्वेश्वर । सामान्य बातमें ॥ ४२ ॥
योगियोंका तू समाधिसुख । यह नहीं जानता मैं मूर्ख ।
तेरा उपरोध मैं सन्मुख । तुझसे ही करता ॥ ४३ ॥
समान माना अविनीत होके
हे कृष्ण हे यादव हे सखा जो ।
न जानके ये महिमा तिहारी
प्रमाद् या प्रेमसे ही पुकारा ॥ ४१ ॥
३८७ विश्व-रूप-दर्शनयोग