ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैसे शिष्यके प्रेममें आकर । कृष्णत्वको पूर्ण गलाकर ।
लिया जो विश्व-रूप भयंकर । बना फिर श्रीकृष्ण ॥ ४५ ॥
अजी ! शिष्यका दिया यह त्रास । सहनेवाले गुरु कहां कौन देश ।
न जाने कैसे हरिका प्रेम-विकास ! कहता है संजय ॥ ४६ ॥
विश्व-रूपका यह योग विस्तार । समा लिया अपनेमें ही सत्वर ।
तथा प्रकटा कृष्ण-रूप सुन्दर । क्षण भरमें ॥ ४७ ॥
जैसे त्वं पद होता संपूर्ण । तत् पदमें लीन सर्व रूपेण ।
वृक्ष मिटा होता बीज-कण । यह उसी भांति ॥ ४८ ॥
अथवा स्वप्न-संभ्रम जैसा । निगलता जागृत जीव-दशा ।
श्रीकृष्णने योग-विस्तार वैसा । समा लिया अपनेमें ॥ ४९ ॥
जैसे सूर्यादिका तेज बिंबमें । घनादिका जल गगनमें ।
ज्वारका जल सब समुद्रमें । वैसे नरेंद्र ॥ ५० ॥
अथवा कृष्ण रूपका थान । खोल दिया विश्व-रूप दर्शन ।
दिखाता स-कौतुक जनार्दन । प्रिय अर्जुनको ॥ ५१ ॥
मानो तब उसका आकार प्रकार । गाहक कहता है देखकर ।
यह नहीं हमारे मन अनुसार । और समेटा थान ॥ ५२ ॥
अपना पसारा फैलाकर । विश्वको किया सहज पार ।
उसे समेट हुवा साकार । बना मन-मोहन ॥ ५३ ॥
वह भाग्य अर्जुनको मिला जो किसीको नहीं मिला था—
अथवा हुवा अनंत । जैसे था बना जो सांत ।
पार्थको करने शांत । था जो अधीर ॥ ५४ ॥
जैसे देखता है स्वर्ग स्वप्नमें । जगते ही पाता बिछावनमें ।
ऐसे ही पार्थको क्षण-भरमें । हुवा अति विस्मय ॥ ५५ ॥
अथवा गुरु-कृपासे संपूर्ण । प्रपंच-ज्ञान होता है क्षीण ।
तथा होता पर-ब्रह्म स्फुरण । वैसा देखा कृष्ण-रूप ॥ ५६ ॥
सोचता था पार्थ चितमें एक । विश्व-रूपके परदेको रोक ।
वह गया बड़ा ही हुवा नेक । मेरे हितमें ॥ ५७ ॥
३९९ · विश्व रूप-दर्शनयोग