धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
३६ भेद
मूल दीप निज दीप है, हो, तुमहिँ सुनो हम पाँह ।
बैठि हंस उबारिये हो, सोहंगम के बाँह ॥ ३ ॥
जम्बू दीप के हंसा भाई, पाँजी बैठो आय । -
कहैँ कबीर धर्मदास से, तुम लावो बाँह चढ़ाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द १२ ॥
बुढ़िया ने काता सूत, जोलहवा ने बीना हो ।
दरजी ने टुक टुक कीन्ह, दरद नहिँ जाना हो ॥ १ ॥
भेड़ी चरावत बाघ, मूस रखवारा हो ।
मेंगुची१ ने बाँधा ताल, सिंह के टाटा हो ॥ २ ॥
गोड़िया२ पसारा जाल, ऊँट एक बाझा हो ।
दुलहिनि के सिर मौर, बिलारी साजा हो ॥ ३ ॥
भाँड़ा गढ़त कौँहार, मास दस लागा हो ।
छिनहिँ में जात बिलाइ, बिलंब नहिँ लागा हो ॥ ४ ॥
यह मंगल सतलोक, हंस जन गावहिँ हो ।
कहैँ कबीर धर्मदास, अमर पद पावहिँ हो ॥ ५ ॥
॥ शब्द १३ ॥
मैं ब्योपारी नाम का, हाटे चल भाई ॥ टेक ॥
जस कुम्हरा कै चाक घुमै, वैसे नर घूमै ।
इँगल पिंगल के मद्ध मेँ, जिन पवन चलाई ॥ १ ॥
बिन रसना रटना करै, नहिँ जीभ डोलाई ।
कसि के बाँधो कामदेव, तब अलख लखाई ॥ २ ॥
पूरब दिस को जाइ कै, खिरकी खोलवावो ।
तिरबेनी के घाट पर, हंसा नहवावो ॥ ३ ॥
(१) मेंढकी । (२) कहार, धीमर ।
- भेद - ३७
तीन लोक दसवाँ दिसा, जम रोके द्वारा ।
कहैँ कबीर धर्मदास से, हंसा समुझावो ॥ ४ ॥
॥ शब्द १४ ॥
सुकृत फूल गुलाब को, सब घट रह्यो समाय ।
कहो कैसे कर पाइये, गुरु बिन लख्यो न जाय ॥ १ ॥
तीन त्रिकुट के ऊपर, फूल सोहंगम फूल ।
जहाँ रह्यो आसन धर्म को, बिन अच्छर निज मूल ॥ २ ॥
चार जोजन के ऊपर, पुरुष बिदेही पूर ।
जगर मगर वो नगर है, बाजै अनहद तूर ॥ ३ ॥
अपने ढिगे हम खड़े, सतगुरु दियो बताय ।
खिड़की खोल देखाइया, राह गगन की जाय ॥ ४ ॥
कहैँ कबीर धर्मदास से, परगट दियो अनाय ।
जो हंसा चढ़ि जावही, नहिँ पुनि आवै जाय ॥ ५ ॥
॥ शब्द १५ ॥
हीरा झलकै द्वार पर, निरखै कोइ सूरा हो ॥ टेक ॥
जिमीँ आसन है संत को, बैठे हहिँ धीरा हो ।
सुन्न समाधि लगाइ के, पहुँचे वहि तीरा हो ॥ १ ॥
बाजै बिरहिन बाँसुरी, सुनि के गइ पीरा हो ।
आठ पहर नौबत झरै, अति गरुअ गँभीरा हो ॥ २ ॥
गंग जमुन के बीच मेँ, एक झिरहिर नीरा हो ।
पूरब से पच्छिम भये, अति गगन गँभीरा हो ॥ ३ ॥
यह हीरा अनमोल है, सब के घट पूरा हो ।
कहहिँ कबीर धर्मदास से, पायो पद पूरा हो ॥ ४ ॥
३८ मंगल
॥ मंगल ॥
॥ शब्द १ ॥
सतगुरु के उपदेस, फिरो धन बावरी ।
उठि चलो आपन देस, इहै भल दाव री ॥१॥
हम कहि दिया है सनेस, तुम्हारे पीव का ।
बिनु समुझे नहिँ काज, आपने जीव का ॥२॥
जुगन जुगन हम आइ, कहा समुझाइ कै ।
बिनु समुझे धनि परिहौ, काल मुख जाइ कै ॥३॥
काम क्रोध मद लोभ, छाँडु सब दुंद रे ।
का सोवै दिन रैन, बिरहिनी जागु रे ॥४॥
भव सागर की आस, छाँडु सब फंद रे ।
फिरि चलु आपन देस, यहीँ भल रंग रे ॥५॥
सुन सखि पिय कै रूप, तो बरनत ना बने ।
अजर अमर तो देस, सुगंध सागर भरे ॥६॥
फूलन सेज सँवार, पुरष बैठे जहाँ ।
ढुरै अग्र कै चँवर, हंस राजै जहाँ ॥७॥
कोटिन भानु अँजोर, रोम एक मेँ कहा ।
ऊगे चन्द्र अपार, भूमि सोभा जहाँ ॥८॥
सेत बरन वह देस, सिँहासन सेत है ।
सेत छत्र सिर धरे, अभय पद देत है ॥६॥
करो अजपा कै जाप, प्रेम उर लाइये ।
मिलो सखी सत पीव, तो मंगल गाइये ॥१०॥
जुगन जुगन अहिवात१, अखंड सो राज है ।
पिय मिले प्रेमानन्द, तो हंस समाज है ॥११॥
(१) सोहाग ।
मंगल ३९
कहैँ कबीर पुकार, सुनो धर्मदास हो ।
हंस चले सतलोक, पुरुष के पास हो ॥१२॥
॥ शब्द २ ॥
खोजहु संत सुजान सो मारग पीव को ।
समुझि सब्द देहु स्रवन, मूल जहँ जीव को ॥१॥
भव सागर अगम अथाह, लहर बिकरार है ।
कठिन है पाँचो¹ मार्ग, बिचे जम धार है ॥२॥
सिव संकर, औ ब्रह्मा, पार न पावहीँ ।
यह बहिया बलजोर, संत पार लगावहीं ॥३॥
देहिँ नाम निज डोरि, तो दुख बिसरावहीँ ।
बिन जल लहर अनूप, मोती झलकावहीं ॥४॥
मारग पंथ सिधार, तो आरति साजहीँ ।
देहिँ छत्र उँजियार, तो लोक सिधावहीं ॥५॥
बैठे अनहद महल, प्रेम गुन गावहीं ।
संग मेँ सुमति सयानी, तो नेह लगावहीँ ॥६॥
सतगुरु जग मेँ आइ, तो जीव चेताइया ।
सार सब्द लखवाइ, तो लोक पठाइया ॥७॥
का लै पान खियाउँ, तो तिनका तोरही ।
कवन सब्द की ओट, सो नरियर मोरही ॥८॥
संत अंक लिखि दीन्ह, तो पान खियावही ।
सार सब्द की ओट सो, नरियर मोरही ॥६॥
नरियर भेद अगम्म, बंस जन मोरही ।-
कहैँ कबीर धर्मदास, जिवन बँदि छोरही ॥१०॥
(१) पंच दूत ।
" -> "गावहीँ" / "पावहीँ".
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"संग नहिँ जाइया।" -> 'नहिँ' has a candrabindu over 'हि'!
Line 21:
"नहीं ठहराइया" -> look over 'हीं': yes, there is a candrabindu: "नहीँ"!
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It has a candrabindu: "नहीँ".
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"गावहीँ ।"
Line 16:
"पावहीँ ॥७॥"
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"चंदन अँगना लिपाइ के, चौक पुराइये।"
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Yes, 'अँगना'.
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"पाँच चोर बड़ जोर, कुसँगि एते घने।"
"पाँच" has candrabindu: 'पाँच'.
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मंगल ४१
इन ठगियन को पकरि, जो कोई लीजिये ।
जोर करैँ तब हाथ, छोड़ि नहिँ दीजिये ॥५॥
चार कोस लै गाँव, ठाँव एकौ नहीं ।
द्वादस नगर मँझार, जो पुरुष बिराजहीँ ॥६॥
सोभा अगम अपार, पुरुष को ध्याइये ।
द्वादस नगर सँझार, दरस सुख पाइये ॥७॥
कहैँ कबीर धर्मदास, सोई पिय चीन्हिये ।
सुरति निरति लै, गैल बहुरि नहिँ फेरिये ॥८॥
॥ शब्द ५ ॥
यह जिव रहत भुलाइ, घने दिन चार को ।
बाँह पकरि सतगुरु की, चलो भव पार को ॥१॥
तेजि१ कुमति बेकार, सुमति गहि लीजिये ।
सतगुरु सरन सम्हार, चरन चित दीजिये ॥२॥
गहि सतगुरु के चरन, चलो भव पार को ।
बहुरि न मिलना होय, पीर हरो जीव को ॥३॥
चलहु आपने देस, पुरुष बल जोर लइ ।
लाँघो अवघट घाट, कँवल छवि छाजई ॥४॥
गगन गुफा के घाट, निरंजन भेंटिये ।
चीन्हो कलसा जाइ, अगम तहँ गम किये ॥५॥
निरंकार निज रूप, सो हिरदे देखिये ।
अगम महल मेँ जाइ, पिया जहँ भेंटिये ॥६॥
पुहुप दीप के मद्ध, पुरुष का नूर है ।
कहैँ कबीर धर्मदास, सोई भरपूर है ॥७॥
(१) तजि कर ।
६
४२ मंगल
॥ शब्द ६ ॥
चलो हंसा सतलोक हमारे, छाँड़ो यह संसारा हो ।
यह संसार काल जम फंदा, कर्म का जाल पसारा हो ॥१॥
चौदह लोक बसत वा के मुख में, सब को करत अहारा हो ।
जारि भूँजि कोइला करि डारै, फिर फिरि दै औतारा हो ॥२॥
ब्रह्मा बिष्नु सिव देंह धरि आये, उन कै कौन बिचारा हो ।
सुर नर मुनि सब छल बल मारे, लै चौरासी डारा हो ॥३॥
मद्ध अकास आपु जहाँ बैठे, सेत सरूप अकारा हो ।
उन कै रूप कहाँ लगि बरनौं, संख आन उँजियारा हो ॥४॥
नौ मुकाम दसएँ अस्थाना, जहाँ बसै पुरुष पुराना हो ।
कोटि चाँद सूरज छिपि जैहै, एक रोम परगासा हो ॥५॥
सेत सरूप सब्द जहाँ फूले, हंसा करत बिहारा हो ।
जो जो सरनि गहे सतगुरु के, उन कै होत उबारा हो ॥६॥
वोहि देसवा एक अजर बस्तु है, बरसत अमृत धारा हो ।
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा, लखो पुरुष दरबारा हो ॥७॥
॥ शब्द ७ ॥
सतगुरु सरन में आइ, तो तामस त्यागिये ।
ऊँच नीच कहि जाय, तो उठि नहिं लागिये ॥१॥
उठि बोलै रारै रार, सो जानो धीँच१ है ।
जेहि घट उपजै क्रोध, अधम अरु नीच है ॥२॥
माला वा के हाथ, कतरनी काँख में ।
सूझै नाहीं आगि, दबी है राख में ॥३॥
अमृत वा के पास, रुचै नहिं राँड़ को ।
स्वान को यही सुभाव, गहै निज हाड़ को ॥४॥
(१) टँटी, झगड़ा बढ़ाने वाला ।
द्वितीय भाग: मंगल, बसंत, चांचर, हिंडोला एवं अमर आरती उपसंहार
मंगल ४३
का भे बात बनाये, परचे नहिँ पीव सोँ।
अंतर का बदफैल, फैल गै जीव सोँ ॥५॥
कहैँ कबीर पुकारि, सुनो धर्म आगरा।
बहुत हंस लै साथ, उतरो भव सागरा ॥६॥
॥ शब्द ८ ॥
पढ़ सुगना सत नाम, बैठ तन ताख में।
चार दिना का रंग, मिलै तन खाक में ॥१॥
लावहु तेल फुलेल, काया है चाम की।
अ्र्द गर्द मिलि जाय, दोहाई सत नाम की ॥२॥
नीब न मीठी होय, सींचे गुड़ घीव से।
जा कर जौन सुभाव, छुटै नहिँ जीव से ॥३॥
जहाँ सौदागर होय, तहाँ कछु भाखिये।
बिन गाहक बिन मोल, बस्तु ना खोलिये ॥४॥
चौमुख दीपक बारि, महल बिच सोइये।
नौ नारी से नेह, अकि छिन रोइये ॥५॥
चेतहु संत सुजान, तो जम से रड़ि है।
काल के हाथ गुलेल, तड़ाका मारिहै ॥६॥
धरती है मस्तूल, तंबु असमान है।
नौ लख जरत मसाल, सीढ़ी बंकनाल है ॥७॥
आगम कहैँ कबीर, सुनो धर्म आगरा।
बहुत हंस लेइ साथ, उतरो भव सागरा ॥८॥
॥ शब्द ९ ॥
चढ़ि अमवा की डारि, अकेली धन का रे खड़ी।
चले जाव मुरुख गँवार, मोरी तोहि का रे पड़ी।
४४ मंगल
की तोरी सासू दारुनिया, की नैहर दूर बसै ।
की तोरे पिय परदेस, जोहत वा की बाट खड़ी ॥२॥
ना मोरी सासू दारुनिया, न नैहर दूर बसै ।
हमरे बलम परदेस, जोहत वा की बाट खड़ी ॥३॥
पचरँग पहिरु चुनरिया, ऊपर धरो आरसी ।
सतगुरु संग सुजान, समुझै मोर पारसी ॥४॥
यह मंगल सतलोक, हंस जन गावहीँ ।
कहैं कबीर धर्मदास, प्रेम पद पावहीँ ॥५॥
॥ शब्द १० ॥
चढ़ि नौरँगिया की डार, कोइलिया बोलै हो ।
अगम महल चढ़ि चलो, जहाँ पिय से मिलो ॥१॥
मिलि चलो आपन देस, जहाँ छबि छाजई ।
`त सब्द जहाँ खिले, हंस होइ आवही ॥२॥
्य बस्तु मिलि जाय, सब्द टकसार हो ।
हुँ दिस लागी झलरिया, तो लोक असंख हो ॥३॥
ंबु दीप एक देस, पुरुष जहँ रहहि हो ।
हैं कबीर धर्मदास, बिछुरन नहिँ होइ हो ॥४॥
॥ शब्द ११ ॥
साहेब पतिया पठाये, सो हंसा बाँचे हो ।
पाती बाँचि घर जावो, पुरुष के पासे हो ॥१॥
मन रंग पालान, सुरति की काठी हो ।
अनहद सब्द सवार, अनँत कला सोभा हो ॥२॥
कामिनि करहि सिंगार, हंसा सुनु बानी हो ।
आवो पलँग चढ़ि बैठो, तो दरसन देहु हो ॥३॥
हंसा सब्द बिदेह, रूप नहिँ रेखा हो ।
कामिनि रहत लजाय, सोभा निजु देखा हो ॥४॥
धर्मराय उठि बोले, हंसा सुनि लेहु हो ।
कहँ को कियो है पयान, सो कहो समुझाइ हो ॥५॥
तब हंसा अस बोले, सुनो धर्मराय हो ।
पाये पुरुष के पान, तौ लोक के जाइब हो ॥६॥
तब धर्मराय पुनि बोले, हंसा सुनि लेहु हो ।
जाहु पुरुष के पास, सीस पगु देहु हो ॥७॥
मानसरोवर ताल, जहाँ अमी सागर हो ।
हंसा करै बिसराम, तो अग उजागर हो ॥८॥
अमर लोक एक दीप, तो सोभा सुहेल हो ।
तहँ हंसन कै बास, सुरति मिलि खेलै हो ॥६॥
अनहद धाम अचिंत, पुरुष जहँ छाजै हो ।
अमर लोक निज धाम, हंसन कै देसा हो ॥१०॥
कहैं कबीर पुकारि, सुनो धर्मदासा हो ।
वह तो अगम अगाध, पहुँचे कोइ हंसा हो ॥११॥
॥ शब्द १२ ॥
सूतल रहलौँ मैं सखियाँ, तो बिष कर आगर हो ।
सतगुरु दिहलैँ जगाइ, पायौँ सुख सागर हो ॥१॥
जब रहली जननी के ओदर१, परन सम्हारल हो ।
जब लौं तन में प्रान, न तोहि बिसराइब हो ॥२॥
एक बुंद से साहेब, मँदिल बनावल हो ।
बिना नैंव कै मंदिल, बहु कल लागल हो ॥३॥
(१) मा के पेट यानी गर्भ में ।
४६ मंगल
इहवाँ गाँव न ठाँव, नहीँ पुर पाटन हो।
नाहिन बाट बटोही, नहीँ हित आपन हो ॥४॥
सेमर है संसार, सुवा उधराइल हो।
सुंदर भक्ति अनूप, चले पछिताइल हो ॥५॥
नदी बहै अगम अपार, पार कस पाइब हो।
सतगुरु बैठे मुख मोरि, काहि गोहराइब हो ॥६॥
सत्तनाम गुन गाइब, सत ना डोलाइब हो।
कहैँ कबीर धर्मदास, अमर घर पाइब हो ॥७॥
॥ शब्द १३ ॥
धनुष बान लिये ठाढ़, जोगिनि एक माया हो।
छिनहिं में करत बिगार, तनिक नहिं दाया हो ॥१॥
फिर फिर बहै बयार, प्रेम रस डोलै हो।
चढ़ि नौरँगिया की डार, कोइलिया बोलै हो ॥२॥
पिया पिया करत पुकार, पिया नहिँ आया हो।
पिय बिनु सून मँदिलवा, बोलन लागे कागा हो ॥३॥
कागा हो तुम का रे, कियो बटवारा१ हो।
पिया मिलने की आस, बहुरि ना छूटहि हो ॥४॥
कहैँ कबीर धर्मदास, गुरू सँग चेला हो।
हिलि मिलि करो सतसंग, उतरि चलो पारा हो ॥५॥
॥ शब्द १४ ॥
सखि अनहद धाम निवास, सो देखो ये घड़ी।
तहँ पहुँचे कोइ दास, सो देखो० ॥ १ ॥
सुख कोइ एक सर हंस, सो देखो० ।
परखि गहो निज नाम, सो देखो० ॥ २ ॥
१) चारह बाट यानी बेठिकाने या इधर उधर।
मंगल ४७
जन्म जन्म दुख मिटे, सो देखो०।
लइ राखो निज धाम, सो देखो० ॥ ३ ॥
अक्षय वृक्ष के डहर समाय, सो देखो० ।
सत्त नाम परताप, सो देखो० ॥ ४ ॥
हंसा निज घर चले, सो देखो० ।
काल रहा मुरझाय, सो देखो० ॥ ५ ॥
अधर दुलीचा अमर पद, सो देखो० ।
सतगुरु दिया बिछाय, सो देखो० ॥ ६ ॥
धर्मनि मिले कबीर, सो देखो० ।
हिलि मिलि करहि कलोल, सो देखो० ॥ ७ ॥
॥ शब्द १५ ॥
गुन कर बौरी, जब लौं नैहर माहिँ हो ।
फिरि जैहौ ससुरारि, पिया के पास हो ॥ १ ॥
जब लगि राज पिया कर, तू सुख करि ले हो ।
सासु ननदिया दारुन, उत्तर जनि देहु हो ॥ २ ॥
सतगुरु डोलिया फँदावल, लगे चार कहार हो ।
आगे चलै मोर साहेब, पाछे चालनहार हो ॥ ३ ॥
जाइ उतारे वोहि देसवाँ, जहँ दिस न दुवार हो ।
मोतियन चुनि घर बने, हीरा लगे किवार हो ॥ ४ ॥
चंद्र लगन मोर अँचरा, सुरज लगन मोर देँह हो ।
हद्दे लगन मोरा साहेब, जहँ लगि फैले दृष्टि हो ॥ ५ ॥
मन मन बिहसै दुलहिनि, अमर बर पाये हो ।
साहेब कबीर कै दिहल, सुनि ले धर्मदास हो ॥ ६ ॥
हो ॥ १ ॥
Line 4: घटहि में मानसरोवर, घाट बँधावो हो ।
Line 5: घटहि में पाँच कहार, दूलह नहवावहिँ हो ॥ २ ॥
Line 6: घटहि में नेह नउनिया, तो चरन पखारहिँ हो ।
Line 7: प्रेम प्रीत के ललना, तो पलना झुलावहिँ हो ॥ ३ ॥
Line 8: घटहि में दया के दरजी, तो दरज मिलावहिँ हो ।
Line 9: पाँच तत्त के जामा, दुलह पहिरावहिँ हो ॥ ४ ॥
Line 10: घटहि में लोह लोहार, तो कँगना डावहिँ१ हो ।
Line 11: तीन गुनन के सेहरा, दुलह पहिरावहिँ हो ॥ ५ ॥
Line 12: घटहि में चंदन चौक, तो चौक पुरावहिँ हो ।
Line 13: सत्त सुकृत को कलसा, तहाँ धरावहिँ हो ॥ ६ ॥
Line 14: घटहि में मन सत माली, तो मौर ले आवहि हो ।
Line 15: घटहि में जुगति कै जौहरि, जोत पहिरावहि हो ॥ ७ ॥
Line 16: घटहि सोहंगम नारि, तो पिय को रिझावहि हो ।
Line 17: बार बार गुरु झगरि, तो अरज सुनावहि हो ॥ ८ ॥
Wait
मंगल ४९
बाम्हन बेगि पठावो मोरे बाबा,
देखि आवै वोहि देस हो।
रबि ससि तारा दिवस न रजनी,
बसै अलख अलबेल हो ॥ २ ॥
कर पगु पीठ पेट नहिँ काया,
हम से कहा न जात हो।
अस बर लिखा लिलार हमारे,
बाम्हन कहु तहँ जाइ हो ॥ ३ ॥
बंध झलरिया बेंदी झलकै,
चंद सुरज के पार हो।
मानिक दियना तहवाँ झलकै,
जगमग जोति अपार हो ॥ ४ ॥
बिना सुरत संसारहि निरखै,
बिन मुख बोलनहार हो।
स्त्रवन नैन बिनु सुनै औ देखै,
आसन अधर अधार हो ॥ ५ ॥
प्रेम प्रीत से खंभ गड़ावो,
गैबी अलँब१ बिछावो हो।
कनक कलस धरि मंगल गावो,
मोतियन झालरि लांव हो ॥ ६ ॥
दुलहिनि दुलहा ब्याहन आये,
भये दोऊ एक ठौर हो।
भया बियाह उछाह परम पद,
भये उर सत्त उचार हो ॥ ७ ॥
(१) सहारा, भरोसा।
मंगल
पाये सोहाग माँग भर सेँदुर,
नखसिख सोरहौ सिंगार हो।
फूल जड़ित रतनन से राजित१,
बेंदी झलकै लिलार हो॥८॥
सुखमनि पलँग बिछावो सखियाँ,
पद्मन धुनि झनकार हो।
अब का सोवो उठि जागो धनियाँ,
आखिर करो सम्हार हो॥६॥
बिनति करूँ मैं चरन कँवल में,
सुनो मोरे प्रान-नाथ हो।
धरमदास के सतगुरु समरथ,
तोहरे हाथ निबाह हो॥१०॥
॥शब्द १८॥
हमरा बियाह करो मोरे बाबा,
तुम सौं नाहिं निबाह हो।
जिन के नाहिं रूप औ रेखा,
उन से हमरो बियाह हो॥१॥
आवे न जाय मरै ना जीये,
सो बर खोजो जाई हो।
बूढ़ न बार तरुन नहिं चेलिक२,
वा को तिलक लगाई हो॥२॥
गगन मँदिल वह गढ़ मोरे बाबा,
अरध उरध के बीच हो।
पवन बराती ब्याहन आये,
मान करो सनमान हो॥३॥
(१) शोभित। (२) नौजवान।
तिरबेनी से नीर मँगावो,
अलख बृच्छ कै डार हो ।
सत्त सुकृत कै कलस धराबो,
पूजो पाँव हमार हो ॥ ४ ॥
तिरगुन सेँदुरा मँगावो मोरे बाबा,
पिय से माँग भराइ हो ।
सतगुरु बिप्र के चरन पखारो,
जुग जुग रहै सोहाग हो ॥ ५ ॥
सब्द सुरत से गाँठ जुरावो,
माँड़ो राखो छाइ हो ।
पाँच भँवरिया घुमावो मोरे बाबा,
गँठिया देवो निबुकाइ हो ॥ ६ ॥
चाँद सुरज दोउ कोहबर बाबा,
पाँजी¹ दसो दुवार हो ।
ऊँच दुवारी निहारो सखियाँ,
निहुरि कै घर को जाहु हो ॥ ७ ॥
ज्ञान कै डोलिया फँदावो मोरे बाबा,
करि देवो बिदा हमार हो ।
धरमदास से छूटल सब सागर,
सब सौँ भेंटि अकवार हो ॥ ८ ॥
॥ शब्द १९ ॥
चलो सखि देखन चलिये, दुलह कबीर हैं ।
उन सौँ जुरल सनेह, जठर सौँ राखिहैं ॥ टेक ॥
(१) रास्ता ।
५२ मंगल
पाँच तत्त को बासा, त्यागो बेगि कै।
छाँड़ो मिलि मिलि नेह, पुरुष गम राखि कै ॥ १ ॥
लाँघो औघट घाट, पंथ निज ताकि कै।
गहो सुकृत निज डोर, अगम गम राखि कै ॥ २ ॥
चार कोस आकास, तहाँ चढ़ि देखिये।
आगे मारग झीनि, तो सुरत बिबेकिये ॥ ३ ॥
मुकुट एक अनूप, छत्र सिर साजिहै।
दुरत अग्र को चौँर, सब्द धुनि गाजिहै ॥ ४ ॥
सेत धुजा फहराय, अँवर तहँ गूँजहीँ।
नितहिँ उठै झनकार, गगन घनघोरहीँ ॥ ५ ॥
कहैँ कबीर धर्मदास सोँ, मूल उचारिये।
अगम गम्य बताइ कै, हंस उबारिये ॥ ६ ॥
॥ शब्द २० ॥
[ प्रश्नोत्तर ]
सत्त सुकृत सतनाम, सो आदि मनाइये।
लीजै साहेब को नाम, प्रेम पद पाइये ॥ १ ॥
सुरति नहीँ बिलगाइ, तो मुक्ती होइ हो।
चलो हंसा वहि देस, बसै जहँ पीव हो ॥ २ ॥
चाँद सुरज के पूरब१, हंसा पच्छिम हो।
वोहि देसवाँ मत जाव, बसै जहँ पंछी२ हो ॥ ३ ॥
चाँद सुरज के दक्खिन, हंसा उत्तर हो।
खोलो मुक्ति दुवार, उतरि चलो पार हो ॥ ४ ॥
तीन सै साठ कड़िहार३, काल जम जार हो।
उन के वार जनि भूलो, भवसागर धार हो ॥ ५ ॥
(१) ऊपर । (२) शरीर-बद्ध जीव । (३) मल्लाह ।
५३
मंगल
बिहसैँ सब सखियाँ, तो रानी१ मनाइहै।
रानी देहु बकसीस, हंसा गहि आनौं हो ॥ ६ ॥
[रानी]–जो तुम सखियाँ सयानी, हंसा गहि आनो हो।
सात दीप नौ खंड की, रानी कहावौँ हो ॥ ७ ॥
[सखी]–हो हंसा तुम ठाढ़, कहाँ को जाइब हो।
सात दीप नौ खंड की, रानी छाँड़ि हो ॥ ८ ॥
[हंस]–सात दीप नौ खंड बसै, बकबादिन हो।
ठाकुर२ मति के हीन, कर्म बस बाँधा हो ॥ ९ ॥
स्याम रंग पहिराव, कुसुम रंग सारी हो।
मानो मेघ घन गरजि, उमँगि दल बादल हो ॥१०॥
चलि जाहु नारि गँवारि, तुँ जगत पियारी हो।
चित्रगुप्त दुर्ग३ दानी की, रहो दुलारी हो ॥११॥
[सखी]-हो हंसा तुम ठाढ़, कहाँ के जाइब हो।
सन्मुख होइ कै देखो, तो करहुँ जवाब हो ॥१२॥
स्याम रंग पहिराव, कुसुम रंग चुनरी हो।
कठिन कला छबि झलकै, तौ काल दुलारी हो ॥१३॥
मैं तोहि पूछौँ हंसा, कहाँ तोरे बाप हो।
हम से कहो समझाय, कहा करे पाप हो ॥१४॥
[हंस]--सत साहेब जो पिता, तो सतगुरु माता हो।
चित्रगुप्त दुर्गदानी, सो येहि बिधि जाता हो ॥१५॥
सब सखि माथ नवायो, तो हंसा चलि भे हो।
आगे मिले धर्मराय, काल सिर नाये हो ॥१६॥
(१) रानी से मतलब माया और सखियों से माया की शक्तियाँ।
(२) काल। (३) दुर्ग=कठिन। दुर्ग-दानी नाम काल का है।
५४ बधावा
अचिंत पुरुष को मंगल, हंसा गावै हो।
कहैं कबीर धरमदास, अमर पद पावै हो॥१७॥
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॥ बधावा ॥
॥ शब्द १ ॥
पधारो साहेब पाहुना, मोरे मन में बहुत आनंद ॥ टेक ॥
सखि का से पोताओँ अँगना, का से पोताओँ चौक ॥ १ ॥
चंदन पोताओँ अँगना, गजमोतियन पुराओँ चौक ॥ २ ॥
सखि आँगन बोओँ लायची, मोरे फलसी नागर बेल ।
पधारो साहेब पाहुना ॥ ३ ॥
ऊँची चढ़ कर जोवती, साहेब का रथ केती दूर ॥ ४ ॥
ऊँची लहर समुद्र की, तल बहै जमुना का नीर ॥ ५ ॥
भलि भई साहेब आइया, बाजत अनहद घोर ॥ ६ ॥
कनक सिंहासन बैठका, ओढ़न अंबर चीर ॥ ७ ॥
सखि भवसागर हेरिया, लह्यो सुख सागर तीर ॥ ८ ॥
धरमदास की बीनती, मोहिँ मिलियो साहेब कबीर ॥ ६ ॥
॥ शब्द २ ॥
बधावा संत सजाऊँ हो ।
जा बिधि सतगुरु मेहर करें, सोई बिधि लाऊँ हो ॥ टेक ॥
रतन पटोरा¹ डारि पाँवड़ा², सन्मुख जाऊँ हो ।
सब सखियाँ मिलि बाँटत बधाई, मंगल गाऊँ हो ॥ १ ॥
घसि घसि चंदन अँगना लिपाऊँ, चौक पुराऊँ हो ।
मेवा नरियर पान मिठाई, संजम सबै मँगाऊँ हो ॥ २ ॥
(१) कपडा । (२) क़ालीन या बढ़िया कपड़ा जो बड़े आदमियों के चलने के
लिये बिछाया जाता है ।
बधावा ५५
खीर खाँड़ घृत अमृत भोजन, संत जिमाऊँ हो ।
चरन धोइ चरनामृत लेऊँ, सीस नवाऊँ हो ॥ ३ ॥
अब मोरे साहेब तखत बिराजैँ, आरति लाऊँ हो ।
पान पर्वान दया से पाऊँ, सब मिलि गाऊँ हो ॥ ४ ॥
अब मोरे सतगुरु पलँग पधारैँ, चरन दबाऊँ हो ।
धरमदास याही बिधि करि, सतलोक सिधाऊँ हो ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३ ॥
साहेब सतगुरु घर आया हो ।
अँगना मोर जगमग भया, सुख सम्पति लाया हो ॥ १ ॥
आधि¹ गई मेरी हे सखी, आज सज्जन पाया हो ।
धन्य बिधाता लेख लिखा, निज भाग जगाया हो ॥ २ ॥
कोमल बचन अँग दया घनेरी, कल्प वृच्छ की छाया हो ।
धन जननी अस संत जिन जाया, अनँद बधाया हो ॥ ३ ॥
जप तप नेम धर्म बहु कीन्हा, रसना नामहिँ गाया हो ।
धरमदास सतगुरु सतसँग से, छिन मेँ परम पद पाया हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
सतगुरु आये द्वार, मन मेँ बजत बधाइया ।
सतगुरु साहेब दीन-दयाला, द्वारे मोरे आइया ।
जुगन जुगन के करम मिटत भे, सतगुरु दरस दिखाइया ॥ १ ॥
प्रेम सुरत की करी रसोई, ब्यंजन² आसन लाइया ।
जेँवन बैठे सतगुरु साहेब, अधर से चौँर डोलाइया ॥ २ ॥
दया भाव के पलँग बिछाये, प्रेम दुलीचा लाइया ।
ता पर सोये सतगुरु साहेब, सुरति कै तेल लगाइया ॥ ३ ॥
(१) मानसी दुःख; चिन्ता । (२) भोजन ।