धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमंगल ४१
इन ठगियन को पकरि, जो कोई लीजिये ।
जोर करैँ तब हाथ, छोड़ि नहिँ दीजिये ॥५॥
चार कोस लै गाँव, ठाँव एकौ नहीं ।
द्वादस नगर मँझार, जो पुरुष बिराजहीँ ॥६॥
सोभा अगम अपार, पुरुष को ध्याइये ।
द्वादस नगर सँझार, दरस सुख पाइये ॥७॥
कहैँ कबीर धर्मदास, सोई पिय चीन्हिये ।
सुरति निरति लै, गैल बहुरि नहिँ फेरिये ॥८॥
॥ शब्द ५ ॥
यह जिव रहत भुलाइ, घने दिन चार को ।
बाँह पकरि सतगुरु की, चलो भव पार को ॥१॥
तेजि१ कुमति बेकार, सुमति गहि लीजिये ।
सतगुरु सरन सम्हार, चरन चित दीजिये ॥२॥
गहि सतगुरु के चरन, चलो भव पार को ।
बहुरि न मिलना होय, पीर हरो जीव को ॥३॥
चलहु आपने देस, पुरुष बल जोर लइ ।
लाँघो अवघट घाट, कँवल छवि छाजई ॥४॥
गगन गुफा के घाट, निरंजन भेंटिये ।
चीन्हो कलसा जाइ, अगम तहँ गम किये ॥५॥
निरंकार निज रूप, सो हिरदे देखिये ।
अगम महल मेँ जाइ, पिया जहँ भेंटिये ॥६॥
पुहुप दीप के मद्ध, पुरुष का नूर है ।
कहैँ कबीर धर्मदास, सोई भरपूर है ॥७॥
(१) तजि कर ।
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