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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

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पृष्ठ 50
  • भेद - ३७
    तीन लोक दसवाँ दिसा, जम रोके द्वारा ।
    कहैँ कबीर धर्मदास से, हंसा समुझावो ॥ ४ ॥
    ॥ शब्द १४ ॥
    सुकृत फूल गुलाब को, सब घट रह्यो समाय ।
    कहो कैसे कर पाइये, गुरु बिन लख्यो न जाय ॥ १ ॥
    तीन त्रिकुट के ऊपर, फूल सोहंगम फूल ।
    जहाँ रह्यो आसन धर्म को, बिन अच्छर निज मूल ॥ २ ॥
    चार जोजन के ऊपर, पुरुष बिदेही पूर ।
    जगर मगर वो नगर है, बाजै अनहद तूर ॥ ३ ॥
    अपने ढिगे हम खड़े, सतगुरु दियो बताय ।
    खिड़की खोल देखाइया, राह गगन की जाय ॥ ४ ॥
    कहैँ कबीर धर्मदास से, परगट दियो अनाय ।
    जो हंसा चढ़ि जावही, नहिँ पुनि आवै जाय ॥ ५ ॥
    ॥ शब्द १५ ॥
    हीरा झलकै द्वार पर, निरखै कोइ सूरा हो ॥ टेक ॥
    जिमीँ आसन है संत को, बैठे हहिँ धीरा हो ।
    सुन्न समाधि लगाइ के, पहुँचे वहि तीरा हो ॥ १ ॥
    बाजै बिरहिन बाँसुरी, सुनि के गइ पीरा हो ।
    आठ पहर नौबत झरै, अति गरुअ गँभीरा हो ॥ २ ॥
    गंग जमुन के बीच मेँ, एक झिरहिर नीरा हो ।
    पूरब से पच्छिम भये, अति गगन गँभीरा हो ॥ ३ ॥
    यह हीरा अनमोल है, सब के घट पूरा हो ।
    कहहिँ कबीर धर्मदास से, पायो पद पूरा हो ॥ ४ ॥