धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ मंगल
॥ मंगल ॥
॥ शब्द १ ॥
सतगुरु के उपदेस, फिरो धन बावरी ।
उठि चलो आपन देस, इहै भल दाव री ॥१॥
हम कहि दिया है सनेस, तुम्हारे पीव का ।
बिनु समुझे नहिँ काज, आपने जीव का ॥२॥
जुगन जुगन हम आइ, कहा समुझाइ कै ।
बिनु समुझे धनि परिहौ, काल मुख जाइ कै ॥३॥
काम क्रोध मद लोभ, छाँडु सब दुंद रे ।
का सोवै दिन रैन, बिरहिनी जागु रे ॥४॥
भव सागर की आस, छाँडु सब फंद रे ।
फिरि चलु आपन देस, यहीँ भल रंग रे ॥५॥
सुन सखि पिय कै रूप, तो बरनत ना बने ।
अजर अमर तो देस, सुगंध सागर भरे ॥६॥
फूलन सेज सँवार, पुरष बैठे जहाँ ।
ढुरै अग्र कै चँवर, हंस राजै जहाँ ॥७॥
कोटिन भानु अँजोर, रोम एक मेँ कहा ।
ऊगे चन्द्र अपार, भूमि सोभा जहाँ ॥८॥
सेत बरन वह देस, सिँहासन सेत है ।
सेत छत्र सिर धरे, अभय पद देत है ॥६॥
करो अजपा कै जाप, प्रेम उर लाइये ।
मिलो सखी सत पीव, तो मंगल गाइये ॥१०॥
जुगन जुगन अहिवात१, अखंड सो राज है ।
पिय मिले प्रेमानन्द, तो हंस समाज है ॥११॥
(१) सोहाग ।