सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 98 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 55

४२ मंगल
॥ शब्द ६ ॥
चलो हंसा सतलोक हमारे, छाँड़ो यह संसारा हो ।
यह संसार काल जम फंदा, कर्म का जाल पसारा हो ॥१॥
चौदह लोक बसत वा के मुख में, सब को करत अहारा हो ।
जारि भूँजि कोइला करि डारै, फिर फिरि दै औतारा हो ॥२॥
ब्रह्मा बिष्नु सिव देंह धरि आये, उन कै कौन बिचारा हो ।
सुर नर मुनि सब छल बल मारे, लै चौरासी डारा हो ॥३॥
मद्ध अकास आपु जहाँ बैठे, सेत सरूप अकारा हो ।
उन कै रूप कहाँ लगि बरनौं, संख आन उँजियारा हो ॥४॥
नौ मुकाम दसएँ अस्थाना, जहाँ बसै पुरुष पुराना हो ।
कोटि चाँद सूरज छिपि जैहै, एक रोम परगासा हो ॥५॥
सेत सरूप सब्द जहाँ फूले, हंसा करत बिहारा हो ।
जो जो सरनि गहे सतगुरु के, उन कै होत उबारा हो ॥६॥
वोहि देसवा एक अजर बस्तु है, बरसत अमृत धारा हो ।
कहैं कबीर सुनो धर्मदासा, लखो पुरुष दरबारा हो ॥७॥
॥ शब्द ७ ॥
सतगुरु सरन में आइ, तो तामस त्यागिये ।
ऊँच नीच कहि जाय, तो उठि नहिं लागिये ॥१॥
उठि बोलै रारै रार, सो जानो धीँच१ है ।
जेहि घट उपजै क्रोध, अधम अरु नीच है ॥२॥
माला वा के हाथ, कतरनी काँख में ।
सूझै नाहीं आगि, दबी है राख में ॥३॥
अमृत वा के पास, रुचै नहिं राँड़ को ।
स्वान को यही सुभाव, गहै निज हाड़ को ॥४॥
(१) टँटी, झगड़ा बढ़ाने वाला ।