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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 98 में से

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पृष्ठ 52

मंगल ३९
कहैँ कबीर पुकार, सुनो धर्मदास हो ।
हंस चले सतलोक, पुरुष के पास हो ॥१२॥
॥ शब्द २ ॥
खोजहु संत सुजान सो मारग पीव को ।
समुझि सब्द देहु स्रवन, मूल जहँ जीव को ॥१॥
भव सागर अगम अथाह, लहर बिकरार है ।
कठिन है पाँचो¹ मार्ग, बिचे जम धार है ॥२॥
सिव संकर, औ ब्रह्मा, पार न पावहीँ ।
यह बहिया बलजोर, संत पार लगावहीं ॥३॥
देहिँ नाम निज डोरि, तो दुख बिसरावहीँ ।
बिन जल लहर अनूप, मोती झलकावहीं ॥४॥
मारग पंथ सिधार, तो आरति साजहीँ ।
देहिँ छत्र उँजियार, तो लोक सिधावहीं ॥५॥
बैठे अनहद महल, प्रेम गुन गावहीं ।
संग मेँ सुमति सयानी, तो नेह लगावहीँ ॥६॥
सतगुरु जग मेँ आइ, तो जीव चेताइया ।
सार सब्द लखवाइ, तो लोक पठाइया ॥७॥
का लै पान खियाउँ, तो तिनका तोरही ।
कवन सब्द की ओट, सो नरियर मोरही ॥८॥
संत अंक लिखि दीन्ह, तो पान खियावही ।
सार सब्द की ओट सो, नरियर मोरही ॥६॥
नरियर भेद अगम्म, बंस जन मोरही ।-
कहैँ कबीर धर्मदास, जिवन बँदि छोरही ॥१०॥
(१) पंच दूत ।