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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

प्रारंभिक जीवन-चरित्र एवं कबीर साहिब मिलन प्रसंग

संतबानी

संतबानी पुस्तक-माला के छापने का अभिप्राय जगत्-प्रसिद्ध महात्माओं की
बानी और उपदेश को जिन का लोप होता जाता है बचा लेने का है। जितनी बानियाँ
हमने छापी हैं उनमें से विशेष तो पहिले छपी नही थीं और जो छपी थीं सो
प्राय ऐसे छिन्न भिन्न और बेजोड़ रूप में या क्षेपक और त्रुटि से भरी हुई कि उन
से पूरा लाभ नहीं उठ सकता था।
हमने देश देशान्तर से बड़े परिश्रम और व्यय के साथ हस्तलिखित दुर्लभ
ग्रंथ या फुटकर शब्द जहाँ तक मिल सके असल या नकल कराके मँगवाये।
भरसक तो पूरे ग्रंथ छापे गये हैं, और फुटकर शब्दों की हालत में सर्व-साधारण
के उपकारक पद चुन लिये हैं, प्राय कोई पुस्तक बिना दो लिपियों का मुकाबला
किये और ठीक रीति से शोधे नहीं छापी गई है और कठिन और अनूठे शब्दों के
अर्थ और संकेत फुट-नोट में दे दिये हैं। जिन महात्मा की बानी है उनका
जीवन-चरित्र भी साथ ही छापा गया है और जिन भक्तों और महापुरुषों के नाम
किसी बानी में आये हैं उनके वृत्तांत और कौतुक संक्षेप से फुट-नोट में लिख
दिये गये हैं।
दो अंतिम पुस्तकें इस पुस्तक माला की अर्थात् “संतबानी संग्रह” भाग १
[ साखी ] और भाग २ [ शब्द ] छप चुकीं जिन का नमूना देखकर महामहो-
पाध्याय श्री पंडित सुधाकर द्विवेदी वैकुंठ-बासी ने गद्गद् होकर कहा था—
“न भूतो न भविष्यति”।
एक अनूठी और अद्वितीय पुस्तक महात्माओं और बुद्धिमानों के वचनों की
“लोक परलोक हितकारी” नाम की गद्य में सन् १९१६ में छपी है जिसके विषय
में श्रीमान् महाराज काशी नरेश ने लिखा है—“वह उपकारी शिक्षाओं का अचरजी
संग्रह है जो सोने के तोल सस्ता है”।
पाठक महाशयों की सेवा में प्रार्थना है कि इस पुस्तक-माला के जो दोष उन
की दृष्टि में आवें उन्हें हमको कृपा करके लिख भेजें जिससे वह दूसरे छापे में
दूर कर दिये जावें ।
हिन्दी में और भी अनूठी पुस्तक छपी हैं जिनमें प्रेम कहानियों के द्वारा
शिक्षा बतलाई गई हैं—उनके नाम और दाम इस पुस्तक के अन्त वाले पृष्ठों
में देखिये ।
मैनेजर, वेलवेडियर छापाखाना,
इलाहाबाद ।

सूचीपत्र
पृष्ठ
जीवन-चरित्र ... ... ... .... (१-८)
शब्द
अ
अचरज ख्याल हमारे देसवा ... ... ... ... ३५
अचवन कीजे गुरु ... ... ... ... ३०
अब गुरु मिले सनेही ... ... ... ... २
अब मोहिँ दर्सन देहु ... ... ... ... २७
अमरलोक से हम ... ... ... ... ७५
आज आनंद भये मेरे घर ... ... ... ... ५६
आज घड़ी आनन्द की ... ... ... ... २
आज घर आये साहब मोर ... ... ... ... ५६
आज मेरे सतगुरु आये ... ... ... ... १३
आठ चाम कै गुरिया रे ... ... ... ... ३३
आये दीन-दयाल ... ... ... ... ६७
आरत गुरु कबीर की ... ... ... ... १६
आरत बंदीछोर ... ... ... ... १८
आरत मोहिँ तुम्हारी ... ... ... ... १७
ऐ
ऐसी आरत कहो ... ... ... ... १७
ऐसी आरत दियो ... ... ... ... १७
क
कब तुम मिलिहौ ... ... ... ... २२
कहुवाँ से जिव आयल ... ... ... ... ६३
कहो केते दिन जियचौ हो ... ... ... ... ८
कहाँ बुझाय दरद ... ... ... ... १३
का भरमत भटकत फिरो ... ... ... ... १०
केहि विधि प्रीतम पाइये ... ... ... ... ३१
कैसे आरत करौं ... ... ... ... १६
ख
खेलत रहलौँ अँगनवाँ सखी ... ... ... ... ६४

२ सूचीपत्र
शब्द पृष्ठ
खेलत रहलों बाबा चौबरिया ... ... ... ... ३४
खोजहु संत सुजान ... ... ... ... ३९
ग
गगन पिय बसी फेरि ... ... ... ... ३२
गाँठ परी पिया बोले न ... ... ... ७५
गुन कर बौरी .. ... ... ... ४७
गुरु पद अहै सबन से भारी .. ... ... ... ३
गुरु पैयाँ लागौँ ... .. ... ... १९
गुरु मिले अगम के बासी ... ... .. ... १
गुरु मोहिँ सजीवन मूर दई ... .. ... ... १५
गुरू बिन कौन हरै ... ... ... ... ६७
गुरू मोहिँ खूब निहाल कियो ... ... .. .. १
घ
घड़ा एक नीर का फूटा ... .. . . ८
च
चढ़ि अमवा की डारि .. ... .. - ४३
चढ़ि नौरँगिया की डारि ... .. ४४
चरन छाँड़ि प्रभु जावैँ कहाँ ... ... ... २३
चलो सखि देखन चलिये ... ... . .. ५१
चलो सोहगम नारि .. ... ... ... ४०
चलो हसा सतलोक ... . . ... ४२
चाकर हैं निज नाम का ... ... ... ६
चेतो हसा चेतो कोई .. ... .. ... ३१
ज
जग ये दोउ खेलत होरी . . ... ६१
जमुनिया की डारि मोरी .. . ... ... २९
जा के दुवरवा जमिरिया ... ... ... ... ६२
जागु घहुरिया .. ... ... ... ७०
जेहि सुमिर मन का भये ... .. ... ... ७१

सूचीपत्र ३
शब्द पृष्ठ
झ
झरि लागै महलिया ... ... ... ... ३३
त
तुम सतगुरु हम सेवक ... ... ... ... २९
तुम संतो खेलु सम्हारि ... ... ... ... ६१
थ
थोरे दिन की ज़िंदगी ... ... ... ... ७
द
दीना-नाथ दयाल ... ... ... ... २३
देवो न देवो प्रभु जन अपने को ... ... ... ... ६५
ध
धन हौ धन साहेब ... ... ... ... ४
धनुष वान लिये ... ... ... ... ४६
धरमदास आरती साजा ... ... ... ... १८
धर्मनि वा देस हमारो ... ... ... ... ३०
न
नाम रटन रट लागि रहै ... ... ... ... ६
नाम रस ऐसा है भाई ... ... ... ... ५
नैन दरस बिन मरत ... ... ... ... १२
नैनन आगे ख्याल ... ... ... ... ६८
प
पढ़ सुगना सतनाम ... ... ... ... ४३
पधारो साहेब पाहुना ... ... ... ... ५४
प्यारे कंत से मिलि ... ... ... ... ५९
पिया परदेसिया ... ... ... ... ७४
पिया बिन मोहिँ नीँद न आवै ... ... ... ... १५
पिया बिना मोहिँ नीक ... ... ... ... १५
ब
बधावा संत सजाऊँ हो ... ... ... ... ५४

सूचीपत्रे
शब्द पृष्ठ
साहेब लेइ चलो . .. .. . - २८
साहेब साहेबी तन हेरो . २०
साहेब सतगुरु घर आया हो . . . ५५
साहेब हमरे सहज . .. .. . ७२
सुकृत फूल गुलाब को .. . .. . ३७
सूचित होइ सब्द बिचारो हो ... . . . ९
सुरत निरत दोउ . ११
सुरत पर सतगुर .. . २१
सूतल रहलौं मैं सखियाँ . ... ... . ४५
सभा आरति नाम तुम्हारा .. .. ... . १८
साँई मैं असल गुलाम ... .. . २४
साँझ भई, पिया बिन ... .. . .. १६
ह
हमरा बियाह करो ... .. . ... ५०
हमरी उमिरिया ... .. ... ... ६०
हमरे का करे हाँसी लोग .. ... ... ... ७१
हम सत्त नाम के बैपारी ... ... ... ... ७
हमै एक अचरज जानि पड़े ... ... ... . ३३
हीरा झलकै द्वार पर .. ... ... ३७
होरी खेलो सयानी ... . ... ... ६०
हस उवारन सतगुरु ... ... .. ... ३
हस उवारि अपन करि ... ... ... .. १८
ज्ञ
ज्ञान की चुनरी धुमल . . ... . ६८
बारह मासा .... .... .... .... ५७
पहाड़ा .... .... .... .... ७६
नाम लीला .... .... .... .... ७७
मुक्ति लीला .... .... .... .... ८१

धर्मदासजी का जीवन-चरित्र
धनी धर्मदासजी जाति के कसौंधन बनिये बाघोगढ़ नगर के भारी महाजन
थे। उनके जीवन और मृत्यु के समय का उनके मत वालों या किसी ग्रंथ से ठीक
ठीक पता नहीं चलता परन्तु इतना पक्का है कि कबीर साहेब से इनको अवस्था
कम थी और उनके पन्द्रह बीस वरस पीछे चोला छोड़ा। इस हिसाब से उनके जन्म
का समय विक्रमी संवत् १४७५ और १५०० के दर्मियान और परमधाम सिधारने
का समय संवत् १६०० के क़रीब समझना चाहिये क्योंकि उन्होंने पूरी अवस्था को
पहुँच कर शरीर त्याग किया ।
धर्मदासजी बाल अवस्था ही से बड़े धर्मात्मा और भगवत भक्त थे
परन्तु आदि में पुराने कर्म धर्म और मूर्त्ति पूजन के बँधुए थे। सैकड़ों
पंडितों और पुजारियों और साधुवों की उनके यहाँ सदा भीड़ भाड़ लगी
रहती थी और अपना मुख्य समय ठाकुर की मूरत और शालग्राम की पूजन
और ब्राह्मणों और साधुवों के खिलाने पिलाने और आदर सत्कार और कथा
कीर्त्तन में खर्च करते थे और दूर दूर के तीर्थों में दर्शन और यात्रा कर
आये थे ।
जब धर्मदास जी के चेताने का समय आया तब सतगुरु कबीर साहेब
पहिले उनसे मथुरा में मिले और रास्ते में चरचा मूर्त्ति पूजन और तीर्थ व्रत
के खंडन और सत मत के मंडन की की। कुछ दिन पीछे धर्मदास जी काशी
यात्रा को आये तब कबीर साहेब के फिर दर्शन मिले और जो कुछ संशय भर्म
धर्मदास जी के मन में बाक़ी रह गये थे उनको कबीर साहेब ने पूरी भाँति
मिटा दिया और इसके पीछे संत मत का उपदेश देकर दया दृष्टि से उनके
घट के पट खोल दिये। “अमर सुख निधान” ग्रन्थ में कबीर साहेब और धर्मदासजी
की गोष्ठी विस्तार के साथ लिखी है—उसकी थोड़ी सी कड़ियाँ जिनमें
धर्मदासजी के कबीर साहेब का दर्शन पाने और फिर काशी में शरण लेने का वर्णन
है नीचे लिखे जाते हैं।

२ जीवन-चरित्र
॥ रमैनी ॥
(जिन्द)
चौपाई—कहैं कबीर मैं काया सोधा। जो जस बूझि ताहि तस बोधा॥
अपने घट में कीन्ह बिचारा। देखौं धरमदास दरबारा॥
धरमदास बधो के बानी१। प्रेम प्रीति भक्ती मैं जानी॥
सालिग्राम की सेवा करई। दया धरम बहुतै चित धरई॥
साधु भक्त के चरन पखारै। भोजन कराइ अस्तुति अनुसारै॥
भागवत गीता बहुत कहाई। प्रेम भक्ति रस पियै अघाई॥
मनमा बाचा भजै गोपाला। तिलक देइ तुलसी की माला॥
द्वारिका जगन्नाथ होइ आये। गया बनारस गंगा नहाये॥
बोलत बचन सत्त सुभ बानी। बृथा कहै कबहुँ ना जानी॥
दोहा—राम कृष्न को सूमिरे, तीरथ व्रत दृढ़ चेट२।
मथुरा परसत जब गये, भे कबीर सों भेट॥
चौपाई—जिंद३ रूप जब धरे सरीरा। धरमदास मिलि गये कबीरा॥
उदित बदन मुदित सुख चैना। हँस मुसुकाय कहे मुख बैना॥
धरमदास तुम हौ बड़ ज्ञानी। परम भक्त भक्ती मैं जानी॥
तुम सा भक्त न देखौं आना। धर्म तुम्हारा कवन स्थाना॥
कवन दिसा से तुम चलि आये। जैहौ कहाँ कहा मन लाये॥
काकी भक्ति करौ चित लाई। सो कित बसै कौन से ठाँई॥
पूछत मन में दुख जनि मानो। करता आदि पुरुष पहिचानो॥
का भे माला तिलक के दीन्हे। का भे तीरथ बरत के कीन्हे॥
का भे सुनत भागवत गीता। चिन्ता मिटी न मन को जीता॥
दोहा—जेहि कर्ता से ऊपजे, सो वसे कौने देस।
ताहि चीन्ह परिचय करो, छोड़ सकल भ्रम भेस॥
(धर्मदास जी)
चौपाई—सुनि धर्मदास अचभो भयऊ। ऐसो वचन काहु ना कहेऊ॥
जिंद रूप इन ही कै देखा। कहत बचन सुख बहुत विशेका॥
सुनो जिंद मोरे दृढ़ ज्ञाना। वास मोर बधो अस्थाना॥
बरन कसौंधन जाति को बानी। भजौं राम कृष्न सारँग पानी॥
पारब्रह्म सेवैं चित लाई। सीताराम जपौं सुखदाई॥
सेवैं सालिग्राम के पाऊँ। अर्द्ध-मुखी४ सभी लव लाऊँ॥
(१) बधोगढ़ निवासी बनिये। (२) चेष्टा। (३) जिन। (४) सिर झुका कर।

सकल भक्त के रहौं अधीना। गुरू सेवा जिन दिच्छा लीन्हा॥
विरथा बचन सुनौं ना कहऊँ। प्रेम भक्ति में निस दिन रहऊँ ॥
दोहा—मोरे संका कछु नहीं, सेवो श्रीरघुनाथ।
(जिन) ध्रू प्रहलाद उवारिया, सो हरि हमरे साथ ॥
(जिंद)
मैं हौं जिंद सुनु बचन हमारा। तुम जनि होहु काल कै चारा ॥
राम नाम सब दुनी पुकारे। राम अगिन जो काठै जारे ॥
काहे न सुरति करौ घट माहीं। चीन्ह चीन्ह बूडौ भव माहीं ॥
जिन्हें कहत हौ नंद के लाला। सो तौ भये सबन के काला ॥
छल बल करि वे सब छलि डारे। पांडव जाइ हिंवारे गारे ॥
पांडव सम को भक्त कहावा। तिनहुँ को काल वली भरमावा ॥
दसरथ सुत कहिये श्रीरामा। तिनहूँ चीन्हौ काल अकामा ॥
करता राम कस भे मति-हीना। कपट मृगा उनहूँ नहिं चीन्हा ॥
दोहा—दोउ करता विरतत हैं, कीन्हे जम के कास ।
जीव अनेक प्रलय किये, ऐसे कृष्न अरु राम ॥
चौपाई—धर्म्मदास है नाम तुम्हारा। काहे न चीन्हौ वचन हमारा ॥
ज्ञान दृष्टि से चीन्हौ वानी। पाखँड पाहन पाखँड पानी ॥
करता पाखंड कवहूँ न होई। यह संसय सब दुनी विगोई ॥
सालिग्राम है बोलनहारा। देह सरूप तन साजि हमारा ॥
धर्म्मदास सुनि चीन्हेउ ज्ञाना। हित के बचन सुनत मन माना ॥
कोइ करता कहिये भगवाना। नाम मोर इन कैसे जाना ॥
इन कर बचन ज्ञान औगाहा१। जिंद भेष धारे कोउ आहा ॥
थापै सालिग्राम न सेवा। तीरथ बरत कौ मेटै भेवा ॥
राम कृष्न को मेट बताना। अह्रै जिंद को कैसो ज्ञाना ॥
दोहा—धर्म्मदास मस्टी२ रहे, बहुत खोज नहिं कीन्ह।
सीधा३ लै डेरे गये, जिंद उत्तर४ नहि दीन्ह ॥
चौपाई—इतना गुष्ट बजार में कीन्हा। आप दुकान में डेरा लीन्हा ॥
धर्म्मदास पहुँच निज डेरा। मन महँ सोच कीन्ह बहुतेरा ॥
बारह वरस तीर्थ हम कीन्हा। द्वारिका जाइ छाप हम लीन्हा ॥
श्रीनाथ परसे चित लाई। राम नाथ दक्खिन होइ आई ॥
दक्खिन परस गोदावरि गयेऊ। मेला भरो दरसन तहँ कियेऊ ॥
(१) गहिरा। (२) मौन, चुप। (३) भोजन की सामग्री। (४) जवाब।

४ जीवन-चरित्र
परसि सिवाला औ हरिद्वारा। नीमषार मिस्रु पग धारा॥
बद्रीनाथ दुवारे गयेऊ। श्रीबिंद्रावन मथुरा आयेऊ॥
दोहा—मकर त्रिवेनी परसेहू, औ कासी अस्थान।
औरौ परसे जगन्नाथ, गंगासागर किये अस्नान॥
चौपाई—इतने तीर्थ क्षेत्र हम धाये। यह दुसरे हम मथुरा आये॥
राम नाम निज प्रान अधारा। सो यह जिंद मेटि सब डारा॥
कीजे कहा जिंद को भाई। जाति मलेच्छ कथै चतुराई॥
धरमदास जब नफर१ बुलावा। घर लिपाय व्योनार चढ़ावा॥
चौका बैठि कीन्ह अस्नाना। छानिछानि जल अदहन दीन्हा॥
अति पवित्र से करै रसोई। सालिगराम कै भोजन होई॥
लकड़ी चिउँटी उठीं अपारा। कोटिन जीव भये जरि छारा॥
दोहा—धरमदास को दुख भयो, हरि हरि करत पुकार।
जीव अनेक प्रलय भये, अस व्योनार धिक्कार॥
चौपाई—लकडी काढि जल माहिं बुझाई। चूल्हा बुझायो बहु जल लाई॥
जो कछु जरे सो जरिगे भाई। जो बाचे सो लेहु बचाई॥
नफर हाथ जिंद बुलवाई। यह भोजन लै जिंदहि खाई॥
(जिंद)
धरमदास तुम बडे सुजाना। जीव दया काहे नहिं जाना॥
कीन्हा नेम अनेक अचारा। लकडी धोई रचे व्योनारा॥
निरखि निरखि तुम काहे न बीना। नाम तोरि देवतन कहि दीन्हा॥
जैलौं जीव दया नहिँ आवै। तीरथ भरमि के जनम गँवावै॥
दसरथ सुत श्रीराम कहाये। तिनहूँ अपने जिव सताये॥
दोहा—बैर वालि के हतन को, विष्णु देह धरि दीन्ह।
जो जो जिव मारे हते, तिन तिन बदला लीन्ह॥
चौपाई—वचन हमार हिये में धरहू। ससय तजि के भोजन करहू॥
आतम कष्ट कवहूँ ना दीजे। रुचे सो प्रेम से भोजन कीजे॥
हरि ना मिलैं अन्न के छाँडे। हरि ना मिलैं डगर ही माँडे॥
हरि न मिलैं घरवार तियागे। हरि न मिलैं निसु वासर जागे॥
दया धरम जहँ बसै सरीरा। तहाँ खोजिले कहै कबीरा॥
सुनि धर्मदास धीर्ज मन कीन्हा। भली सीख जिंद मोहिं दीन्हा॥
इन कै ज्ञान महा रस बानी। मानो वचन अमी रस सानी॥
आन प्रसाद पत्र२ भरि लीन्हा। काढि परोसि के भोजन दीन्हा॥
(१) नौकर। (२) पत्तल।

जीवन-चरित्र
दोहा- तुम ले जावो जिंद जी, हम करिवै फरहार ।
लंघन न करिहौं पीर जी, मानौं बचन तुम्हार ॥
चौपाई-दै प्रसाद उठि आसन आयेऊ। धरमदास फरहार मँगायेऊ ॥
सालिगराम को अर्पन कीन्हा। पुनि भोजन आपु ही कीन्हा ॥
लिये आचमन अमृत मीठे। आसन करि सुचित्त होइ बैठे ॥
पहर एक हरि चरचा भयेऊ। पुनि निद्रा करने को गयेऊ ॥
रैन सिरानी भयो बिहाना। नफर सहित उठि बाहिर आना ॥
धरमदास बंधो चलि आये। बाल गोपाल मनहि सुख पाये ॥
जिंद बचन जब हिरदे आये। अंतर गत बहुते सुख पाये ॥
आवै फिरि तब दरसन पाऊँ। पूछूँ आदि अंत चित लाऊँ ॥
दोहा-सत्त सत्त सब उन कही, जानि परै मोहिं सार ।
जिंद नाहिं कोइ पुरुष है, अस बोलै ब्रह्म हमार ॥
चौपाई-धरमदास मन कीन्ह बिचारा। देवँ महोच्छ करों भंडारा ॥
सीधा सामग्री बहुत मँगाई। भेष भगत तहँ बहुत बुलाई ॥
आये बैरागी औ ब्रह्मचारी। नागबीर आये दूधाधारी ॥
फलाहारी अन्नधारी आये। जोगी जिंद बहु भेष बनाये ॥
बहुत आये तपसी सन्यासी। जटा भभूत सुन्न बिस्वाली ॥
बाजै ताल मृदंग निसाना। संख नाद धुनि होइ निधाना ॥
आव भगत सबहिन को कीन्हा। इच्छा भोजन सब को दीन्हा ॥
सब को ज्ञान परख्यो धर्म्मदासा। लख्यो ज्ञान सब को बिनु सारा ॥
कोइ तीरथ कोइ मूर्त्ति बँधावै। कोइ कलि केवल नाम दृढ़ावै ॥
कोइ कृष्ण गोपालहिं गावै। कोइ दुर्गा सिव सक्ति धियावै ॥
जोगी अलख अलख उच्चरई। जिंद सुमिरै अल्लाह खोदाई ॥
सन्यासी राम देत ठहराई। परमहंस अबिनासी गाई ॥
दोहा-एक वात कोइ ना कहै, नाना मति परचंड ।
धर्म्मदास परखे मते, जानि परे पाखंड ॥
चौपाई-समुझि परौ ऐसो मन माहीं। जिंद का मता काहु सम नाहीं ॥
बरस दिना गिरही में रहेऊ। बहुत सुरत कासी की कियेऊ ॥
धर्म्मदास कासी चलि आये। हृदय हुती सो दरसन पाये ॥
मुक्तिरूप सुख अमृत बानी। नाम कबीर जगत गुरु ज्ञानी ॥
विमल विमल साखी पद गावै। जुरी भीर सबहिन समुझावै ॥
धर्म्मदास तहँ निरखै ठाढ़ा। चद चकोर जिमि आँखि पसारा ॥
पडित ज्ञानी सबै हराये। थाह कबीर की कोइ नहिं पाये ॥
धर्म्मदास चीन्हे मन माना। येहि जिंद तजि होय न आना ॥

जीवन-चरित्र
दोहा—पिरथम मोहि मथुरा मिले, बहुत बाद हम कीन्ह।
साँच साँच सब उन कही, मन हमार हर लीन्ह ॥
चौपाई—धर्म्मदास हरष मन कीन्हा। बहुरि पुरुष मोहिं दरसन दीन्हा ॥
अपने मन मे कीन्ह बिचारा। इनकर ज्ञान महा टकसारा ॥
दोइ दीन के करता कहाई। इनकर भेद कोउ नहिं पाई ॥
इतना कहि मन कीन्ह बिचारा। तब कबीर उन ओर निहारा ॥
आओ भक्त महाजन पगु धारो। चिहुँकि चिहुँकि तुम काह निहारो ॥
कहिये छिमा कुसल हौ नीके। सुरत तुम्हार बहुत हम झींके ॥
धर्म्मदास हम तुम को चीन्हा। बहुत दिनन में दरसन दीन्हा ॥
बहुत ज्ञान कहसी हम तुम्हीं। बहुरि के अब तुव चीन्हो हमहीं ॥
तुम तो भक्त हम जिंद फकीरा। सुधि करि देखो सत मत धीरा ॥
दोहा—भली भई दरसन मिले, बहुरि मिले तुम आय।
जो कोई मोसे मिलै, ते जुग बिछुरि न जाय ॥
चौपाई—सुनि धर्म्मदास हिये सुख भरे। सन्मुख धाइ पाँव जा परे॥
दया सिन्धु चितये भरि नैना। उठि धर्म्मदास अंक भरि लीन्हा॥
धर्म्मदास कबीर भे भेटा। सत्त सब्द के खुले कपाटा॥
परगट ज्ञान ध्यान की खानी। सत्त सब्द निज अमृत वानी ॥
जो कोइ सुनै चेत चित लाई। संसय टरै पाप छय जाई ॥
तुलसी साहेब के ग्रंथ घटरामायन में लिखा है कि कबीर साहेब काशी में
धर्म्मदास जी के घर गये जब वह मूर्त्ति पूजा कर रहे ,थे और बहुत से पंडित
और पुजारी जमा थे। कबीर साहेब ने पूछा कि धात की गढ़ी मूरत और
पत्थर की बटिया के पूजने का क्या फल है इस पर पुजारी बहुत बिगडे
और उनको नास्तिक और भला बुरा कह कर निकाल देना चाहा परन्तु
धर्म्मदास जी ने रोका और उनसे देर तक चर्चा करते रहे जिससे उनकी
कुछ शान्ति हुई। फिर कबीर साहेब ने मौज से यह चमत्कार दिखलाया कि
एक हिचकी लेकर अपने गले से शालग्राम की बटिया निकाल कर धर दी
और फिर उसको बुलाया तो वह हाथ पर आ बैठी। यह कौतुक देखकर
धर्म्मदासजी के चित्त में पूरी रीति से कबीर साहेब की महिमा बैठ गई और
अपनी स्त्री और पुत्रों को भी उनके चरणों पर गिराया। उनकी स्त्री और जेठे
पुत्र चूड़ामणि ने तो पूरे भाव से कबीर साहेब की शरण ली और उनको गुरू

जीवन चरित्र ७
धारण किया परन्तु छोटे बेटे नारायणदास ने नाक भैंव सिकोड़ ली और
कबीर साहेब को पाखंडी और जादूगर ठहराया।
इन दीनों कथाओं से संतों के इस वचन का प्रमाण मिलता है कि जब
स्वतः सत जगत में पधारते हैं तो अपनी निज अंश अर्थात् गुरुमुख को भी देर
सबेर लाते हैं और उसी के द्वारे सारी रचना को पवित्र करते हैं। यद्यपि
गुरुमुख को परमार्थ का चाव लड़कपन ही से रहता है परन्तु पहले माया का
पर्दा उस पर पड़ा रहता है-जब समय आता है तब सतगुरु उसे अपने
दर्शन और वचन से एक छिन में चेता देते हैं और माया के परदे को हटा देते
हैं। जैसे कबीर साहेब पहिले सत अवतार हुए ऐसे ही धनी धर्म्मदासजी
पहिले गुरुमुख प्रगट हुए जो कबीर साहेब की दया दृष्टि से संत गति को
प्राप्त हुए ।
धर्म्मदासजी ने कबीर साहेब की शरण लेने पर अपना सारा धन
दौलत लुटा दिया और काशी में गुरु चरणों मे रहने लगे। उनके पीछे उनके बड़े
बेटे चूड़ामणिजी ने भी वही ऊँचा पद पाया परन्तु नारायणदास संतों की साखी के
अनुसार काल के अवतार समझे जाते हैं।
कबीर साहेब के सम्वत् १५७५ मे परमधाम को सिधारने के पीछे
धर्म्मदास जी को उनकी गद्दी और सब ग्रंथ मिले और वह बहुत बरस तक
जगत जीवों को चेताते और संत मत दृढ़ात रहे। उनके गुप्त होने पर चूड़ा-
मणिजी को गद्दी हुई और सब ग्रंथ मिले सिवाय कबीर साहेब के बीजक के
जिसे भागू धर्म्मदासजी के गुरुभाई ने चोरा कर भगवान गोसाँईं के हाथ
मुक़ाम धनोली जिला तिरहुत को भेज दिया और फिर वहाँ अपनी गद्दी अलग
क़ायम की।
धर्म्मदास जी के शब्द हम पाँच बरस से इकट्ठा कर रहे हैं और उनकी
बाबत खास काशी के कबीरचौरा की गद्दी और दूसरे महंतों और कबीर पंथी
साधुओं से दरियाफ़्त किया तो मालूम हुआ कि उनके शब्द कहीं अलग पोथी
में लिखे नहीं हैं वरन कबीर साहेब की बानी मे मिल गये हैं। कहते हैं कि न
केवल वह पद जिन में अकेले धर्म्मदास जी का छाप है उनके रचे हुए हैं वरन

८ जीवन-चरित्र
वह भी जिन में कबीर साहेब और उनका दोनों का नाम है, क्योंकि अपने गुरू
कबीर साहेब का नाम भी धर्म्मदासजी ने अपने कितने पदों में सेवक भाव
से रख दिया है। इस सम्मति का प्रमाण अक्सर दोनों छापवाले पदों से
मिलता है जिन में साफ़ साफ़ धर्म्मदासजी की बिनती कबीर साहेब के
चरणों में है। इस हिसाब से आठ दस शब्द दोहरे छाप के जो हमने कबीर
साहेब की शब्दावली के पहिले और दूसरे भागों में छापे हैं और पूरी “ज्ञान
गुदड़ी” धर्म्मदास जी की समझी जायगी। जो हो अब उनको यहाँ दुबारा
छापने की ज़रूरत नहीं है पर वैसे और शब्द जो हमको प्रमाणिक कबीरपंथियों
ने धर्म्मदास जी की बानी कह कर दिये उन्हें हमने इस बानी मैँ शामिल
कर दिया है॥

धरमदास जी की शब्दावली ॰
॥ सतगुरु महिमा का अंग ॥
॥ शब्द १ ॥
गुरु मिले अगम के बासी ॥ टेक ॥
उनके चरन कमल चित दीजे, सतगुरु मिले अबिनासी ॥ १
उनकी सीत प्रसादी लीजे, छूटि जाय चौरासी ॥ २
अमृत बुंद झरै घट भीतर, साध संत जन लासी¹ ॥ ३
धरमदास बिनवै कर जोरी, सार शब्द मन बासी² ॥ ४
॥ शब्द २ ॥
गुरु मोहिँ खूब निहाल कियो ॥ टेक ॥
बूड़त जात रहे भवसागर, पकरि के बाँहि लियो ॥ १
चौदह लोक बसैँ जम चौदह, उनहुँ से छोरि लियो ॥ २
तिनुका तोरि दियो परवाना, माथे हाथ दियो ॥ ३
नाम सुना दियो कंठी माला, माथे तिलक दियो ॥ ४
धरमदास बिनवै कर जोरी, पूरा लोक दियो ॥ ५
॥ शब्द ३ ॥
सतगुरु धोबी जो मिलै, दिल दाग छोड़ावै ॥ टेक ॥
ब्रह्म अगिन परगट करै

२ सतगुरु महिमा का अंग
गुरु गम बानी ऊचरै, पुरुष दरसावै।
कह० कबीर धर्मदास से, अच्छर परसावै ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
सतगुरु चारिउ बरन से ऊँचे ॥ टेक ॥
ना मानो तौ साखि बताऔँ, सेवरी के फल रूचे ॥ १ ॥
राजा युधिष्ठिर जज्ञ रचो है, घंट न बाजे संत के रूसे ॥२॥
सुपच भगत जब ग्रास उठाये, बाजे घंट गगन चढ़ि ऊँचे ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, सतगुरु सब्द लगैँ मोहिँ नीके ॥४॥
॥ शब्द ५ ॥
अब गुरु मिले सनेही आई ॥ टेक ॥
चलो सखी जहँ जाइये, जहँ बसै पुरुष पुराना।
चरन चुरामनि १ चँवर डोलावै, तन की तपन बुझाई ॥ १ ॥
सुरति समानी सार सब्द में, निरत रही लव लाई।
प्रेम पियारी रटै पिया को, यह जिव पुलकित जाई ॥२॥
भवसागर औगाह अगम है, सूझै वार न पारा।
हंस उबारन सतगुरु आये, बही काढ़ि लै जाई ॥ ३ ॥
जन्म जन्म के हंस उबारन, अजहु उबारनहारा।
जा के साँची लगन लगी है, सो बोहि लोकै जाई ॥ ४ ॥
कह कबीर धर्मदास से, निरति रहो लौ लाई।
नाम पान जो पाँजी पावै, सो सतलोक बसाई ॥ ५ ॥
॥ शब्द ६ ॥
आज घड़ी आनन्द की, सतगुरु आये मोरे धाम हो ॥टेक॥
आये गुरुदेव सजन पठयो, भयो हरष अपार हो।
सकल सुन्दर साजि आरत, होत मंगलचार हो ॥ १ ॥
(१) धरमदास जी के पुत्र और गुरुमुख का नाम।

सतगुर महिमा ३
दियो दरसन मन लुभायो, सुन्यो बचन अमोल हो ।
अक्षय छाया सघन घन की, करत हंस कलोल हो ॥ २ ॥
दया कीन्हो निर्गुन दीन्हो, अपनी करि सैन हो ।
भक्ति मुक्ति सनेही सजनै, लियो परथम चीन्ह हो ॥ ३ ॥
भये कलमल दूर तन के, गई तपन नसाय हो ।
अटल पन्थ कबीर दीन्हा, धर्मदास लखाय हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७ ॥
मोरे पिया मिले सत ज्ञानी ॥ टेक ॥
ऐसन पिय हम कबहुँ न देखा, देखत सुरत लुभानी ॥ १ ॥
आपन रूप जब चीन्हा बिरहिन, तब पिय के मन मानी ॥ २ ॥
जब हंसा चले मानसरोवर, मुक्ति भरै जहँ पानी ॥ ३ ॥
कर्म जलाय के काजल कीन्हा, पढ़े प्रेम की बानी ॥ ४ ॥
धर्मदास कबीर पिय पाये, मिट गई आवाजानी ॥ ५ ॥
॥ शब्द ८ ॥
गुरु पद अहै सबन से' भारी ॥ टेक ॥
चारौ बेद तुलै नहिं गुरु पद, ब्रह्मा बिष्नु और ब्रह्मचारी ॥ १ ॥
नारद मुनि भये गुरुपद भजि कै, जपत सेस संकर की नारी ॥ २ ॥
सुर नर मुनि भये गुरुपद भजि कै, जपत राम अरु जनक दुलारी ॥ ३
धर्मदास मैं गुरुपद भजिहौँ, साहेब कबीर समरथ बलिहारी ॥ ४
॥ शब्द ९ ॥
हंस उबारन सतगुरु, जग में आइया ।
प्रगट भये कासी में, दास कहाइया ॥ १ ॥
बाम्हन औ सन्यासी, तो हाँसी कीन्हिया ।
कासी से मगहर आये, कोई नहिं चीन्हिया ॥ २ ।

ड़ीसा जाइ कै।"
Wait, "दरियाव," - there is a comma after दरियाव!
Yes: "दरियाव,".

Line 4:
"बिजुलीखाँव पठान, सो कबुर खोदाइया ।"
There is a comma after "पठान,"!

Line 5:
"बिजुलीसिंह बघेल, साजि दल१ आइया ॥ ४ ॥"
There is a comma after "बघेल,"!

Line 6:
"रानी पतिया पठाय, जीव जनि - मारिया ।"
Comma after "पठाय,"!

Line 7:
"मुरदा न होय कबीर, बहुरि पछिताइया ॥ ५ ॥"
Comma after "कबीर,"!

Line 8:
"खोदि के देखी कबुर, गुरु देँह न पाइया ।"
Comma after "कबुर,"!

Line 9:
"पान फूल लै हाथ, सेन१ फिरि आइया ॥ ६ ॥"
Comma after "हाथ,"!

Line 11:
"लछमि सहित जगन्नाथ, मिले तहँ धाइ कै ॥ ७ ॥"
Comma after "जगन्नाथ,"!

Line 12:
"पंडा पाखँड जानि कै, कौतुक कीन्हिया ।"
Comma after "कै,"!

Line 13:
"एक से अनँत कला होइ, दरसन दीन्हिया ॥ ८ ॥"
Comma after "होइ,"

नाम महिमा ५
पांडव जज्ञ सुफल ना होई, कोटिन जुरे अचारी ।
सुपच भक्त ने ग्रास उठायो, घंट बज्यो तब भारी ॥३॥
तच्छक आन डस्यौ रानी को, बिषम लहर तन भारी ।
रानी पर जब किरपा कीन्हाँ, उनहूँ को हंस उबारी ॥४॥
हरि को मंदिर बनन न पावै, समुँद लहर उठि भारी ।
आसा रूप कै समुँद हटायौ, तीरथ करै संसारी ॥५॥
जो जा सुमिरै सो ता प्रगटै, जग में नर अरु नारी ।
धरमदास पर किरपा कीन्हीं, हंसराज लखे भारी ॥६॥
जो जो सरन गही सतगुरु की, उबरे नर अरु नारी ।
साहेब कबीर मुक्ति के दाता, हम को लियो उबारी ॥७॥
॥ नाम महिमा का अंग ॥
॥ शब्द १ ॥
नाम रस ऐसा है भाई ॥ टेक ॥
आगे आगे दाहि चलै, पाछे हरियर होइ ।
बलिहारी वा बृच्छ की, जड़ काटे फल होइ ॥१॥
अति कडुवा खट्टा घना रे, वा को रस है भाई ।
साधत साधत साध गये हैं, अमली होय सो खाई ॥२॥
सूँघत के बौरा भये हो, पीयत के मरि जाई ।
नाम रस्स सो जन पिये, धड़ पर सीस न होई ॥३॥
संत जवारिस१ सो जन पीवै, जा को ज्ञान प्रगासा ।
धरमदास पी छकित भये हैं, और पिये कोइ दासा ॥४॥
(१) पेट के दर्द की दवा ।

६ नाम महिमा
॥ शब्द २ ॥
नाम रटन रट लागि रहै, कोइ साधु सयाना ॥ टेक ॥
साध के चाकर दुइ जना, बंका सुर¹ ज्ञाना² ।
सास अरप आगे धरो, तब बाँधो बाना ॥१॥
साहेब द्वारे भीड़ भे, बिरला ठहराना ।
कंचन कोट सुमेर बना, गज दीन्हा दाना ॥२॥
चाल चले गजराज की, अलमस्त समाना ।
सील तिलक बंस बेलि है, जम देखि डेराना ॥३॥
धरती मूल बिचारि के, तब धुनि उड़काना ।
कोटि गऊ को दान दे, नहिँ नाम समाना ॥४॥
कह कबीर धर्मदास से, पावै पद निर्बाना ।
आदि अंत की बारता, सतगुरु परवाना ॥५॥
॥ शब्द ३ ॥
चाकर हौँ निज नाम का, सुनो संत सिपाही ॥ टेक ॥
चरन कँवल सतगुरु दिया, हम सीस चढ़ाई ।
सत्त दरस ऐसे भया, गुरु कमर बँधाई ॥१॥
मारे मुरचा सब्द ले, भ्रम के गढ़ टूटे ।
अच्छर पुरुष एक वृक्ष है, तहँ लागे जाई ॥२॥
काँपन लागे दूतवा, चढ़े संत सिपाही ।
मारे गोला नाम के, सब फउज पराई ॥३॥
नौबत बाजै लोक मेँ, जीते जमराई ।
कह कबीर धर्मदास से, फिरी नाम दोहाई ॥४॥
(१) बाँका सूरमा । (२) ज्ञानी ।

चेतावनी ७
॥ शब्द ४ ॥
हम सत्त नाम के बैपारी ॥ टेक ॥
कोइ कोइ लादै काँसा पीतल, कोइ कोइ लौँग सुपारी ।
हम तो लाद्यौ नाम धनी को, पूरन खेप हमारी ॥ १ ॥
पूँजी न टूटै नफा चौगुना, बनिज किया हम भारी ।
हाट जगाती रोक न सकि है, निर्भय गैल हमारी ॥ २ ॥
मोती बुंद घट ही मेँ उपजै, सुकिरत भरत कोठारी ।
नाम पदारथ लाद् चला है, धर्मदास बैपारी ॥ ३ ॥
॥ चेतावनी का अंग ॥
॥ शब्द १ ॥
सब्द की बेरिया जात टरी ॥ टेक ॥
उहाँ सो आये का कहि आये, का करने लगे आन ।
इहाँ आइ परपंच भुलाने, बैठे अधम ठिकान ॥ १ ॥
भाई बंधु सुत कुटुम कबीला, ये कह जग मेँ नाम ।
तुम जाने उनहीँ सँग रहना, ठाढ़ काल मुसक्यान ॥ २ ॥
आये नाव काठ से 'बोझी, दिन दिन अति गुरुवाई ।
आगे जाम¹ लेइ कर लूटी, देइ छाती पर लाती ॥ ३ ॥
गहे सब्द ज्ञान कर दीपक, बैठे सत के पासा ।
साहेब कबीर हंसन के राजा, धरमदास निजु दासा ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
थोरे दिन की जिंदगी, मन चेत गँवार ॥ टेक ॥
कागद कै तन पुतरा, डोरी साहेब हाथ ।
नाना नाच नचावही, नाचै संसार ॥ १ ॥
(१) जम ।