धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजीवन चरित्र ७
धारण किया परन्तु छोटे बेटे नारायणदास ने नाक भैंव सिकोड़ ली और
कबीर साहेब को पाखंडी और जादूगर ठहराया।
इन दीनों कथाओं से संतों के इस वचन का प्रमाण मिलता है कि जब
स्वतः सत जगत में पधारते हैं तो अपनी निज अंश अर्थात् गुरुमुख को भी देर
सबेर लाते हैं और उसी के द्वारे सारी रचना को पवित्र करते हैं। यद्यपि
गुरुमुख को परमार्थ का चाव लड़कपन ही से रहता है परन्तु पहले माया का
पर्दा उस पर पड़ा रहता है-जब समय आता है तब सतगुरु उसे अपने
दर्शन और वचन से एक छिन में चेता देते हैं और माया के परदे को हटा देते
हैं। जैसे कबीर साहेब पहिले सत अवतार हुए ऐसे ही धनी धर्म्मदासजी
पहिले गुरुमुख प्रगट हुए जो कबीर साहेब की दया दृष्टि से संत गति को
प्राप्त हुए ।
धर्म्मदासजी ने कबीर साहेब की शरण लेने पर अपना सारा धन
दौलत लुटा दिया और काशी में गुरु चरणों मे रहने लगे। उनके पीछे उनके बड़े
बेटे चूड़ामणिजी ने भी वही ऊँचा पद पाया परन्तु नारायणदास संतों की साखी के
अनुसार काल के अवतार समझे जाते हैं।
कबीर साहेब के सम्वत् १५७५ मे परमधाम को सिधारने के पीछे
धर्म्मदास जी को उनकी गद्दी और सब ग्रंथ मिले और वह बहुत बरस तक
जगत जीवों को चेताते और संत मत दृढ़ात रहे। उनके गुप्त होने पर चूड़ा-
मणिजी को गद्दी हुई और सब ग्रंथ मिले सिवाय कबीर साहेब के बीजक के
जिसे भागू धर्म्मदासजी के गुरुभाई ने चोरा कर भगवान गोसाँईं के हाथ
मुक़ाम धनोली जिला तिरहुत को भेज दिया और फिर वहाँ अपनी गद्दी अलग
क़ायम की।
धर्म्मदास जी के शब्द हम पाँच बरस से इकट्ठा कर रहे हैं और उनकी
बाबत खास काशी के कबीरचौरा की गद्दी और दूसरे महंतों और कबीर पंथी
साधुओं से दरियाफ़्त किया तो मालूम हुआ कि उनके शब्द कहीं अलग पोथी
में लिखे नहीं हैं वरन कबीर साहेब की बानी मे मिल गये हैं। कहते हैं कि न
केवल वह पद जिन में अकेले धर्म्मदास जी का छाप है उनके रचे हुए हैं वरन