धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ नाम महिमा
॥ शब्द २ ॥
नाम रटन रट लागि रहै, कोइ साधु सयाना ॥ टेक ॥
साध के चाकर दुइ जना, बंका सुर¹ ज्ञाना² ।
सास अरप आगे धरो, तब बाँधो बाना ॥१॥
साहेब द्वारे भीड़ भे, बिरला ठहराना ।
कंचन कोट सुमेर बना, गज दीन्हा दाना ॥२॥
चाल चले गजराज की, अलमस्त समाना ।
सील तिलक बंस बेलि है, जम देखि डेराना ॥३॥
धरती मूल बिचारि के, तब धुनि उड़काना ।
कोटि गऊ को दान दे, नहिँ नाम समाना ॥४॥
कह कबीर धर्मदास से, पावै पद निर्बाना ।
आदि अंत की बारता, सतगुरु परवाना ॥५॥
॥ शब्द ३ ॥
चाकर हौँ निज नाम का, सुनो संत सिपाही ॥ टेक ॥
चरन कँवल सतगुरु दिया, हम सीस चढ़ाई ।
सत्त दरस ऐसे भया, गुरु कमर बँधाई ॥१॥
मारे मुरचा सब्द ले, भ्रम के गढ़ टूटे ।
अच्छर पुरुष एक वृक्ष है, तहँ लागे जाई ॥२॥
काँपन लागे दूतवा, चढ़े संत सिपाही ।
मारे गोला नाम के, सब फउज पराई ॥३॥
नौबत बाजै लोक मेँ, जीते जमराई ।
कह कबीर धर्मदास से, फिरी नाम दोहाई ॥४॥
(१) बाँका सूरमा । (२) ज्ञानी ।