धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 11, कुल 98 में से
संदर्भ में पढ़ेंजीवन-चरित्र
दोहा—पिरथम मोहि मथुरा मिले, बहुत बाद हम कीन्ह।
साँच साँच सब उन कही, मन हमार हर लीन्ह ॥
चौपाई—धर्म्मदास हरष मन कीन्हा। बहुरि पुरुष मोहिं दरसन दीन्हा ॥
अपने मन मे कीन्ह बिचारा। इनकर ज्ञान महा टकसारा ॥
दोइ दीन के करता कहाई। इनकर भेद कोउ नहिं पाई ॥
इतना कहि मन कीन्ह बिचारा। तब कबीर उन ओर निहारा ॥
आओ भक्त महाजन पगु धारो। चिहुँकि चिहुँकि तुम काह निहारो ॥
कहिये छिमा कुसल हौ नीके। सुरत तुम्हार बहुत हम झींके ॥
धर्म्मदास हम तुम को चीन्हा। बहुत दिनन में दरसन दीन्हा ॥
बहुत ज्ञान कहसी हम तुम्हीं। बहुरि के अब तुव चीन्हो हमहीं ॥
तुम तो भक्त हम जिंद फकीरा। सुधि करि देखो सत मत धीरा ॥
दोहा—भली भई दरसन मिले, बहुरि मिले तुम आय।
जो कोई मोसे मिलै, ते जुग बिछुरि न जाय ॥
चौपाई—सुनि धर्म्मदास हिये सुख भरे। सन्मुख धाइ पाँव जा परे॥
दया सिन्धु चितये भरि नैना। उठि धर्म्मदास अंक भरि लीन्हा॥
धर्म्मदास कबीर भे भेटा। सत्त सब्द के खुले कपाटा॥
परगट ज्ञान ध्यान की खानी। सत्त सब्द निज अमृत वानी ॥
जो कोइ सुनै चेत चित लाई। संसय टरै पाप छय जाई ॥
तुलसी साहेब के ग्रंथ घटरामायन में लिखा है कि कबीर साहेब काशी में
धर्म्मदास जी के घर गये जब वह मूर्त्ति पूजा कर रहे ,थे और बहुत से पंडित
और पुजारी जमा थे। कबीर साहेब ने पूछा कि धात की गढ़ी मूरत और
पत्थर की बटिया के पूजने का क्या फल है इस पर पुजारी बहुत बिगडे
और उनको नास्तिक और भला बुरा कह कर निकाल देना चाहा परन्तु
धर्म्मदास जी ने रोका और उनसे देर तक चर्चा करते रहे जिससे उनकी
कुछ शान्ति हुई। फिर कबीर साहेब ने मौज से यह चमत्कार दिखलाया कि
एक हिचकी लेकर अपने गले से शालग्राम की बटिया निकाल कर धर दी
और फिर उसको बुलाया तो वह हाथ पर आ बैठी। यह कौतुक देखकर
धर्म्मदासजी के चित्त में पूरी रीति से कबीर साहेब की महिमा बैठ गई और
अपनी स्त्री और पुत्रों को भी उनके चरणों पर गिराया। उनकी स्त्री और जेठे
पुत्र चूड़ामणि ने तो पूरे भाव से कबीर साहेब की शरण ली और उनको गुरू