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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 98 में से

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पृष्ठ 18

नाम महिमा ५
पांडव जज्ञ सुफल ना होई, कोटिन जुरे अचारी ।
सुपच भक्त ने ग्रास उठायो, घंट बज्यो तब भारी ॥३॥
तच्छक आन डस्यौ रानी को, बिषम लहर तन भारी ।
रानी पर जब किरपा कीन्हाँ, उनहूँ को हंस उबारी ॥४॥
हरि को मंदिर बनन न पावै, समुँद लहर उठि भारी ।
आसा रूप कै समुँद हटायौ, तीरथ करै संसारी ॥५॥
जो जा सुमिरै सो ता प्रगटै, जग में नर अरु नारी ।
धरमदास पर किरपा कीन्हीं, हंसराज लखे भारी ॥६॥
जो जो सरन गही सतगुरु की, उबरे नर अरु नारी ।
साहेब कबीर मुक्ति के दाता, हम को लियो उबारी ॥७॥
॥ नाम महिमा का अंग ॥
॥ शब्द १ ॥
नाम रस ऐसा है भाई ॥ टेक ॥
आगे आगे दाहि चलै, पाछे हरियर होइ ।
बलिहारी वा बृच्छ की, जड़ काटे फल होइ ॥१॥
अति कडुवा खट्टा घना रे, वा को रस है भाई ।
साधत साधत साध गये हैं, अमली होय सो खाई ॥२॥
सूँघत के बौरा भये हो, पीयत के मरि जाई ।
नाम रस्स सो जन पिये, धड़ पर सीस न होई ॥३॥
संत जवारिस१ सो जन पीवै, जा को ज्ञान प्रगासा ।
धरमदास पी छकित भये हैं, और पिये कोइ दासा ॥४॥
(१) पेट के दर्द की दवा ।