धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसकल भक्त के रहौं अधीना। गुरू सेवा जिन दिच्छा लीन्हा॥
विरथा बचन सुनौं ना कहऊँ। प्रेम भक्ति में निस दिन रहऊँ ॥
दोहा—मोरे संका कछु नहीं, सेवो श्रीरघुनाथ।
(जिन) ध्रू प्रहलाद उवारिया, सो हरि हमरे साथ ॥
(जिंद)
मैं हौं जिंद सुनु बचन हमारा। तुम जनि होहु काल कै चारा ॥
राम नाम सब दुनी पुकारे। राम अगिन जो काठै जारे ॥
काहे न सुरति करौ घट माहीं। चीन्ह चीन्ह बूडौ भव माहीं ॥
जिन्हें कहत हौ नंद के लाला। सो तौ भये सबन के काला ॥
छल बल करि वे सब छलि डारे। पांडव जाइ हिंवारे गारे ॥
पांडव सम को भक्त कहावा। तिनहुँ को काल वली भरमावा ॥
दसरथ सुत कहिये श्रीरामा। तिनहूँ चीन्हौ काल अकामा ॥
करता राम कस भे मति-हीना। कपट मृगा उनहूँ नहिं चीन्हा ॥
दोहा—दोउ करता विरतत हैं, कीन्हे जम के कास ।
जीव अनेक प्रलय किये, ऐसे कृष्न अरु राम ॥
चौपाई—धर्म्मदास है नाम तुम्हारा। काहे न चीन्हौ वचन हमारा ॥
ज्ञान दृष्टि से चीन्हौ वानी। पाखँड पाहन पाखँड पानी ॥
करता पाखंड कवहूँ न होई। यह संसय सब दुनी विगोई ॥
सालिग्राम है बोलनहारा। देह सरूप तन साजि हमारा ॥
धर्म्मदास सुनि चीन्हेउ ज्ञाना। हित के बचन सुनत मन माना ॥
कोइ करता कहिये भगवाना। नाम मोर इन कैसे जाना ॥
इन कर बचन ज्ञान औगाहा१। जिंद भेष धारे कोउ आहा ॥
थापै सालिग्राम न सेवा। तीरथ बरत कौ मेटै भेवा ॥
राम कृष्न को मेट बताना। अह्रै जिंद को कैसो ज्ञाना ॥
दोहा—धर्म्मदास मस्टी२ रहे, बहुत खोज नहिं कीन्ह।
सीधा३ लै डेरे गये, जिंद उत्तर४ नहि दीन्ह ॥
चौपाई—इतना गुष्ट बजार में कीन्हा। आप दुकान में डेरा लीन्हा ॥
धर्म्मदास पहुँच निज डेरा। मन महँ सोच कीन्ह बहुतेरा ॥
बारह वरस तीर्थ हम कीन्हा। द्वारिका जाइ छाप हम लीन्हा ॥
श्रीनाथ परसे चित लाई। राम नाथ दक्खिन होइ आई ॥
दक्खिन परस गोदावरि गयेऊ। मेला भरो दरसन तहँ कियेऊ ॥
(१) गहिरा। (२) मौन, चुप। (३) भोजन की सामग्री। (४) जवाब।