धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसतगुर महिमा ३
दियो दरसन मन लुभायो, सुन्यो बचन अमोल हो ।
अक्षय छाया सघन घन की, करत हंस कलोल हो ॥ २ ॥
दया कीन्हो निर्गुन दीन्हो, अपनी करि सैन हो ।
भक्ति मुक्ति सनेही सजनै, लियो परथम चीन्ह हो ॥ ३ ॥
भये कलमल दूर तन के, गई तपन नसाय हो ।
अटल पन्थ कबीर दीन्हा, धर्मदास लखाय हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७ ॥
मोरे पिया मिले सत ज्ञानी ॥ टेक ॥
ऐसन पिय हम कबहुँ न देखा, देखत सुरत लुभानी ॥ १ ॥
आपन रूप जब चीन्हा बिरहिन, तब पिय के मन मानी ॥ २ ॥
जब हंसा चले मानसरोवर, मुक्ति भरै जहँ पानी ॥ ३ ॥
कर्म जलाय के काजल कीन्हा, पढ़े प्रेम की बानी ॥ ४ ॥
धर्मदास कबीर पिय पाये, मिट गई आवाजानी ॥ ५ ॥
॥ शब्द ८ ॥
गुरु पद अहै सबन से' भारी ॥ टेक ॥
चारौ बेद तुलै नहिं गुरु पद, ब्रह्मा बिष्नु और ब्रह्मचारी ॥ १ ॥
नारद मुनि भये गुरुपद भजि कै, जपत सेस संकर की नारी ॥ २ ॥
सुर नर मुनि भये गुरुपद भजि कै, जपत राम अरु जनक दुलारी ॥ ३
धर्मदास मैं गुरुपद भजिहौँ, साहेब कबीर समरथ बलिहारी ॥ ४
॥ शब्द ९ ॥
हंस उबारन सतगुरु, जग में आइया ।
प्रगट भये कासी में, दास कहाइया ॥ १ ॥
बाम्हन औ सन्यासी, तो हाँसी कीन्हिया ।
कासी से मगहर आये, कोई नहिं चीन्हिया ॥ २ ।