धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 6, कुल 98 में से
संदर्भ में पढ़ेंधर्मदासजी का जीवन-चरित्र
धनी धर्मदासजी जाति के कसौंधन बनिये बाघोगढ़ नगर के भारी महाजन
थे। उनके जीवन और मृत्यु के समय का उनके मत वालों या किसी ग्रंथ से ठीक
ठीक पता नहीं चलता परन्तु इतना पक्का है कि कबीर साहेब से इनको अवस्था
कम थी और उनके पन्द्रह बीस वरस पीछे चोला छोड़ा। इस हिसाब से उनके जन्म
का समय विक्रमी संवत् १४७५ और १५०० के दर्मियान और परमधाम सिधारने
का समय संवत् १६०० के क़रीब समझना चाहिये क्योंकि उन्होंने पूरी अवस्था को
पहुँच कर शरीर त्याग किया ।
धर्मदासजी बाल अवस्था ही से बड़े धर्मात्मा और भगवत भक्त थे
परन्तु आदि में पुराने कर्म धर्म और मूर्त्ति पूजन के बँधुए थे। सैकड़ों
पंडितों और पुजारियों और साधुवों की उनके यहाँ सदा भीड़ भाड़ लगी
रहती थी और अपना मुख्य समय ठाकुर की मूरत और शालग्राम की पूजन
और ब्राह्मणों और साधुवों के खिलाने पिलाने और आदर सत्कार और कथा
कीर्त्तन में खर्च करते थे और दूर दूर के तीर्थों में दर्शन और यात्रा कर
आये थे ।
जब धर्मदास जी के चेताने का समय आया तब सतगुरु कबीर साहेब
पहिले उनसे मथुरा में मिले और रास्ते में चरचा मूर्त्ति पूजन और तीर्थ व्रत
के खंडन और सत मत के मंडन की की। कुछ दिन पीछे धर्मदास जी काशी
यात्रा को आये तब कबीर साहेब के फिर दर्शन मिले और जो कुछ संशय भर्म
धर्मदास जी के मन में बाक़ी रह गये थे उनको कबीर साहेब ने पूरी भाँति
मिटा दिया और इसके पीछे संत मत का उपदेश देकर दया दृष्टि से उनके
घट के पट खोल दिये। “अमर सुख निधान” ग्रन्थ में कबीर साहेब और धर्मदासजी
की गोष्ठी विस्तार के साथ लिखी है—उसकी थोड़ी सी कड़ियाँ जिनमें
धर्मदासजी के कबीर साहेब का दर्शन पाने और फिर काशी में शरण लेने का वर्णन
है नीचे लिखे जाते हैं।