धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ जीवन-चरित्र
परसि सिवाला औ हरिद्वारा। नीमषार मिस्रु पग धारा॥
बद्रीनाथ दुवारे गयेऊ। श्रीबिंद्रावन मथुरा आयेऊ॥
दोहा—मकर त्रिवेनी परसेहू, औ कासी अस्थान।
औरौ परसे जगन्नाथ, गंगासागर किये अस्नान॥
चौपाई—इतने तीर्थ क्षेत्र हम धाये। यह दुसरे हम मथुरा आये॥
राम नाम निज प्रान अधारा। सो यह जिंद मेटि सब डारा॥
कीजे कहा जिंद को भाई। जाति मलेच्छ कथै चतुराई॥
धरमदास जब नफर१ बुलावा। घर लिपाय व्योनार चढ़ावा॥
चौका बैठि कीन्ह अस्नाना। छानिछानि जल अदहन दीन्हा॥
अति पवित्र से करै रसोई। सालिगराम कै भोजन होई॥
लकड़ी चिउँटी उठीं अपारा। कोटिन जीव भये जरि छारा॥
दोहा—धरमदास को दुख भयो, हरि हरि करत पुकार।
जीव अनेक प्रलय भये, अस व्योनार धिक्कार॥
चौपाई—लकडी काढि जल माहिं बुझाई। चूल्हा बुझायो बहु जल लाई॥
जो कछु जरे सो जरिगे भाई। जो बाचे सो लेहु बचाई॥
नफर हाथ जिंद बुलवाई। यह भोजन लै जिंदहि खाई॥
(जिंद)
धरमदास तुम बडे सुजाना। जीव दया काहे नहिं जाना॥
कीन्हा नेम अनेक अचारा। लकडी धोई रचे व्योनारा॥
निरखि निरखि तुम काहे न बीना। नाम तोरि देवतन कहि दीन्हा॥
जैलौं जीव दया नहिँ आवै। तीरथ भरमि के जनम गँवावै॥
दसरथ सुत श्रीराम कहाये। तिनहूँ अपने जिव सताये॥
दोहा—बैर वालि के हतन को, विष्णु देह धरि दीन्ह।
जो जो जिव मारे हते, तिन तिन बदला लीन्ह॥
चौपाई—वचन हमार हिये में धरहू। ससय तजि के भोजन करहू॥
आतम कष्ट कवहूँ ना दीजे। रुचे सो प्रेम से भोजन कीजे॥
हरि ना मिलैं अन्न के छाँडे। हरि ना मिलैं डगर ही माँडे॥
हरि न मिलैं घरवार तियागे। हरि न मिलैं निसु वासर जागे॥
दया धरम जहँ बसै सरीरा। तहाँ खोजिले कहै कबीरा॥
सुनि धर्मदास धीर्ज मन कीन्हा। भली सीख जिंद मोहिं दीन्हा॥
इन कै ज्ञान महा रस बानी। मानो वचन अमी रस सानी॥
आन प्रसाद पत्र२ भरि लीन्हा। काढि परोसि के भोजन दीन्हा॥
(१) नौकर। (२) पत्तल।