धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)
Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press
सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजीवन-चरित्र
दोहा- तुम ले जावो जिंद जी, हम करिवै फरहार ।
लंघन न करिहौं पीर जी, मानौं बचन तुम्हार ॥
चौपाई-दै प्रसाद उठि आसन आयेऊ। धरमदास फरहार मँगायेऊ ॥
सालिगराम को अर्पन कीन्हा। पुनि भोजन आपु ही कीन्हा ॥
लिये आचमन अमृत मीठे। आसन करि सुचित्त होइ बैठे ॥
पहर एक हरि चरचा भयेऊ। पुनि निद्रा करने को गयेऊ ॥
रैन सिरानी भयो बिहाना। नफर सहित उठि बाहिर आना ॥
धरमदास बंधो चलि आये। बाल गोपाल मनहि सुख पाये ॥
जिंद बचन जब हिरदे आये। अंतर गत बहुते सुख पाये ॥
आवै फिरि तब दरसन पाऊँ। पूछूँ आदि अंत चित लाऊँ ॥
दोहा-सत्त सत्त सब उन कही, जानि परै मोहिं सार ।
जिंद नाहिं कोइ पुरुष है, अस बोलै ब्रह्म हमार ॥
चौपाई-धरमदास मन कीन्ह बिचारा। देवँ महोच्छ करों भंडारा ॥
सीधा सामग्री बहुत मँगाई। भेष भगत तहँ बहुत बुलाई ॥
आये बैरागी औ ब्रह्मचारी। नागबीर आये दूधाधारी ॥
फलाहारी अन्नधारी आये। जोगी जिंद बहु भेष बनाये ॥
बहुत आये तपसी सन्यासी। जटा भभूत सुन्न बिस्वाली ॥
बाजै ताल मृदंग निसाना। संख नाद धुनि होइ निधाना ॥
आव भगत सबहिन को कीन्हा। इच्छा भोजन सब को दीन्हा ॥
सब को ज्ञान परख्यो धर्म्मदासा। लख्यो ज्ञान सब को बिनु सारा ॥
कोइ तीरथ कोइ मूर्त्ति बँधावै। कोइ कलि केवल नाम दृढ़ावै ॥
कोइ कृष्ण गोपालहिं गावै। कोइ दुर्गा सिव सक्ति धियावै ॥
जोगी अलख अलख उच्चरई। जिंद सुमिरै अल्लाह खोदाई ॥
सन्यासी राम देत ठहराई। परमहंस अबिनासी गाई ॥
दोहा-एक वात कोइ ना कहै, नाना मति परचंड ।
धर्म्मदास परखे मते, जानि परे पाखंड ॥
चौपाई-समुझि परौ ऐसो मन माहीं। जिंद का मता काहु सम नाहीं ॥
बरस दिना गिरही में रहेऊ। बहुत सुरत कासी की कियेऊ ॥
धर्म्मदास कासी चलि आये। हृदय हुती सो दरसन पाये ॥
मुक्तिरूप सुख अमृत बानी। नाम कबीर जगत गुरु ज्ञानी ॥
विमल विमल साखी पद गावै। जुरी भीर सबहिन समुझावै ॥
धर्म्मदास तहँ निरखै ठाढ़ा। चद चकोर जिमि आँखि पसारा ॥
पडित ज्ञानी सबै हराये। थाह कबीर की कोइ नहिं पाये ॥
धर्म्मदास चीन्हे मन माना। येहि जिंद तजि होय न आना ॥