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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

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पृष्ठ 7

२ जीवन-चरित्र
॥ रमैनी ॥
(जिन्द)
चौपाई—कहैं कबीर मैं काया सोधा। जो जस बूझि ताहि तस बोधा॥
अपने घट में कीन्ह बिचारा। देखौं धरमदास दरबारा॥
धरमदास बधो के बानी१। प्रेम प्रीति भक्ती मैं जानी॥
सालिग्राम की सेवा करई। दया धरम बहुतै चित धरई॥
साधु भक्त के चरन पखारै। भोजन कराइ अस्तुति अनुसारै॥
भागवत गीता बहुत कहाई। प्रेम भक्ति रस पियै अघाई॥
मनमा बाचा भजै गोपाला। तिलक देइ तुलसी की माला॥
द्वारिका जगन्नाथ होइ आये। गया बनारस गंगा नहाये॥
बोलत बचन सत्त सुभ बानी। बृथा कहै कबहुँ ना जानी॥
दोहा—राम कृष्न को सूमिरे, तीरथ व्रत दृढ़ चेट२।
मथुरा परसत जब गये, भे कबीर सों भेट॥
चौपाई—जिंद३ रूप जब धरे सरीरा। धरमदास मिलि गये कबीरा॥
उदित बदन मुदित सुख चैना। हँस मुसुकाय कहे मुख बैना॥
धरमदास तुम हौ बड़ ज्ञानी। परम भक्त भक्ती मैं जानी॥
तुम सा भक्त न देखौं आना। धर्म तुम्हारा कवन स्थाना॥
कवन दिसा से तुम चलि आये। जैहौ कहाँ कहा मन लाये॥
काकी भक्ति करौ चित लाई। सो कित बसै कौन से ठाँई॥
पूछत मन में दुख जनि मानो। करता आदि पुरुष पहिचानो॥
का भे माला तिलक के दीन्हे। का भे तीरथ बरत के कीन्हे॥
का भे सुनत भागवत गीता। चिन्ता मिटी न मन को जीता॥
दोहा—जेहि कर्ता से ऊपजे, सो वसे कौने देस।
ताहि चीन्ह परिचय करो, छोड़ सकल भ्रम भेस॥
(धर्मदास जी)
चौपाई—सुनि धर्मदास अचभो भयऊ। ऐसो वचन काहु ना कहेऊ॥
जिंद रूप इन ही कै देखा। कहत बचन सुख बहुत विशेका॥
सुनो जिंद मोरे दृढ़ ज्ञाना। वास मोर बधो अस्थाना॥
बरन कसौंधन जाति को बानी। भजौं राम कृष्न सारँग पानी॥
पारब्रह्म सेवैं चित लाई। सीताराम जपौं सुखदाई॥
सेवैं सालिग्राम के पाऊँ। अर्द्ध-मुखी४ सभी लव लाऊँ॥
(१) बधोगढ़ निवासी बनिये। (२) चेष्टा। (३) जिन। (४) सिर झुका कर।