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धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

धनी धर्मदास जी की शब्दावली (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर साहिब के प्रथम पट्टशिष्य)

Dhani Dharamdas Ji Ki Shabdavali: Belvedere Press

सन्त धनी धर्मदास जी (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished98 पृष्ठ

पृष्ठ 15, कुल 98 में से

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पृष्ठ 15

२ सतगुरु महिमा का अंग
गुरु गम बानी ऊचरै, पुरुष दरसावै।
कह० कबीर धर्मदास से, अच्छर परसावै ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
सतगुरु चारिउ बरन से ऊँचे ॥ टेक ॥
ना मानो तौ साखि बताऔँ, सेवरी के फल रूचे ॥ १ ॥
राजा युधिष्ठिर जज्ञ रचो है, घंट न बाजे संत के रूसे ॥२॥
सुपच भगत जब ग्रास उठाये, बाजे घंट गगन चढ़ि ऊँचे ॥३॥
धरमदास बिनवै कर जोरी, सतगुरु सब्द लगैँ मोहिँ नीके ॥४॥
॥ शब्द ५ ॥
अब गुरु मिले सनेही आई ॥ टेक ॥
चलो सखी जहँ जाइये, जहँ बसै पुरुष पुराना।
चरन चुरामनि १ चँवर डोलावै, तन की तपन बुझाई ॥ १ ॥
सुरति समानी सार सब्द में, निरत रही लव लाई।
प्रेम पियारी रटै पिया को, यह जिव पुलकित जाई ॥२॥
भवसागर औगाह अगम है, सूझै वार न पारा।
हंस उबारन सतगुरु आये, बही काढ़ि लै जाई ॥ ३ ॥
जन्म जन्म के हंस उबारन, अजहु उबारनहारा।
जा के साँची लगन लगी है, सो बोहि लोकै जाई ॥ ४ ॥
कह कबीर धर्मदास से, निरति रहो लौ लाई।
नाम पान जो पाँजी पावै, सो सतलोक बसाई ॥ ५ ॥
॥ शब्द ६ ॥
आज घड़ी आनन्द की, सतगुरु आये मोरे धाम हो ॥टेक॥
आये गुरुदेव सजन पठयो, भयो हरष अपार हो।
सकल सुन्दर साजि आरत, होत मंगलचार हो ॥ १ ॥
(१) धरमदास जी के पुत्र और गुरुमुख का नाम।