धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
१२४ ] अत्तवग्गो [ ७३
अनुवाद—पहिले अपनेको ही उचित (काम) में लगावे, (फिर)
यदि दूसरेको उपदेश करे, (तो) पंडित क्लेशको न
प्राप्त होगा।
जेतवन (अभ्यासी) तिस्स (थेर)
१५९-अत्तानञ्चे तथा कयिरा यथञ्जमनुसासति ।
सुदन्तो वत दम्मेथ अत्ता हि किर दुद्दमो ॥३॥
(आत्मानं चेत् तथा कुर्याद् यथाऽन्यमनुशास्ति ।
सुदान्तो बत दमयेद्, आत्मा हि किल दुर्दमः ॥३॥ )
अनुवाद—अपनेको वैसा बनावे, जैसा दूसरेको अनुशासन करना है;
(पहिले) अपनेको भली प्रकार दमन करे; वस्तुतः
अपनेको दमन करना (ही) कठिन है।
जेतवन कुमार कस्सपकी माता (थेरी)
१६०-अत्ता हि अत्तनो नाथो को हि नाथो परो सिया ।
अत्तना'व सुदन्तेन नाथं लभति दुल्लभं ॥४॥
(आत्मा¹ हि आत्मनो नाथः को हि नाथः परः स्यात् ।
आत्मनैव सुदान्तेन नाथं लभते दुर्लभम् ॥४॥ )
१ भगवद्गीता (अध्याय ६)में—
“उद्धरेदात्मनात्मान नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥४॥
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥५॥”
१०. दण्डवग्गो (दण्ड वर्ग)
७४ ] धम्मपद [ १२।६
अनुवाद—(पुरुष) अपने ही अपना मालिक है, दूसरा कौन मालिक हो
सकता है, अपनेको भली प्रकार दमन कर लेने पर ( वह
एक ) दुर्लभ मालिकको पाता है ।
जेतवन महाकाल ( उपासक )
१६१-अत्तना'व कतं पापं अत्तजं अत्तसम्भवं ।
अभिमन्थति दुम्मेधं वजिरं 'व'स्ममयं मणिं ॥५॥
( आत्मनैव कृतं पापं आत्मजं आत्मसम्भवम् ।
अभिमथ्नाति दुर्मेधसं वज्रमिवाश्ममयं मणिम् ॥५॥ )
अनुवाद—अपनेसे जात, अपनेसे उत्पन्न, अपनेसे किया पापं, ( करने-
वाले ) दुर्बुद्धिको पाषाणमय वज्रमणीकी ( चोटकी ) भाँति
मन्थन (=पीडित ) करता है ।
जेतवन देवदत्त
१६२-यस्सच्चन्तदुस्सीव्यं मालुवा सालमिवोततं ।
करोति सो तयत्तानं यथा 'नं इच्छती दिसो ॥६॥
( यस्याऽत्यन्तदौःशील्यं मालुवा शालमिवाततम् ।
करोति स तथात्मानं यथैनमिच्छंति द्विपः ॥६॥ )
अनुवाद—मालुवालता १ से वेष्टित शाल ( वृक्ष ) की भाँति जिसका दुरा-
चार फैला हुआ है; वह अपनेको वैसा ही कर लेता है, जैसा
कि उसके शत्रु चाहते हैं ।
१ मालुवा एक लता है, जो जिस वृक्षपर चढ़ती है, वर्षा पानीके
मारसे उसे तोड़ डालती है ।
१२।९ ] अत्तवग्गो [ ७५
राजगृह ( वेणुवन ) संघमें फूटके समय
१६३-सुकराणि असाधूनि अत्तनो अहितानि च ।
यं वे हितञ्च साधुञ्च तं वे परमदुक्करं ॥७॥
( सुकराण्यसाधून्यात्मनोऽहितानि च ।
यद् वै हितं च साधु च तद् वै परमदुष्करम् ॥७॥ )
अनुवाद—अनुचित और अपने लिये अहित ( कर्मोंका करना )
सुकर है; (लेकिन) जो हित और उचित है, उसका करना
परम दुष्कर है ।
जेतवन काल (थेर)
१६४-यो सासनं अरहतं अरियानं धम्मजीविनं ।
पटिक्कोसति दुम्मेधो दिट्ठिं निस्साय पापिकं ।
फलानि कट्ठकस्सेव अत्तहञ्ञाय फुल्लति ॥८॥
( यः शासनमर्हतां आर्याणां धर्मजीविनाम् ।
प्रतिक्रुश्यति दुर्मेधा दृष्टिं निश्रित्य पापिकाम् ।
फलानि काष्ठकस्यैवात्महत्यायै फुल्लति ॥८॥ )
अनुवाद—धर्मजीवी, आर्य, अर्हतोंके शासन (=धर्म)को, जो दुर्बुद्धि
बुरी दृष्टिसे निन्दता है; वह बाँसके फलकी भाँति अपनी
हत्याके लिये फूलता है ।
जेतवन ( चूळ ) काल ( उपासक )
१६५-अत्तना 'व कतं पापं अत्तना संकिलिस्सति ।
अत्तना अकतं पापं अत्तना 'व विसुज्झति ॥
सुद्धि असुद्धिपच्चत्तं नञ्ञो अञ्ञं विसोधये ॥६॥
७६ ] धम्मपदं [ १२।१०
( आत्मनैव कृतं पापं आत्मना संक्लिश्यति ।
आत्मनाऽकृतं पापं आत्मनैव विशुध्यति ।
शुद्धयशुद्धी प्रत्यात्मं नाऽन्योऽन्यं विशोधयेत् ॥९॥ )
अनुवाद—अपनेसे किया पाप अपनेको ही मलिन करता है, अपने
पाप न करे तो अपने ही शुद्ध रहता है; शुद्धिअशुद्धि प्रत्येक
( आदमी )की अलग अलग है; दूसरा ( आदमी )दूसरेको
शुद्ध नहीं कर सकता ।
जेतवन अत्तदत्थ ( थेर )
१६६—अत्तदत्थं परत्थेन बहुनाऽपि न हापये ।
अत्तदत्थमभिञ्ञाय सदत्थपसुतो सिया ॥१०॥
(आत्मनोऽर्थं परार्थेन बहुनाऽपि न हापयेत् ।
आत्मनोऽर्थमभिज्ञाय सदर्थप्रसितः स्यात् ॥१०॥)
अनुवाद—परायेके बहुत हितके लिये भी अपने हितकी हानि न करे;
अपने हितको जान कर सच्चे हितमें लगे ।
१२—आत्मवर्ग समाप्त
१३—लोकवग्गो
जेतवन कोई अल्पवयस्क भिक्षु
१६७-हीनं धम्मं न सेवेय्य, पमादेन न संवसे ।
मिच्छादिट्ठिं न सेवेय्य न सिया लोक-वड्ढनो ॥ १॥
(हीनं धर्मं न सेवेत, प्रमादेन न संवसेत् ।
मिथ्यादृष्टिं न सेवेत, न स्यात् लोकवर्द्धनः ॥१॥)
अनुवाद—पाप(=नीच धर्म)को न सेवन करे, न प्रमादसे लिस
होवे, झूठी धारणाको न सेवन करे, (आदमीको) लोक-
(=जन्म मरण)-वर्द्धक नहीं बनना चाहिये ।
कपिलवस्तु (न्यग्रोधाराम) शुद्धोदन
१६८-उत्तिट्ठे नप्पमज्जेय्य धम्मं सुचरितं चरे ।
धम्मचारी सुखं सेति अस्मिं लोके परम्हि च ॥२॥
(उत्तिष्ठेत् न प्रमाद्येद् धर्मं सुचरितं चरेत् ।
धर्मचारी सुखं शेतेऽस्मिं लोके परत्र च ॥२॥)
[ ७७
७८ ] धम्मपदं [ १३।५
१६६-धम्मं चरे सुचरितं न तं दुच्चरितं चरे ।
धम्मचारी सुखं सेति अस्मिं लोके परम्हि च ॥३॥
( धर्मं चरेत् सुचरितं न तं दुश्चरितं चरेत् ।
धर्मचारी सुखं शेतेऽस्मिन् लोके परत्र च ॥३॥ )
अनुवाद—उत्साही बने, आलसी न बने, सुचरित धर्मका आचरण
करे, धर्मचारी (पुरुष) इस लोक और परलोकमें सुख-
पूर्वक सोता है। सुचरित धर्मका आचरण करे, दुश्चरित
कर्म (=धर्म) का सेवन न करे। धर्मचारी (पुरुष) ० ।
जेतवन पाँच सौ ज्ञानी (भिक्षु)
१७०-यथा बुब्बुळकं पस्से यथा पस्से मरीचिकं ।
एवं लोकं अवेक्खन्तं मच्चुराजा न पस्सति ॥४॥
( यथा बुद्बुदकं पश्येद् यथा पश्येत् मरीचिकाम् ।
एवं लोकमवेक्षमाणं मृत्युराजो न पश्यति ॥४॥ )
अनुवाद—जैसे बुलबुलेको देखता है, जैसे (मरु-)मरीचिकाको देखता
है, लोकको वैसे ही (जो पुरुष) देखता है, उसकी ओर
यमराज (आँख उठाकर) नहीं देख सकता।
राजगृह (वेणुवन) अभय राजकुमार
१७१-एथ पस्सथिमं लोकं चित्तं राजपथूपमं ।
यत्थ बाला विसीदन्ति, नत्थि सङ्गो विजानतं ॥५॥
( एत पश्यतेमं लोकं चित्रं राजपथोपगम् ।
यत्र बाला विषीदन्ति नास्ति संगो विजानताम् ॥५॥ )
१३८ ] लोकवग्गो [ ७९
अनुवाद—आओ, विचित्र राजपथके समान इस लोकको देखो, जिसमें
मूढ़ आसक्त होते हैं, ज्ञानी जन आसक्त नहीं होते।
जेतवन सम्मुञ्जानि (थेर)
१७२-यो च पुब्बे पमज्जित्वा पच्छा सो नप्पमज्जति ।
सो'मं लोकं पभासेति अब्भा मुत्तो'व चन्दिमा ॥६॥
( यश्च पूर्वं प्रमाद्य पश्चात् स न प्रमाद्यति ।
स इमं लोकं प्रभासयत्येभ्रान्मुक्त इव चन्द्रमा ॥ ६ ॥ )
अनुवाद—जो पहिले भूल कर फिर भूल नहीं करता, वह मेघसे उन्मुक्त
चन्द्रमाकी भाँति इस लोकको प्रकाशित करता है।
जेतवन अङ्गुलिमाल (थेर)
१७३-यस्स पापं कतं कम्मं कुसलेन पिथिय्यति ।
सो'मं लोकं पभासेति अब्भा मुत्तो'व चन्दिमा ॥७॥
( यस्य पापं कृतं कर्म कुशलेन पिधीयते ।
स इमं लोकं प्रभासयत्यभ्रान्मुक्त इव चन्द्रमा ॥ ७ ॥ )
अनुवाद—जो अपने किये पाप कर्मोंको पुण्यसे ढाक देता है, वह
मेघसे उन्मुक्त० ।
आलवी रंगरेजकी कन्या
१७४-अन्धभूतो अयं लोको तनुकेय विपस्सति ।
सकुन्तो जालमुत्तो'व अप्पो सग्गाय गच्छति ॥८॥
(अन्धभूतोऽयं लोकः, तनुकोऽत्र विपश्यति ।
शकुन्तो जालमुक्त इवाल्पः स्वर्गाय गच्छति ॥ ८ ॥ )
८० ] धम्मपदं [ १३।११
अनुवाद—यह लोक अन्धे जैसा है, यहाँ देखनेवाले थोड़े ही हैं; जालमे
मुक्त पक्षीकी भाँति विरले ही स्वर्गको जाते हैं।
जेतवन तीस भिक्षु
१७५-हंसादिच्चपथे यन्ति आकासे यन्ति इद्धिया ।
नीयन्ति धीरा लोकमहा नेत्वा मारं सवाहिणिं ॥६॥
(हंसा आदित्यपथे यन्ति, आकाशे यन्ति ऋद्धिया।
नीयन्ते धीरा लोकात् जित्वा मारं सबाहिनीकम् ॥ ९ ॥ )
अनुवाद—हंस सूर्यपथ (=आकाश)में जाते हैं, (योगी) ऋद्धि(-बल)-
से आकाशमें जाते हैं, धीर (पुरुष) सेना-सहित मारको
पराजित कर लोकमे (निर्वाणको) ले जाये जाते हैं।
जेतवन चिंचा (माणविका)
१७६-एकं धम्मं अतीतस्स मुसावादिरस जन्तुनो ।
वितिएणपरलोकस्स नत्थि पापं अकारियं ॥१०॥
(एकं धर्ममतीतस्य मृषावादिनो जन्तोः।
वितीर्णपरलोकस्य नास्ति पापमकार्यम् ॥ १०॥)
अनुवाद—जो धर्मको अतिक्रमण कर चुका, जो प्राणी मृषावादी है,
जो परलोक(का ख्याल) छोड़ चुका है, उसके लिये कोई
पाप अकरणीय नहीं।
जेतवन (अयुक्त दान)
१७७-न [वे] कदरिया देवलोकं वजन्ति
बाला ह वे न प्पसंसन्ति दानं ।
१३।१२] लोकवग्गो [ ८१
धीरो च दानं अनुमोदमानो
तेनेव सो होति सुखी परत्थ ॥११॥
'( न [वै] कदर्या देवलोकं व्रजंति
बाला ह वै न प्रशंसंति दानम् ।
धीरश्च दानं अनुमोदमानस्तेनैव
स भवति सुखी परत्र ॥ ११ ॥ )
अनुवाद—कंजूस देवलोक नहीं जाते, मूढ़ ही दानकी प्रशंसा नहीं
करते; धीर दानका अनुमोदन कर, उसी (कर्म) से पर
(लोक) में सुखी होता है।
जेतवन अनाथपिण्डिकके पुत्रका मरण
१७८-पथव्या एकरज्जेन सग्गस्स गमनेन वा ।
सब्बलोकाधिपच्चेन सोतापत्तिफलं वरं ॥१२॥
(पृथिव्या एकराज्यात् स्वर्गस्य गमनाद् वा ।
सर्वलोकाऽऽधिपत्याद् वा स्रोतआपत्तिफलं वरम् ॥ १२ ॥ )
अनुवाद—(सारी) पृथिवीका अकेला राजा होनेसे, या स्वर्गके
गमनसे, (या) सभी लोकोंके अधिपति होनेसे भी
स्रोतआपत्ति* फल (का मिलना) श्रेष्ठ है।
१३—लोकवर्ग समाप्त
- जो पुरुष निर्वाण-गामी मार्गपर इस प्रकार आरूढ़ हो जाता है,
कि फिर वह उससे भ्रष्ट नहीं हो सकता, उसे स्रोत-आपन्न (=धारमें पड़ा)
कहते हैं। इसी पदके लाभको स्रोत-आपत्ति-फल कहते हैं ।
६
१४—बुद्धवग्गो
उरुवेला (बोधिमण्ड) मागन्दिय् (ब्राह्मण)
१७६—यस्स जितं नावजीयति
जितमस्स नो याति कोचि लोके ।
तं बुद्धमनन्तगोचरं अपदं केन पदेन' नेस्सथ ? ॥१॥ ,
(यस्य जितं नावजीयते
जितमस्य न याति कश्चिल्लोके ।
तं बुद्धमनन्तगोचरं अपदं केन पदेन नेष्यथ ? ॥१॥ )
१८०-यस्स जालिनी विसत्तिका
तण्हा नत्थि कुहिञ्चि नेतवे ।
तं बुद्धमनन्तगोचरं अपदं केन पदेन नेस्सथ ? ॥२॥
(यस्य जालिनी विषात्मिका तृष्णा
नास्ति कुत्रचित् नेतुम् ।
तं बुद्धमनन्तगोचरं अपदं केन पदेन नेष्यथ ? ॥२॥)
८२]
११. जरावग्गो (जरा वर्ग)
१४।४ ] बुद्धवग्गो [ ८३
अनुवाद—जिसका जीता वेजीता नहीं किया जा सकता, जिसके जीते
( राग, द्वेष, मोह फिर ) नहीं लौटते; उस अपद (=स्थान-
रहित ), अनन्तगोचर (=अनन्तको देखनेवाले ) बुद्धको
किस पथसे प्राप्त करोगे ? जिसकी जाल फैलानेवाली विष-
रूपी तृष्णा कहीं भी लेजाने लायक नहीं रही; उस अपद् ०।
संकाश्य नगर देव, मनुष्य
१८१—ये झाणपसुता धीरा नेक्खम्मूपसमे रता ।
देवापि तेसं पिहयन्ति सम्बुद्धानं सतीमतं ॥३॥
( ये ध्यानप्रसिता धीरा नैष्कर्म्योपशमे रताः।
देवा अपि तेषां स्पृहयन्ति संबुद्धानां स्मृतिमत्ताम् ॥३॥ )
अनुवाद—जो धीर ध्यानमें लग्न, निष्कर्मता और उपशममें रत हैं,
उन स्मृतिमान् (=सचेत ) बुद्धोंकी देवता भी स्पृहा
(=होड ) करते हैं ।
वाराणसी ऐरकपत्त ( नागराज )
१८२-किच्छो मनुस्सपटिलाभो किच्छं मच्चानं जीवितं ।
किच्छं सद्धम्मसवणं किच्छो बुद्धानं उप्पादो ॥४॥
( कृच्छ्रो मनुष्यप्रतिलाभः कृच्छ्रं मर्त्यानां जीवितम्।
कृच्छ्रं सद्धर्मश्रवणं कृच्छ्रो बुद्धानां उत्पादः ॥४॥ )
अनुवाद—मनुष्य( योनि ) का लाभ कठिन है, मनुष्यका जीवन
( मिलना ) कठिन है, सच्चा धर्म सुननेको मिलना कठिन है,
बुद्धों (=परम ज्ञानियों ) का जन्म कठिन है ।
८४ ] धम्मपदं [ १४।७
जेतवन आनन्द (थेर) का प्रश्न
१८३-सब्बपापस्स अकरणं कुसलस्स उपसम्पदा ।
स-चित्तपरियोदपनं, एतं बुद्धान 'सासनं ॥५॥
(सर्वपापस्याकरणं कुशलस्योपसम्पदा ।
स्वचित्तपर्यवदापनं पतद् बुद्धानां शासनम् ॥५॥ )
अनुवाद—सारे पापोंका न करना, पुण्योंका संचय करना, अपने
चित्तको परिशुद्ध करना, यह है बुद्धोंकी शिक्षा ।
जेतवन आनन्द (थेर)
१८४-खन्ती परमं तपो तितिक्खा ,
निब्बाणं परमं वदन्ति बुद्धा ।
नहि पब्बजितो परूपघाती ,
समणो होति परं विहेठयन्तो ॥६॥
( क्षान्तिः परमं तपः तितिक्षा निर्वाणं परमं वदन्ति बुद्धाः ।
नहि प्रव्रजितः परोपघाती श्रमणो भवति परं विहेठयन् ॥६॥)
१८५-अनुपवादो अनुपघातो पातिमोक्खे च संवरो ।
मत्तञ्ञुता च भत्तस्मिं पन्तञ्च सयनासनं ।
अधिचित्ते च आयोगो एतं बुद्धान सासनं ॥७॥
( अनुपवादोऽनुपघातः प्रातिमोक्षे च संवरः ।
मात्राज्ञता च भक्ते प्रान्तं च शयनासनम् ।
अधिचित्ते चायोग एतद् बुद्धानां शासनम् ॥७॥ )
१४।९ ] बुद्धवग्गो [ ८५
अनुवाद--क्षमा है परम तप, और तितिक्षा बुद्ध निर्वाणको परम
(=उत्तम ) बतलाते हैं; दूसरेका घात करनेवाला, दूसरे-
को पीडित करनेवाला प्रव्रजित (=गृहत्यागी ), श्रमण
(=संन्यासी ) नहीं हो सकता । निन्दा न करना, घात न
करना, प्रातिमोक्ष (=भिक्षु-नियम, आचार-नियम ) द्वारा
अपनेको सुरक्षित रखना, परिमाण जानकर भोजन करना,
एकान्तमें सोना-बैठना (=शयनासन=निवासगृह ), चित्तको
योगमें लगाना, यह बुद्धोंकी शिक्षा है ।
जेतवन ( उदास भिक्षु )
१८६-न कहापणवस्सेन तित्ति कामेसु विज्जति ।
अप्पस्सादा दुखा कामा इति विञ्ञाय पण्डितो ॥८॥
( न कार्षापणवर्षेण तृप्तिः कामेषु विद्यते ।
अल्पास्वादा दुःखाः कामा इति विज्ञाय पण्डितः ॥८॥ )
१८७-अपि दिब्बेसु कामेसु रतिं सो नाधिगच्छति ।
तण्हक्खयरतो होति सम्मासम्बुद्धसावको ॥६॥
( अपि दिव्येषु कामेषु रतिं स नाऽधिगच्छति ।
तृष्णाक्षयरतो भवति सम्यक्संबुद्धश्रावकः ॥९॥ )
अनुवाद-यदि रुपयों (=कहापण ) की वर्षा हो, तो भी (मनुष्य की)
कामो( =भोगों ) से तृप्ति नहीं हो सकती । ( सभी ) काम
(=भोग ) अल्प-स्वाद, ( और ) दुःखद हैं, ऐसा जानकर
पंडित देवताओंके भोगोंमें भी रति नहीं करता; और
सम्यक्संबुद्ध (=बुद्ध )का श्रावक (=अनुयायी ) तृष्णा-
को नाश करनेमें लगता है ।
८६ ] धम्मपदं [ १४।१३
जेतवन अग्गिदत्त (ब्राह्मण)
१८८-बहुं वे सरणं यन्ति पब्बतानि वनानि च ।
आरामरुक्खचेत्यानि मनुस्सा भयतज्जिता ॥ १० ॥
( बहु वै शरणं यान्ति पर्वतान् वनानि च ।
आरामवृक्षचैत्यानि मनुष्या भयतर्जिताः ॥१०॥ )
१८९-नेतं खो सरणं खेमं नेतं सरणमुत्तमं ।
नेतं सरणमागम्म सब्बदुक्खा पमुच्चति ॥ ११॥
( नैतत् खलु शरणं क्षेमं नैतत् शरणमुत्तमम् ।
नैतत् शरणमागम्य सर्वदुःखात्प्रमुच्यते ॥११॥ )
अनुवाद—मनुष्य भयके मारे पर्वत, वन, आराम ( = उद्यान ), वृक्ष,
चैत्य ( = चौरा ) ( आदिको देवता मान उनकी ) शरणमें
जाते हैं; किन्तु ये शरण मंगलदायक नहीं, ये शरण
उत्तम नहीं; (क्योंकि) इन शरणोंमें जाकर सब दुःखोंसे
छुटकारा नहीं मिलता ।
जेतवन अग्गिदत्त (ब्राह्मण)
१९०-यो च बुद्धञ्च धम्मञ्च सङ्घञ्च सरणं गतो ।
चत्तारि अरियसच्चानि सम्मप्पञ्ञाय पस्सति ॥ १२॥
( यश्च बुद्धं च धर्मं च संघं च शरणं गतः ।
चत्वार्यार्यसत्यानि सम्यक् प्रज्ञया पश्यति ॥१२॥ )
१९१-दुक्खं दुक्खसमुप्पादं दुक्खस्स च अतिक्कमं ।
अरियञ्च'ट्ठङ्गिकं मग्गं दुक्खूपसमगामिनं ॥ १३॥
१४।१५] बुद्धवग्गो [ ८७
(दुःखं दुःखसमुत्पादं दुःखस्य चातिक्रमम् ।
आर्याष्टांगिकं मार्गं दुःखोपशमगामिनम् ॥१३॥ )
१६२-एतं खो सरणं खेमं एतं सरणमुत्तमं ।
एतं सरणमासम्म सव्वदुक्खा पमुच्चति ॥१४॥
( एतत् खलु शरणं क्षेमं पतत् शरणमुत्तमम् ।
पतत् शरणमागम्य सर्वदुःखात् प्रमुच्यते ॥ १४ ॥ )
अनुवाद-जो बुद्ध (=परमज्ञानी), धर्म (=सत्यज्ञान) और संघ
(=परमज्ञानियोंके अनुयायियोंके समुदाय) की शरण
गया, जो चारों आर्यसत्यों* को प्रज्ञासे भलीप्रकार देखता
है। (वह चार सत्य हैं-) (१) दुःख, (२) दुःखकी उत्पत्ति,
(३) दुःखका अतिक्रमण, और (४, दुःख नाशक)
आर्य-अष्टांगिक मार्ग†-जो कि दुःखको शमनकरनेकी ओर
ले जाता है; ये हैं मंगलप्रद शरण, ये हैं उत्तम शरण, इन
शरणोंको पाकर (मनुष्य) सारे दुःखोंसे छूट जाता है।
जेतवन आनन्द (थेर) का प्रश्न
१९३-दुल्लभो पुरिसानञ्ञो न सो सव्वत्थ जायति ।
यत्थ सो जायती धीरो तं कुलं सुखमेधति ॥१५॥
- दुःख, उसका कारण, उसका नाश, और नाशका उपाय-यह बुद्ध
द्वारा आविष्कृत चार उत्तम सच्चाइयाँ हैं।
† आर्य-अष्टांगिक मार्ग है-ठीक धारणा, ठीक संकल्प, ठीक वचन, ठीक
कर्म, ठीक जीविका, ठीक उद्योग, ठीक स्मृति, और ठीक ध्यान ।
धम्मपदं [ १४।१८
(दुर्लभः पुरुषाजानेयो न स सर्वत्र जायते।
यत्र स जायते धीरः तत् कुलं सुखमेधते ॥ १५ ॥)
अनुवाद—उत्तम पुरुष दुर्लभ है, वह सर्वत्र उत्पन्न नहीं होता, वह
धीर (पुरुष) जहाँ उत्पन्न होता है, उस कुलमें सुखकी
वृद्धि होती है।
जेतवन बहुतसे भिक्षु
१६४—सुखो बुद्धानं उप्पादो सुखा सद्धम्मदेसना ।
सुखा संघस्स सामग्गी समग्गानं तपो सुखो ॥ १६॥
(सुखो बुद्धानां उत्पादः सुखा सद्धर्म-देशना।
सुखा संघस्य सामग्री समग्राणां तपः सुखम् ॥ १६॥)
अनुवाद—सुखदायक है बुद्धोंका जन्म, सुखदायक है सच्चे धर्मका
उपदेश, संघमें एकता सुखदायक है; और सुखदायक है,
एकतायुक्त हो तप करना ।
चारिकाके समय कस्सप बुद्धका सुवर्ण चैत्य
१६५-पूजारहे पूजयतो बुद्धे यदि व सावके ।
पपञ्चसमतिक्कन्ते तिण्णसोकपरिद्दवे ॥१७॥
(पूजार्हान् पूजयतो बुद्धान् यदि वा श्रावकान् ।
प्रपंचसमतिक्रान्तान् तीर्णशोकपरिद्ववान् ॥ १७ ॥)
१६६-ते तादिसे पूजयतो निब्बुते अकुतोभये ।
न सक्का पुञ्ञं संख्यातुं इमेत्तमपि केनचि ॥१८॥
१२. अत्तवग्गो (आत्म वर्ग)
१४।१८ ] बुद्धवग्गो [ ८९
( तान् तादृशान् पूजयतो निर्वृतान् अकुतोभयान् ।
न शक्यं पुण्यं संख्यातुं एवम्मात्रमपि केनचित् ॥ १८ ॥)
अनुवाद—पूजनीय बुद्धों, अथवा ( उनके ) अनुगामियों—जो संसार
को अतिक्रमणकर गये हैं, जो शोक भयको पारकर गये
हैं—की पूजाके, ( या ) उन ऐसे मुक्त और निर्भय (पुरुषों)
की पूजाके, पुण्यका परिमाण "इतना है"—यह नहीं कहा
जा सकता ।
१४-बुद्धवर्ग समाप्त
१५—सुखवग्गो
शाक्य नगर जाति कलहके उपशमनार्थ
१६७-सुसुखं वत ! जीवाम वेरिनेसु अवेरिनो ।
वेरिनेसु मनुस्सेसु विहराम अवेरिनो ॥ १॥
( सुसुखं बत ! जीवामो वैरिष्ववैरिणः ।
वरिषु मनुष्येषु विहरामोऽवैरिणः ॥१॥ )
१६८-सुसुखं वत ! जीवाम आतरेसु अनातुरा ।
आतरेसु मनुस्सेसु विहराम अनातुरा ॥२॥
( सुसुखं बत ! जीवाम आतुरेष्वनातुराः ।
आतुरेषु मनुष्येषु विहरामोऽनातुराः ॥२॥ )
१६६-सुसुखं वत ! जीवाम उस्सुकेसु अनुस्सुका ।
उस्सुकेसु मनुस्सेसु विहराम अनुस्सुका ॥३॥
( सुसुखं बत ! जीवाम उत्सुकेष्वनुत्सुकाः ।
उत्सुकेषु मनुष्येषु विहराम अनुत्सुकाः ॥३॥ )
९० ]
१५।५ ] सुखवग्गो [ ९१
अनुवाद—वैरियोंके प्रति ( भी ) अवैरी हो, अहो ! हम ( कैसा )
सुखपूर्वक जीवन बिता रहे हैं; वैरी मनुष्योंके बीच अवैरी
होकर हम विहार करते हैं। भयभीत मनुष्योंमें अभय हो,
अहो ! हम सुखपूर्वक जीवन बिता रहे हैं; भयभीत मनुष्यों
के बीच निर्भय होकर हम विहार करते हैं । उत्सुकौं
(=आसक्तों) में उत्सुकता-रहित हो० ।
पंचसाला ( ब्राह्मणग्राम, मगध ) मार -
२००-सुसुखं वत ! जीवाम येसं नो नत्थि किञ्चनं ।
पीतिमक्खा भविस्साम देवा आभस्सरा यथा ॥४॥
( सुसुखं वत ! जीवामो येषां नो नास्ति किंचन ।
प्रीतिभक्ष्या भविष्यामो देवा आभास्वरा यथा ॥४॥ )
अनुवाद—जिन हम ( लोगों ) के पास कुछ नहीं, अहो ! वह हम
कितना सुखसे जीवन बिता रहे हैं। हम आभास्वर देवताओं
की भाँति प्रीतिभक्ष्य (=प्रीति ही भोजन है जिनका ) हैं ।
जेतवन कोसलराज
२०१-जयं वेरं पसवति दुक्खं सेति पराजितो ।
उपसन्तो सुखं सेति हित्वा जयपराजयं ॥५॥
( जयो वैरं प्रसूते दुःखं शेते पराजितः ।
उपशान्तः सुखं शेते हित्वा जयपराजयौ ॥५॥ )
अनुवाद—विजय वैरको उत्पन्न करती है, पराजित ( पुरुष ) दुःखकी
( नींद ) सोता है; ( राग आदि दोष जिसके ) शान्त ( हैं,
१२ ] धम्मपदं [ १५/७
वह पुरुष ) जय ओर पराजयको छोड़ सुखकी (नींद)
सोता है।
जेतवन कोई कुलकन्या
२०२—नत्थि रागसमो अग्गि, नत्थि दोससमो कलि ।
नत्थि खन्धसमा दुक्खा नत्थि सन्तिपरं सुखं ॥६॥
( नास्ति रागसमोऽग्निः, नास्ति द्वेषसमः कलिः ।
नास्ति स्कन्धसमा दुःखाः, नास्ति शान्तिपरं सुखम् ॥६॥ )
अनुवाद—रागके समान अग्नि नहीं, द्वेषके समान मल नहीं, (पाँच)
स्कन्धो* के (=समुदाय) समान दुःख नहीं, शान्तिसे
बढ़कर सुख नहीं।
आलवी एक उपासक
२०३—जिघच्छा परमा रोगा, सङ्घारा परमा दुखा ।
एतं ञत्वा यथाभूतं निब्बाणं परमं सुखं ॥७॥
( जिघत्सा परमो रोगः, संस्काराः परमं दुःखम् ।
एतद् ज्ञात्वा यथाभूतं निर्वाणं परमं सुखम् ॥७॥ )
अनुवाद—भूख सबसे बड़ा रोग है, संस्कार सबसे बड़े दुःख हैं,
- रूप, वेदना, सञ्ञा, सस्कार, विञ्ञान यह पाँच स्कन्ध हैं। वेदना, सञ्ञा,
सस्कार विञ्ञानके अन्दर हैं । पृथिवी, जल, अग्नि, वायु ही रूप स्कध
है। जिसमें न भारीपन है, और जो न जगह घेरता है, वह विञ्ञान स्कध
है। रूप (=Matter) और विञ्ञान (=Mind) इन्हींके मेळसे सारा
ससार बना है।