धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
पृष्ठ 86, कुल 213 में से
संदर्भ में पढ़ें१२।९ ] अत्तवग्गो [ ७५
राजगृह ( वेणुवन ) संघमें फूटके समय
१६३-सुकराणि असाधूनि अत्तनो अहितानि च ।
यं वे हितञ्च साधुञ्च तं वे परमदुक्करं ॥७॥
( सुकराण्यसाधून्यात्मनोऽहितानि च ।
यद् वै हितं च साधु च तद् वै परमदुष्करम् ॥७॥ )
अनुवाद—अनुचित और अपने लिये अहित ( कर्मोंका करना )
सुकर है; (लेकिन) जो हित और उचित है, उसका करना
परम दुष्कर है ।
जेतवन काल (थेर)
१६४-यो सासनं अरहतं अरियानं धम्मजीविनं ।
पटिक्कोसति दुम्मेधो दिट्ठिं निस्साय पापिकं ।
फलानि कट्ठकस्सेव अत्तहञ्ञाय फुल्लति ॥८॥
( यः शासनमर्हतां आर्याणां धर्मजीविनाम् ।
प्रतिक्रुश्यति दुर्मेधा दृष्टिं निश्रित्य पापिकाम् ।
फलानि काष्ठकस्यैवात्महत्यायै फुल्लति ॥८॥ )
अनुवाद—धर्मजीवी, आर्य, अर्हतोंके शासन (=धर्म)को, जो दुर्बुद्धि
बुरी दृष्टिसे निन्दता है; वह बाँसके फलकी भाँति अपनी
हत्याके लिये फूलता है ।
जेतवन ( चूळ ) काल ( उपासक )
१६५-अत्तना 'व कतं पापं अत्तना संकिलिस्सति ।
अत्तना अकतं पापं अत्तना 'व विसुज्झति ॥
सुद्धि असुद्धिपच्चत्तं नञ्ञो अञ्ञं विसोधये ॥६॥