धम्मपद (पालि मूल, संस्कृत छाया एवं हिन्दी अनुवाद)
Dhammapada with Pali Original & Hindi Translation
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन द्वारा
पृष्ठ 92, कुल 213 में से
संदर्भ में पढ़ें१३।१२] लोकवग्गो [ ८१
धीरो च दानं अनुमोदमानो
तेनेव सो होति सुखी परत्थ ॥११॥
'( न [वै] कदर्या देवलोकं व्रजंति
बाला ह वै न प्रशंसंति दानम् ।
धीरश्च दानं अनुमोदमानस्तेनैव
स भवति सुखी परत्र ॥ ११ ॥ )
अनुवाद—कंजूस देवलोक नहीं जाते, मूढ़ ही दानकी प्रशंसा नहीं
करते; धीर दानका अनुमोदन कर, उसी (कर्म) से पर
(लोक) में सुखी होता है।
जेतवन अनाथपिण्डिकके पुत्रका मरण
१७८-पथव्या एकरज्जेन सग्गस्स गमनेन वा ।
सब्बलोकाधिपच्चेन सोतापत्तिफलं वरं ॥१२॥
(पृथिव्या एकराज्यात् स्वर्गस्य गमनाद् वा ।
सर्वलोकाऽऽधिपत्याद् वा स्रोतआपत्तिफलं वरम् ॥ १२ ॥ )
अनुवाद—(सारी) पृथिवीका अकेला राजा होनेसे, या स्वर्गके
गमनसे, (या) सभी लोकोंके अधिपति होनेसे भी
स्रोतआपत्ति* फल (का मिलना) श्रेष्ठ है।
१३—लोकवर्ग समाप्त
- जो पुरुष निर्वाण-गामी मार्गपर इस प्रकार आरूढ़ हो जाता है,
कि फिर वह उससे भ्रष्ट नहीं हो सकता, उसे स्रोत-आपन्न (=धारमें पड़ा)
कहते हैं। इसी पदके लाभको स्रोत-आपत्ति-फल कहते हैं ।
६